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मुझे भी अपने पति को देखना है…

"अरे! मैं भी तो देखूं आखिर किस चूहे से शादी हो रही इस शेरनी की", मीरा लड़कपन में बोली। मीरा को कौन सा उसे मां की दी सलाह याद आ रही थी।

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“अरे! मैं भी तो देखूं आखिर किस चूहे से शादी हो रही इस शेरनी की”, मीरा लड़कपन में बोली। मीरा को कौन सा उसे मां की दी सलाह याद आ रही थी।

“सुन मीरा! अब तेरी शादी तय हो गई। महीने भर में हाथ पीले होने वाले हैं, तो ये जो बत्तीसी काढ़े खड़ी रहती है ना वो सब छोड़ दे और ज़रा नजाकत ला अपने बात करने में। अपने भाइयों के साथ खेल-खेलकर लड़कपन आ चुका है तेरे अंदर। कुछ भी बोल देती है बिना सोचे समझे। वहां भी अगर ऐसे बोलेगी तो लोग सोचेंगे लड़की के अंदर संस्कार नहीं है।” दमयंती जी अपनी बेटी मीरा को समझाए जा रहीं थीं क्यूंकि कुछ ही समय रह गया था उनकी बेटी के विवाह को।

बेटी कितनी भी पढ़ी-लिखी या समझदार हो पर दूसरे के घर जाने के डर से माता-पिता बेटी को संस्कार का पाठ पढ़ाना नहीं भूलते। यही सब मीरा के साथ भी हो रहा था।

मीरा अभी भी छत पर पक्षियों को उड़ते देख रही थी। उसे ना मां की बातें सुनाई दे रही थी और ना ससुराल जाने का ही कोई डर सता रहा था। बात भी तो कोई आज के समय की नहीं जो बच्चे मोबाइल लेकर शुरू हो जाएं बात करना। अपने पास तो बस एक साधन था वो पत्र व्यवहार के रुप में। पर वो भी किसी को शादी से पहले लिखना पाप जैसा समझा जाता था।

तो भई! इधर सलोने सजन घोड़ी पर सवार होकर निकल चुके थे अपनी सलोनी दुल्हनियां को लिवाने। रनबीर किसी पुराने जमाने के हीरो से कम ना दिख रहे थे। उनकी शान ही अलग थी और बारात देख हर कोई उनके रूप की तारीफ़ करते थक नहीं रहा था।

“अरे मीरा! तेरे तो भाग्य खुल गए क्या सलोना सजन मिला है”,  मीरा की सहेली उसे छेड़ते हुए बोली।

समय भी उन दिनों ऐसा था कि शादी से पहले माता-पिता तय कर देते थे। कौन लड़का-लड़की को मिलाता था। बड़ों की ज़ुबान को ही महत्व दिया जाता था। इधर सखियों की बात सुनकर मीरा के पेट में तो दर्द उठना चालू हो गया।

“अरे! मैं भी तो देखूं आखिर किस चूहे से शादी हो रही इस शेरनी की”, मीरा लड़कपन में बोली। तेज तो थी ही मीरा और कौन सा उसे मां की दी सलाह याद आ रही थी।

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किसी तरह शादी के कर्मकांडो से निवृत हो सब बहू को साथ बिदा कर घर चल दिए। पालकी में बैठी मीरा अभी भी अपने साड़ी के पल्लू को गुस्से से कुतरी जा रही थी, “बड़ा आया… ऐसा क्या रंग रूप जो सहरे में छुपा के रखा है। अरे! दुल्हन थोड़े ही हो जो लाज आ रही कि सबके सामने मुंह दिखाई हो। कैसे देखूं मेरा तो मन मचला जा रहा और ऊपर से ये घर कब आएगा।” (सोचती मीरा की पालकी मंदिर के सामने आकर रूकी।)

सामने सासू मां (राजेश्वरी जी) दोनों को मंदिर प्रांगण में ले जाकर भगवान के आशीर्वाद लेने के लिए साथ खड़ी थी। मीरा लंबा पल्लू डाले भारी-भरकम साड़ी को संभाले लपटी जा रही थी जैसे कंबल को लपेट देते हैं। कनखियों से झांकती मीरा दाएं-बाएं रनबीर को देखने की कोशिश किए जा रही थी। मीरा की सास ने भांप तो लिया था पर मीरा की बचकानी हरकतों के वो भी मजे ले रहीं थीं।

अचानक! उन्होंने मीरा को छेड़ ही दिया, “बहू! किसे ढूंढ रही हो तुम?”

आखिर अपनी बेबाकी के लिए मशहूर मीरा से ना रहा गया, “रनबीर को ढूंढ रही हूँ माजी। मेरी सखियां बोल रहीं थीं कि बड़े बांके सजीले हैं और रूप रंग में तो किसी हीरो से कम ना हैं। तो मुझे भी अपने पति को देखना है।”

मीरा की बचपने वाली बातें सुनकर सभी को एक साथ हंसी आ गई। तभी साथ खड़ी सासूमां बोलीं, “ये ले देख ले अच्छे से अपने पति को, फिर ना कहना दिखाया नहीं।”

सासू मां का कहना था कि रनबीर और वहां खड़े सभी लोग जोर से ठहाके लगा हंस पड़े। आज इतने सालों के बाद मीरा के चेहरे पर यौवन का निखार दिखा था। एक भरी पूरी नव यौवना वाले भाव यकायक उसके चेहरे पर दिख गए। या यूं कहें आज की बात ने उसके अल्हड़पन को कहीं दूर फेंक दिया। अब ये गुल्ली डंडे और लड़कपन की कोई जगह ना दिख रही थी।

अचानक से इतने साल बाद मीरा को वो सभी चीजें याद आईं। आज भी रनबीर या दमयंती जी मीरा को जब चिढ़ाते हैं तो मीरा के गाल गुलाबी हुए बिना नहीं रहते।

प्रिय पाठकगण! आपकी कौन सी प्यार भरी यादें आपको गुदगुदाती हैं। मेरे साथ ज़रूर अपनी पुरानी या नई स्मृतियों को ताज़ा करें।

मूल चित्र : Photo by DreamLens Production from Pexels

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