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मुझे अब एक नयी शुरुआत करनी होगी…

इतने में अनुपमा कमरे से बाहर आयी और उन दोनों के गले से लिपटकर बहुत जोर से रोने लगी, मानो जैसे बहुत दिनों बाद मन में समाया गुबार निकला हो।

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बहू, तुम तो एक आदमी जितना खाना खाती हो…

आज उसे खाता देख सीता जी से रहा ना गया वो बोल पड़ी, "लीला, तुम तो आदमियों जैसा खाती हो! इतना खाना ठीक नहीं!"

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तुम बहू नहीं बेटी हो मेरी…

“तुम्हारी माँ क्या कहेंगी? हम तो उनके साथ भी काम करवाते हैं। अब अपनी बेटी के साथ करवा रहे हैं, तो कौन सा आसमान टूट पड़ेगा?”

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अगर मेरा देवर हमारे घर रह सकता है तो मेरी बहन क्यों नहीं?

सब अच्छे से चल रहा था। मीतू और सुदीप को ज्योति के वहां होने से कोई परेशानि नहीं थी ‌बल्कि वह दोनों ‌उसके वहाँ होने ‌से‌ बहुत ‌खुश थे।

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भाभी के आने से मेरा घर बदला हुआ लगता है…

एक बात बताओ जब यही सब कुछ तुम्हारे भाई की शादी के बाद तुम्हारी भाभी के आने के बाद हो रहा है तो तुम्हें बुरा क्यों लग रहा है?

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मेरी ननद को अपना हक़ याद है, फर्ज़ नहीं…

ये तुम्हारा ही घर है, उस पर तुम्हारा पूरा हक है, पर क्या अगर इसी घर में रोज़ खाना है, तो रसोई में थोड़ा हाथ नहीं बँटाया जा सकता? 

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