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फ़िल्में इत्यादि
शॉर्ट फिल्म ‘दहेज़ का स्कूटर’ बहुत ही प्यारे अंदाज़ में अपनी बात रखती है!

मानते हैं ना आप भी शार्ट फिल्म 'दहेज़ का स्कूटर' की इस बात को, 'प्रथाओं का क्या है कोई मान के चले तो इच्छा, न माने तो रीत।' 

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क्या पुलेला गोपीचंद के बिना साइना नेहवाल की बायोपिक पूरी हो सकती है?

साइना नेहवाल की इस बायोपिक फ़िल्म में अमोल गुप्ते ने भावुकता पर इतना फोकस किया है कि उसमें उनका वर्ल्ड चैपियन बनने का संघर्ष खो गया है।

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पगलैट: क्या ये एक पढ़ी-लिखी होनहार बहू की कहानी है?

आस्तिक की मौत से उसकी तेहरवीं तक संध्या की ज़िन्दगी कैसे बदलती है? पगलैट और भी कई गंभीर मुद्दों को बहुत ही हलके-फुल्के अंदाज़ में कहती है।  

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अगर विधवा को रोना ना आये तो? इसी बात का जवाब ले कर आ रही है फिल्म पगलैट

उम्मीद है कि पगलैट भी फिल्म विधवाओं के जीवन से जुड़े सोशल बैरियर पर कड़ी चोट कर सके और उन्हें भी जीवन में रंग भरने का एक मौका दे सके!

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स्त्री की सीक्वल फिल्म रूही में चुड़ैल तो महिला ही है पर कुछ नयेपन के साथ

शानदार कामेडी हॉरर फिल्म रूही में सबसे अच्छी खूबी यह है कि इसमें चुड़ैल तो महिला ही है पर वह अपने स्वतंत्र अस्तित्व के बारे में भी सचेत है।

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द मैरिड वुमन: खुद की तलाश में एक शादीशुदा महिला की कोशिश

समलैंगिकता का अपराध श्रेणी से निकलने के बाद दो महिलाओं के आकर्षण और सामाजिक बंधनों को “द मैरिड वुमन” दिखाने में कामयाब होती है।

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