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अपनी बेटी के लिए मैं अकेली ही काफी हूँ…

Posted: फ़रवरी 10, 2021

मीरा का आत्मसम्मान तो शादी के कुछ महीनों बाद से ही छलनी होने लगा था पर वह अपनी बेटी के भविष्य लिए इतना सब कुछ बर्दाश्त कर रही थी।

आज मीरा की बेटी मानवी को अंतरराष्ट्रीय मंच पर बेस्ट फैशन डिजाइनर अवार्ड से सम्मानित किया जाएगा। मीरा अपनी मां के साथ बेटी के सम्मान समारोह में शामिल होने के लिए आई है। बेटी को इतना बड़ा सम्मान मिलने की खुशी में उसकी आंखें बार-बार नम हो रही हैं।

वैसे मीरा को जब से मानवी को सम्मानित किए जाने के बारे में पता चला था, तब से उसकी आंखों के आंसू रुकने का नाम नहीं ले रहे हैं। मां के समझाने के बावजूद वह अपने आप को संभाल नहीं पा रही थी। खुशी के माहौल में भी मीरा के आंखों के सामने उसके अतीत के पन्ने बार-बार आ जा रहे थे। आज उसे अपना, अपनी मां और बेटी का संघर्ष भरा सफर याद आ रहा था।

मीरा अपने माता पिता की इकलौती संतान थी। मीरा के पिता जी एक छोटी पोस्ट पर सरकारी नौकरी में थे। मीरा के पिता ने मीरा की शादी बहुत जल्दी कर दी थी लेकिन मीरा आगे पढ़ना चाहती थी, इसलिए वह शादी नहीं करना चाहती थी। पर मीरा और उसकी मां के समझाने के बावजूद उसके पिताजी माने नहीं। वह एक इंजीनियर लड़के का रिश्ता अपने हाथ से जाने नहीं देना चाहते थे। उन्होंने अपनी सारी जमा पूंजी लगाकर मीरा की शादी कर दी।

मीरा के पति नरेंद्र एक प्राइवेट कंपनी में इंजीनियर था। परिवार में मीरा और नरेंद्र के अलावा सास और दो ननदें थीं। ससुर कुछ साल पहले ही नहीं रहे। शादी के बाद कुछ दिन तक सब कुछ ठीक था पर धीरे-धीरे मीरा को पता चला कि नरेंद्र शराब पीता है। मीरा की सास वैसे तो एक बहुत तेज़ महिला थीं, पर अपने बेटे को शराब की लत से नहीं बचा पाई थीं। पहले नरेंद्र कभी-कभार ही शराब पी कर आता था, पर धीरे-धीरे वह रोज रात को पीकर आने लगा। मीरा के मना करने और समझाने पर लड़ाई-झगड़ा होने लगते और कुछ दिनों बाद तो मारने भी लगा था।

कुछ दिन बाद मीरा की हालत यह हो गई थी कि नरेंद्र छोटी-छोटी बातों पर भी उस पर हाथ उठाने लगा था। मीरा का सम्मान जब उसका पति ही नहीं करता था तब ससुराल में रहने वाले और सदस्य क्यों करेंगे? सास और ननदें भी मीरा को बहुत परेशान करने लगीं और छोटी-छोटी बातों को बड़ा बना कर नरेंद्र से उसकी की शिकायत करके उसे और भड़का देती थीं। इसी बीच मीरा एक बेटी की मां बन गई। बेटी मानवी की भी नरेंद्र को कोई चिंता नहीं रहती।

एक दिन रात को 2:00 बजे नरेंद्र शराब पीकर घर आया। मीरा उस समय सो रही थी। नरेंद्र के बार-बार दरवाजा खटखटाने पर उसकी मां दरवाजा खोलने गई और नरेंद्र पर चिल्लाने लगी। नरेंद्र गुस्से में कमरे में आया और मीरा को गालियां देने लगा। मीरा के जवाब देने पर वह उसे मारने लगा। तभी नरेंद्र की मां और बहन आकर मीरा को ही गलत ठहराने लगीं जिससे नरेंद्र को और शय मिल गई। मीरा पर उसका गुस्सा और भड़क गया और रात में ही उसने मीरा को बेटी के साथ धक्के मार कर घर से बाहर निकालकर दरवाजा बंद कर लिया।

बहुत देर तक मीरा अपनी बेटी के साथ रोती और चिल्लाती रही, पर नरेंद्र और उसके परिवार ने दरवाजा नहीं खोला। सुबह होने तक मीरा अपनी बेटी के साथ दरवाजे के पास ही बैठी रही और सुबह पड़ोसी से कुछ पैसे लेकर अपनी बेटी के साथ मायके आ गई। मीरा का आत्मसम्मान तो शादी के कुछ महीनों बाद से ही छलनी होने लगा था पर वह अपनी बेटी के भविष्य लिए इतना सब कुछ बर्दाश्त कर रही थी। पर जब नरेंद्र ने उसके साथ बेटी को भी घर से बाहर निकाल दिया तो उसे बहुत दु:ख हुआ। उसे यह समझ में आ गया था कि इस घर में उसकी बेटी का कोई भविष्य नहीं है।  उसकी तरह उसकी बेटी भी आत्मविश्वास और आत्मसम्मान से रहित होगी।

मीरा के मायके में उसकी मां अकेली थी। उसके पिताजी तो उसकी शादी के एक साल बाद ही ऑफिस से घर आते वक्त एक्सीडेंट में गुजर गए थे। पिताजी सरकारी नौकरी में थे, इसलिए मां को पेंशन मिल रही थी। मां का गुजारा तो हो जा रहा था पर उस छोटी सी पेंशन में तीन लोगों का गुजारा नहीं हो सकता था। रिश्तेदारों और पड़ोसियों के समझाने पर कि वह अपने ससुराल चली जाये, मीरा ने यह कहकर मना कर दिया, “अब मैं अपनी बेटी को लेकर उस घर में नहीं जाऊंगी। बहुत सालों बाद मुझ में आत्मविश्वास आया है। अब मुझ में इतनी हिम्मत है कि मैं अपने और अपनी बेटी के आत्म सम्मान की रक्षा कर सकती हूं।”

मीरा ज्यादा पढ़ी-लिखी तो थी नहीं कि उसे नौकरी मिलती, पर शादी के पहले उसने सिलाई जरूर सीखी थी। अब मीरा पड़ोसी और मोहल्ले की महिलाओं और लड़कियों के कपड़े सिलने लगी।  धीरे-धीरे उसे सिलाई का इतना काम मिलने लगा कि उसका खर्चा आराम से निकल जाता था।

जब मीरा की सहेली रमा को उसके बारे में पता चला तो वह मीरा से मिलने आई। रमा का मायका और ससुराल इसी शहर में था। रमा को जब मीरा से उसके हालात के बारे में पता चला, तब रमा ने मीरा को सलाह दी, “अभी तो तुम लोगों का खर्चा आराम से चल रहा है। पर धीरे-धीरे बेटी बड़ी हो रही है, उसकी परवरिश और पढ़ाई लिखाई के लिए ज्यादा पैसे की जरूरत पड़ेगी। तुम महिलाओं के कपड़ों की सिलाई तो कर ही रही हो, साथ में खुद कुछ साड़ी और सलवार कुर्ते के कपड़े भी रख लो। आसानी से बिक जायेंगे। मेरे पति कपड़ों के थोक मार्केट में काम करते हैं। मैं उनसे बात करके कम से कम रेट में तुम्हें कपड़े दिलवा दूंगी।” मीरा और उसकी मां को रमा की बात सही लगी थी।

शुरुआत में मीरा कुछ साड़ी और सलवार कुर्ते के कपड़े ही लाई थी। मगर जब वह कुछ ही दिनों में आसानी से बिक गये। तब मीरा धीरे-धीरे ज्यादा से ज्यादा कपड़े लाने लगी। कभी-कभी मोहल्ले या आसपास के घरों में बहू बेटियों के बुलाने पर मीरा और उसकी मां कपड़े लेकर उनके घर भी बेचने के लिए जाने लगी थी। मीरा को सिलाई के साथ कपड़ों की बिक्री से अच्छा फायदा होने लगा था।  पर इस सब में मीरा ने बहुत कुछ सहा भी, मगर फिर भी वह हिम्मत नहीं हारी। उसका आत्मविश्वास कायम था। मीरा अपनी बेटी के भविष्य के लिए कुछ भी सहने को तैयार थी।

अब मीरा की बेटी मानवी बड़ी होकर पढ़ाई कर रही थी। दिन रात रंग-बिरंगे कपड़ों के बीच मानवी का बचपन गुजरा था, इसलिए उसे भी रंग-बिरंगे कपड़ों से बहुत प्यार हो गया था। पढ़ाई पूरी होने के बाद उसने फैशन डिजाइनिंग का कोर्स किया और आज उसने मीरा के नाम से शहर में कई बुटीक खोल रखे थे। शहर में उनके बुटीक की एक अलग पहचान थी। बेटी मानवी के साथ मीरा भी बुटीक की देख-रेख करती थी।

आज मीरा को अपना संघर्ष भरा सफर बार-बार याद आ रहा था कि जिस दो साल की बेटी के साथ मीरा को उसके पति ने रात को घर से धक्के मार कर घर से निकाल दिया था, आज उसी बेटी को मीरा ने अपनी हिम्मत और साहस से यहां तक पहुंचा दिया। आज बेटी को इतना बड़ा सम्मान मिलने जा रहा था, जहां देश विदेश के लोग शामिल होने आए थे। मीरा यह सब देख कर बहुत गर्व महसूस कर रही थी।

मीरा अतीत के पन्ने पलट ही रही थी कि स्टेज से उसकी बेटी मानवी का नाम पुकारा गया। तभी मीरा की मां ने उसके हाथ पर अपने हाथ रखकर प्यार से थपथपाया और बेटी मानवी मीरा का दूसरा हाथ पकड़ के पुरस्कार लेने के लिए स्टेज की तरफ बढ़ गई थी। आज तालियों की गड़गड़ाहट के बीच मां-बेटी आत्मविश्वास और आत्मसम्मान से लबरेज़ थीं।

मूल चित्र : Marketplace Designers via Canva Pro

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