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अरे शादी के बाद सब ठीक हो जाएगा!

हमें शादी में कोई कमी नहीं चाहिए। सगाई की तैयारियां तो बिल्कुल भिखारियों की तरह करी थीं। नाक कटवा दी थी हमारी बिरादरी में तुम लोगों ने...

हमें शादी में कोई कमी नहीं चाहिए। सगाई की तैयारियां तो बिल्कुल भिखारियों की तरह करी थीं। नाक कटवा दी थी हमारी बिरादरी में तुम लोगों ने…

दीवारों को शून्य सी ताकती जा रही थी सुमन। अचानक मीरा दीदी के गीतों ने जैसे उसे लंबी नींद से जगाया था। 

सुन आई री अचम्भा, बन्ना दरवज्जे से लम्बा।

उसकी दादी कुतुब मीनार, उसका बाबा जैसे खम्भा,

 उसकी अम्मा कुतुब मीनार, उसका बापू जैसे खम्भा,

 सुन आई री अचम्भा, बन्ना दरवज्जे से लम्बा।

हंसी ठिठोली करती सुमन की भाभियां उसे खींच कर बाहर ले गईं। सभी के पांव लोकगीतों पर थिरक रहे थे सिवाय सुमन के। सूखी डाली की भाती उसका चेहरा मुरझाया सा दिख रहा था। दुल्हन वाली चमक उसके चेहरे से कोसों दूर थी।

दिमाग में बस अबीर के तीखे शब्द चल रहे थे, “सुमन कह देना अपने पापा से। हमें शादी में कोई कमी नहीं चाहिए। सगाई की तैयारियां तो बिल्कुल भिखारियों की तरह करी थीं। नाक कटवा दी थी हमारी बिरादरी में तुम लोगों ने…”

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जब से शादी पक्की हुई थी अबीर ने एक भी बार प्यार से सुमन से बात नहीं की थी। बस एक ही रट लगाए हुए था, चीज़ें ऐसी होनी चाहिए, वैसी होनी चाहिए। सुमन ने अपने पिताजी से कई बार बोला अबीर के परिवार और अबीर को लेकर, पर उसके पिताजी उसकी कहां सुनने वाले थे। उन्होंने बोला, “अरे शादी के बाद सब ठीक हो जाएगा।”

शादी का दिन आया और सुमन की शादी धूमधाम से निपट गई। कई सारे मान मनोव्वल और तीखे व्यंग्यों के साथ सुमन अपने ससुराल पहुंच गई। घर में कदम रखते कुछ समय ही बीता था कि उसकी सास ने सबके सामने बोला, “अरी बहू! तेरी मां भिखारन है क्या? कैसा सामान दिया है? ये तो हम अपने नौकरों तक को ना दें।”

सास के तीखे शब्दों से सुमन अंदर तक हिल गई। सासु मां की बात पूरी हुई भी नहीं थी कि चार और रिश्तेदारों ने तीखे व्यंग्य कर सुमन के अरमानों को पूरी तरह से रौंद दिया था। 

सुहागरात की सेज पर बैठी सुमन को अब पता चल चुका था कि उसे ना किसी प्रेम की अनुभूति होने वाली है और ना उसे किसी के प्यार के दो शब्द सुनने को मिलेंगे। उसको अच्छे से समझ में आ गया था कि हर देखा ख़्वाब हकीकत नहीं होता। आज उसे अबीर की छुअन भी गुलाब के कांटों सी प्रतीत हो रही थी। पैरों से मसले फूलों की भांति सुमन ने अपनी ससुराल की पहली रात को बिताया। 

दूसरे दिन पूरे जोश के साथ पुरानी बातों को अनदेखा करते हुए, सुमन ने अपनी दूसरी पारी की शुरुआत की। सभी बड़ों के आशीर्वाद से उसने घर की कमान संभाली। पर अभी भी घर के लोगों का वही हाल था। सुमन जितना उन्हें खुश करने की कोशिश करती, उससे ज्यादा उसे अपमान के घूंट पीने पड़ते। दहेज़ और पैसों के लिए ताने सुनना आम बात हो गई थी। 

अबीर ने तो सुमन से हनीमून के लिए पैसों का इंतेजा़म उसके परिवार से करने को कहा। झूठी डिग्री, फर्जी बातों का भी खुलासा शादी के बाद हुआ, तब भी सुमन हर बात को नजरंदाज कर रिश्तों को समेटने की कोशिश करती रही। 

यहां तक कि इन सभी बातों में अबीर का साथ तो उसे दूर-दूर तक नहीं दिखता था। भद्दी गालियां, मायके वालों का अपमान तो उसकी दिनचर्या में आ गया था। ऐसा नहीं था कि उसने अबीर से बात करने की कोशिश नहीं की थी पर अबीर को हर बात में उसके मायके वालों या सुमन की ही गलती दिखाई देती थी। 

अपनी दूसरी बिदाई में सुमन ने ठान लिया था कि इस बार अपने घर वालों से कोई ना कोई हल निकालने को कहेगी। तंग आ चुकी थी वो रोज़ के तानों से और उसे समझ नहीं आ रहा था आखिर अबीर ने उससे शादी ही क्यूं की थी जब उसे प्यार नहीं था। क्या ज़िंदगी में धन का मोह प्यार से ज्यादा होता है?

घर पहुंचते ही सुमन ने आप बीती सुनाई। ससुराल के तानों और अबीर की झूठ सच की पोटली को उसने सबके सामने खोल कर रख दिया। आज सुमन के पिता को अपने गलत होने का एहसास हो रहा था। काश! शादी से पहले सुमन की बातों को गंभीरता से लिया होता। काश! उन भूखे भेड़ियों के बीच अपनी गुड़िया को ना भेजा होता। आत्मग्लानि हो रही थी आज सुमन के पिता को। 

“नहीं रहेगी मेरी बेटी उन दहेज लोभियों के बीच। एक बार गलती कर चुका हूं,अब दुबारा उस घर नहीं भेजना अपनी गुड्डो को।  जहां घर की लक्ष्मी की इज्ज़त नहीं, उस रास्ते नहीं जाना। बहुत लड़कियां तलाक के बाद अपने घर रहती हैं और तू कोई बोझ नहीं मेरी लाडो…”

अपने पिता की बातों का मान रखते हुए सुमन ने कहा, “पर पापा मैं अब नौकरी करके अपने पैरों खड़ी होना चाहती हूं। अपने खोए हुए आत्म-सम्मान को वापस लाना चाहती हूं। जब ज़िंदगी में दूसरा मौका मिल रहा है तो मैं किसी पर आश्रित रहकर नहीं जीना चाहती। आज सुमन के पिता को अपनी बेटी पर गर्व हो रहा था और सुमन अपने इस फ़ैसले से खुद को हल्का महसूस कर रही थी। 

दोस्तों! हम सभी समाज में फैली कुछ कुरीतियों के शिकार ज़रूर होते हैं, बस अपने अंदर हौसला रखें हर विषम परिस्थिति से लड़ने का। आपको मेरी कहानी कैसी लगी अपने विचार जरूर रखें। 

मूल चित्र : zysman from Getty Images via Canva Pro

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