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अब घर के सारे काम नई भाभी करेगी…

Posted: दिसम्बर 3, 2020

घर के हालात देख अनिमेष दंग रह गया। दोनों बहनें आराम से टीवी देख रही थीं। माँ शायद छत पे पड़ोसन से बातें कर रही थी और रिया…

एक भरे पूरे घर में रिया की शादी हई थी, सास ससुर, जेठ जेठानी और दो छोटी नंदे और पति अनिमेष। जेठजी दूसरे शहर में अपने परिवार के साथ रहते थे सिर्फ तीज त्यौहार पे उनका आना जाना होता था। रिया शादी के बाद अपने ससुराल के माहौल के साथ ताल मेल बिठाने की कोशिश में लगी रहती थी।

मेहमानों के जाते ही जिस दिन से रसोई की सारी जिम्मेदारी रिया को उसकी सासूमाँ ने सौप दी उस दिन के बाद रिया की सास और नन्द रसोई का रास्ता ही भूल बैठी थीं। सिर्फ खाने के टाइम या कुछ स्पेशल बनाना हो तब ही वो रसोई में जाती थीं।

रिया ने अपने मायके में भी खाना बनाया था तो उसे खाना बनाने में कोई परेशानी नहीं होती थी लेकिन यहाँ ससुराल में परिवार बड़ा था और मदद कोई ना करता। मायके में तो माँ से रिया को बहुत मदद मिल जाती थी।

दिन भर के कामों से रिया थक जाती, लेकिन चेहरे पे एक भी शिकन नहीं आने देती। अनिमेष अपनी पत्नी को अकेला भरी गर्मियों में भी रसोई में खड़ी देखता तो अपनी बहनों को टोक देता, “दिन भर गप्पे मारती हो! अगर थोड़ी थोड़ी मदद भी कर दो तुम दोनों अपनी भाभी की तो रिया को आराम मिल जायेगा।”

“क्या भाई! भाभी के आने पर भी हम ही काम करें तो क्या फायदा भाभी का?” अनिमेष कुछ और कहने को होते तो उसकी माँ बीच में आ बेटे के बदल जाने के आरोप लगाने लग जाती और अनिमेष मज़बूरी में चुप हो जाता।

कुछ महीने बीते होंगे कि रिया की तबीयत थोड़ी ख़राब सी रहने लगी।  सुबह सुबह जी मिचलाता रहता ना कुछ खाने का दिल करता, ना बनाने का। ठण्ड के दिन थे जब सासूमाँ को रिया ने बताया, “माँजी जाने क्यों तबीयत ठीक नहीं रहती, थकावट लगी रहती है।”

“इस उम्र में तुम्हें दो लोगों के काम में थकावट हो रही है बहु? एक हम थे संयुक्त परिवार में रहते थे और सारा दिन चूल्हे के सामने बैठते थे, फिर भी कभी थकावट नहीं होती थी।”

सासूमाँ के तीखे तेवर देख रिया चुप हो गई और उसी शाम खाना बनाते हुए रिया को तेज़ चक्कर सा आ गया और वो बेहोश सी हो गई। वो तो शुक्र था ईश्वर का अनिमेष कुछ काम से रसोई में आये जब उन्होंने रिया को देख तुंरत संभाल लिया।

डॉक्टर को दिखाने पे पता चला रिया गर्भवती थी, “आपकी पत्नी बहुत कमजोर है। खून की भी कमी है। ऐसे में इनके आराम और खाने पीने का बहुत ध्यान रखना होगा।”

घर आते ही अनिमेष ने सबको कड़े शब्दों में चेतावनी दे डाली, “रिया को पूरा आराम करने को कहा गया है और रिया तुम किसी भी चीज के लिये उठने की जरुरत नहीं। चुप से कमरे में आराम करोगी। मैं बच्चे और तुम्हारे सेहत के साथ कोई रिस्क नहीं ले सकता।”

अनिमेष का कड़क रुख देख उसकी माँ बहनें चुप ही रही और हफ्ते दो हफ्ते तक रिया को कुछ करने नहीं दिया। उसके बाद उन्हें रिया का आराम और अपना काम खटकने लगा।

“देख बहु इससे ज्यादा सेवा हम नहीं कर सकते अब थोड़ा हाथ पैर हिलाया कर बहु वर्ना नार्मल डिलीवरी नहीं होगी और ऑपरेशन करवाना पड़ जायेगा।”

सासूमाँ की बातों से रिया को दुःख तो हुआ फिर घर का माहौल और अनिमेष नाराज़ ना हो इसलिए अनिमेष के ऑफिस जाने के बाद धीरे धीरे घर के कामों में लग जाती थी।

एक दिन अनिमेष डॉक्टर को दिखाने की बात रिया को बताना भूल गया और दोपहर में रिया को लेने अनिमेष अचानक से घर आ गया। घर के हालत देख अनिमेष दंग रह गया, दोनों बहनें आराम से टीवी देख रही थीं। माँ शायद छत पे पड़ोसन से बातें कर रही थी और रिया आंगन में बैठी बर्तन धो रही थी।

“ये क्या रिया तुम ये क्या कर रही हो? डॉक्टर ने कहा है ना तुम्हें बेड रेस्ट के लिये?” अनिमेष नाराज़ हो दोनों बहनो और रिया को डांटने लग गए। इतने में उसकी माँ भी शोर सुन आ गई।

“क्या बात हो गई अनिमेष? इस तरह चीख क्यों रहा है अपनी बहनों पर?”

अपनी माँ को देख अनिमेष ने मुश्किल से खुद को नियंत्रण में रख, रिया और अपनी बहनों को उनके कमरों में भेज दिया।

“ये सबको कमरों में क्यों भेज दिया? जो बात होगी सबके सामने होगी। अपनी बीवी की इतनी फ़िक्र और हमारी रत्ती भर भी नहीं?” क्रोध से चीखती हुई अनिमेष की माँ ने कहा।

“बस करो माँ, सबको कमरों में इसलिए भेजा ताकि आपकी इज़्ज़त बनी रहे।”

“क्या मतलब?”

“मतलब ये माँ, कि जो आपने भाभी के साथ किया था, वो मैं रिया के साथ नहीं होने दूंगा। भाई की चुप्पी और भाभी का सीधापन, इन सब का अपने इतना फायदा उठाया कि भाभी ने अपनी अजन्मी संतान खो दी। आपके अत्याचारों का ही नतीजा है कि भाई आज घर से दूर हो गए।

जब आपको पता है रिया कमजोर है तो ये कहाँ तक सही है कि वो अकेली सारा काम करें और आप सब आराम करो? इतने महीनों से जब तक रिया ठीक थी, उसीने सब कुछ संभाला था। तो क्या कुछ महीने आप तीनों मिल के एक रिया का ध्यान नहीं रख सकते?

सोच लो माँ मैं भाई नहीं हूँ। मैं अपनी होने वाले बच्चे को किसी भी क़ीमत पे नहीं खो सकता और रिया के साथ कुछ भी गलत हुआ तो इसकी जिम्मेदारी भी आप सब की होगी।  एक बहु से आप हाथ धो बैठी हैं, संभल जाये माँ। अभी भी वक़्त है, कहीं ऐसे ना हो दूसरी बहु से भी हाथ धो बैठें।जिन बेटियों के बल पे आप ये कर रही हैं, वो बेटियां तो अपने ससुराल चली जायेंगी। फिर क्या करोगी आप? मैं चाहता तो ये सबके सामने कह सकता था लेकिन आप मेरी माँ हैं, आपकी इज़्ज़त मेरी इज़्ज़त है।”

अपनी माँ को सच्चाई का आईना दिखा अनिमेष रिया को ले डॉक्टर के पास चला गया।

प्रिय पाठक कहानी का सार ये है कि सिर्फ बेटियां ही नहीं बहुओं की भी परेशानी को समझना चाहिये। अगर बहु स्वस्थ होने पे सास की सेवा कर सकती है, तो सास बहु का ख्याल क्यों नहीं रख सकती? 

मूल चित्र : Sujay Govindraj from Getty Images Signature, via CanvaPro 

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