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तुम्हारे गुस्से का कारण मैं नहीं तुम खुद हो…

"अरे यार हो जाता है गुस्से में। लेकिन मैं तुमसे प्यार भी तो करता हूं तुम तो जानती हो कि मैं गुस्से पर कंट्रोल नहीं कर पाता।"

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“अरे यार हो जाता है गुस्से में। लेकिन मैं तुमसे प्यार भी तो करता हूं तुम तो जानती हो कि मैं गुस्से पर कंट्रोल नहीं कर पाता।”

बहुत दिनों से संध्या के दिल और दिमाग मे एक लड़ाई चल रही थी कि आखिर वो राकेश की आदत को सुधारे कैसे? लेकिन क्यों वो कोई बच्चा तो नहीं जो उसकी आदत सुधारी जाए। क्यों बर्दाश्त करती हूँ मैं इतना उस का अत्याचार?

क्यों क्या कैसे के सवालों से संध्या का दिल दिमाग उलझ कर रह गया था क्योंकि वो उसकी आदतों और व्यवहार से परेशान हो चुकी थी। पहले-पहले तो सब कुछ अच्छा था लेकिन दिन पर दिन सब बदलने लगा।

संध्या को लगता था कि शायद समय के साथ साथ सब कुछ बदलकर ठीक हो जाएगा। लेकिन राकेश की आदत तो दिन पर दिन खराब होती चली गयी। पहले जो कभी कभी की बात हुआ करती थी अब वो हर रोज उसके साथ होने लगा। राकेश हर बात में संध्या का अपमान करता, छोटी-छोटी बातों में उस पर हाथ उठा देता।

एक अजीब बात ये भी थी कि वह गुस्सा शांत होते कहता, “अरे यार हो जाता है गुस्से में। लेकिन मैं तुमसे प्यार भी तो करता हूं तुम तो जानती हो कि मैं गुस्से पर कंट्रोल नहीं कर पाता।”

लेकिन आज कमरे में अपने कटे होठों से खून साफ करती संध्या ने निश्चय कर लिया कि उसको क्या करना है? उसने खुद को आईने में निहारा और कहा, “संध्या तू कमजोर नहीं है। राकेश की बातो में आकर बहुत कुछ खोया है तुमने, लेकिन अब और नहीं। अब बस!”

उसने राकेश के कपड़े निकालकर ब्रीफकेस में भर दिए और सोसायटी गेट पर वॉचमैन के पास रखते हुए कहा, “राकेश शाम को आये तो ये सामान उनको दे देना और आज के बाद कभी मेरे फ्लैट में उनको आने मत देना।” कहकर संध्या वहाँ से तेज कदमों से अपने फ्लैट के अंदर आ गयी।

संध्या एक आत्मनिर्भर और आधुनिक विचारों की महिला थी उसकी इसी आधुनिक सोच और आत्मनिर्भरता ने उसके मन के अंदर शादी जैसे बंधन में ना बंधने का निर्णय लिया।

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संध्या के माता-पिता ने बहुत समझाया, मान मनउअल किया लेकिन संध्या ने उनकी एक ना सुनी। उसने शादी करने से ये कहकर इनकार कर दिया कि मुझे किसी रिश्ते में बंधकर रहना मंजूर नहीं। गुस्से में संध्या के माता-पिता ने संध्या से बात करना छोड़ दिया और कहा, “फिर आज से हमारा तुम्हारा कोई रिश्ता नहीं।”

राकेश के प्यार में अंधी संध्या माता-पिता से रिश्ता खत्म करके राकेश के साथ लिव इन रिलेशनशिप में रहने लगी, जहाँ उसको राकेश से एक बेटा हुआ। राकेश शुरू-शुरू में तो बहुत प्यार से बात करता रहता और संध्या का ख्याल भी रखता। लेकिन धीरे-धीरे उसने संध्या को कमांड करना शुरू कर दिया। वो किससे बात करेगी, कहाँ जाती है, संध्या के हर काम मे अब राकेश ने टोका-टाकी शुरू कर दी थी। धीरे-धीरे करके उसने संध्या के पैसों से घर खर्च लेकर उसके निजी खर्चे तक सब संध्या के सिर आ गया।

राकेश अपनी पूरी तनख्वाह अपने माता-पिता के पास गांव भेज देता और संध्या के पैसों पर ऐश करता। बेटा हो जाने के बाद और पहले भी उसने ना तो संध्या का न ही बच्चे का कभी कोई ख्याल रखा।

लेकिन कल रात जब उसने नीचे सोसायटी की पार्टी में सबके सामने उसके ऊपर हाथ उठाया तो संध्या पूरी तरह से हिल गयी। और आज एक बार फिर सुबह सुबह ही उस पर हाथ उठाया राकेश ने। तब बहुत दिनों से चल रहे अपने दिल और दिमाग की लड़ाई में उसने ये निश्चय किया कि अब वो राकेश के साथ नहीं रहेगी। वो अकेली ही काफी है अपने बेटे के लिए, एक गलती कर चुकी है लेकिन अब दूसरी गलती नहीं करेगी। और अब उसको एक पछतावा भी था कि काश उसने अपने माता-पिता की बात मान ली होती।

और फिर शाम को जैसा उसने सोचा था, वॉचमैन ने इंटरकॉम पर फोन किया, “मैडम राकेश सर नीचे हंगामा मचा रहे हैं। प्लीज आप नीचे आकर उन्हें समझाइए।”

संध्या फोन रखकर नीचे गयी तो राकेश ने कहा, “संध्या तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई मुझे फ्लैट से निकालने की? याद रखो कि अगर मैंने तुम्हें छोड़ दिया तो तुम कहीं की नहीं रह जाओगी। समझीं?”

संध्या ने मुस्कुराते हुए कहा, “मिस्टर राकेश तुम भूल रहे हो कि ये फ्लैट मेरा है,और मैंने तुम्हारे विनती करने पर तुम्हें इस फ्लैट में रहने की इजाजत दी थी क्योंकि तुम इस शहर में नए थे और तुम्हारे पास सिर पर छत नहीं थी। तो मेरे फ्लैट पर तुम्हारा कोई अधिकार नहीं।

और अब दूसरी बात तुम ये कि मुझे क्या छोड़ोगे? मैं तुम्हें छोड़ चुकी हूं। वैसे भी तुम्हें शायद याद नहीं कि हमारी शादी नहीं हुई। तो तुम मेरी चिंता छोड़ो और जाओ कही पहले अपने लिए रहने की छत ढूंढो।

लेकिन आज के बाद मेरे फ्लैट के इर्द-गिर्द भी नजर मत आना वरना अगर मैं अपने पर आ गयी तो तुम सोचो तुम कहीं के नहीं रहोगे। ये बात तुम बहुत अच्छे से जानते हो। तो अगर चाहते हो कि कोई और तमाशा ना हो और आज रात सलाखों के पीछे ना गुजारनी पड़े, तो चुपचाप अपना बैग उठाओ और निकलो यहाँ से। समझे?”

कहकर संध्या वहाँ से चली आयी।

प्रिय पाठकगण, उम्मीद करती हूँ कि मेरी ये रचना आपको पसंद आएगी। कहानी पूर्णतया काल्पनिक है। कहानी का उद्देश्य किसी की भावना को आहत करना नहीं  है। किसी भी प्रकार की त्रुटि के लिए क्षमा प्रार्थी हुँ।

मूल चित्र : Screenshot from short film The Wedding Saree, YouTube

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