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आखिर क्यों एक बेटी नहीं है हक़दार उसके मायके और ससुराल में सम्मान पाने की?

Posted: July 24, 2020

आखिर क्यों बेटियों को उनके घर में और ससुराल में उनके हक़ का प्यार और सम्मान नसीब नहीं होता? संजना की भी कुछ ऐसी ही बेबसी की कहानी थी। 

“आप तो ऐसे खुश हो रही हो भाभी जी…जैसे आपके घर बेटी नहीं बेटा हुआ है!” ममता के देवर ने उस से कहा। 

“देवर जी! हमारे घर में बेटी नहीं थी, ऊपर वाले ने पहली औलाद बेटी दे दी है। हम तो बहुत खुश हैं। आपके भाई भी बहुत खुश हैं, हमारे बेटे के बाद अब हमारे घर में एक परी ने जन्म लिया है। हम सब ऊपर वाले का जितना शुकिया अदा करें कम है…बेटा-बेटी होना हमारे हाथ में तो नहीं है और आखिर आज के ज़माने में बेटियां किसी से कम हैं क्या? ममता ने मुस्कुराते हुए अपने देवर को जावब दिया। 

“बोल तो आप ठीक ही रहीं हैं भाभी! मगर बेटों की बात ही अलग होती है, खैर जब आप लोगों ने अपनी बहू को सर पर बिठा रखा है तो पोती को तो…”देवर जी ने ममता को ताना मारते हुए कहा। 

“आप फिक्र ना करें देवर जी ऊपर वाले ने पवन को हमारी गोद में भी बहुत सालों बाद दिया था और उसकी औलाद भी बहुत दुआ करने के बाद आई है। हम किसी की नज़र नहीं लगने देंगे। हमारे घर में इतने दिनों बाद लक्ष्मी आईं हैं हम सब तो बहुत खुश हैं। बस मुझे डर है कहीं हमारी बच्ची को किसी की गंदी नज़र न लग जाए.”। इस बार ममता ने थोड़े गुस्से में देवर जी को जवाब दिया था और देवर जी समझ गए कि भाभी का इशारा किसकी तरफ है। 

क्या बेटियां बेटों से कम है?

ममता जी का एक ही बेटा था पवन, उसके बाद उनके घर में कोई औलाद नहीं हुई। जबकि उनके देवर के घर में तीन बेटे और एक बेटी थी। देवर को अपने बेटों पर बड़ा घमंड था इसलिए अक्सर ममता जी को बातें सुनाते रहते थे। ममता जी भी उनकी अच्छे से खबर ले लेतीं थीं। 

पवन की शादी के कितने सालों बाद आख़िरकार ममता जी के घर में एक बेटी ने जन्म लिया था। वो और उनके घर में सब ही बहुत खुश थे मगर ममता जी के देवर को यही बात अच्छी नहीं लगी कि बेटी के पैदा होने पर ये सब इतने खुश कैसे हो सकते हैं?

ममता जी की पोती बहुत चंचल थी। सब को अपने पीछे लगाए रहती थी। धीरे-धीरे परी बड़ी होती जा रही थी, परी के बाद सोनू ने भी आकर परिवार पूरा कर दिया मगर वह परी कि जगह नहीं ले पाया। 

परी को उसके दादा-दादी ने इतना प्यार दिया था कि पवन भी हस कर कहता- 

“अम्मा! मुझे तो लगता है आप लोगो ने परी को मुझसे ज्यादा प्यार दिया है।”

“हाँ!” ममता जी हस्ते हुए जवाब दिया करती थी।

“हम तो बेटी के लिए तरस रहे थे परी ने आकर वो कमी पूरी कर दी। तुम्हारे बाबा को बेटियां बहुत पसंद हैं तो उन्होंने पोती को ही बेटी बना लिया वैसे भी बच्चे के बच्चे ज्यादा प्यारे होते हैं। तकलीफ तो बस उस वक्त होती है जब चाहे जितना प्यार कर लो मगर ससुराल अगर अच्छा नहीं मिला तो दिल हर वक़्त छलनी हुआ रहता है।” यह बोलते-बोलते उनकी आंखों में आंसू आ गए थे, शायद उन्हें कुछ याद आ गया था। 

आखिर क्यों बेटियों को उनके हक़ का प्यार नसीब नहीं होता?

ममता जी के देवर की एक ही बेटी थी मगर ना तो उसे घर में प्यार मिला और ना ही सम्मान। हमेशा बेटों को ही आगे रखा जाता। इस वजह से नन्ही सी संजना हमेशा सहमी सहमी रहती थी। अगर उसकी गलती ना भी होती तब भी उसी को डांट पडती थी। ये बात उसके भाइयों को अच्छी तरह से पता चल गई थी इसलिए हर गलती को उसके सर पर डाल दिया जाता था।  

छोटी सी उम्र में ही उसकी शादी के लिए लड़का देखा जाने लगा। पवन के पापा ने अपने भाई  को बहुत समझाया कि बच्ची कि उम्र अभी शादी के लायक नहीं हुई है और वो कमज़ोर भी है मगर हुआ वही जो संजना के मम्मी पापा ने चाहा था।  

एक तो उम्र कम थी ऊपर से हमेशा मायके में डरी सहमी सी रहती थी इसलिए संजना ससुराल में कभी गलत के खिलाफ आवाज़ ही नहीं उठा पाई। इस वजह से वहाँ भी उसे हमेशा तिरस्कार ही मिला। वो लोग भी समझ गए थे कि संजना कोई बात मायके में बताती नहीं है और अगर बता भी देगी तो कौन उसका साथ देगा। इसीलिए उसका तिरस्कार करते रहते थे।  

संजना का साथ देना वाला कोई नहीं था…

एक दिन खबर आई कि संजना बहुत बीमार है हास्पिटल में है। सब भागे-भागे उसे देखने गए। संजना इतनी कमज़ोर लग रही थी कि बिदाई पर ना रोने वाले भाई उसे देख कर रो दिए। मम्मी भी वहीं एक कोने में बैठ कर आंसू बहाने लगीं। उन सब को देखकर उसने मुस्कुराने की भी कोशिश की मगर कमज़ोर होने की वजह से मुस्कुरा भी ना पाई। 

“आप लोग आ गए?” बहुत मुश्किल से धीमी आवाज में संजना ने कहा।  

“ये सब कैसे हुआ? तुमने हमे कुछ बताया क्यों नहीं?” सबसे बड़े वाले भाई को शायद अपनी गलती का एहसास हो रहा था। 

वो कुछ नहीं बोली बस एकटक अपने माँ को फिर बाबा को देख रही थी। बाबा अभी भी वैसे ही  खड़े अपने समधी से कुछ बात कर रहे थे शायद समधी जी सफाई दे रहे थे कि वो अपना ख्याल नही रखती थी। ठीक से कुछ खाती-पीती नहीं थी। बाबा ने एक बार उसकी तरफ पलट कर देखा फिर अपने समधी जी के साथ बाहर निकल गए। 

इस बार उसके सूखे होठों पर मुस्कान भी ना आ पाई…

संजना की तकलीफ देख के हो रही थी उसके भाइयों को आत्म-ग्लानि 

“तू जल्दी से ठीक हो जा हम तुझे अपने साथ ले चलेंगे। फिर तुझे पहले की तरह परेशान करेंगे, एक बार तू पहले की तरह ठीक हो जा मेरी बहन हम भी तेरे गुनहगार हैं। हम बहुत शरमिंदा हैं। तुझे इस हाल में देखकर हमे अपनी गल्तियों का एहसास हो रहा है। हम तुझे अपने साथ ले चलेंगे। बस तू जल्दी से ठीक हो जा।” संजना के भाई ने कहा। 

“भाई!” इस बार पूरी ताकत से संजना ने कहा। 

“हाँ! मेरी छुटकी!” भाई के आंखों में आंसू आए जा रहे थे। 

“इन लोगों से मेरी बेटी को ले लेना और कभी भी इनके पास ना जाने देना नहीं तो कुछ वक्त के बाद एक और लाश…”

“छुटकी!” इस बार मम्मी चीख पडीं थीं। ऐसे तो ना बोल बेटा। 

“भाई! मेरी बच्ची को अपने पास रखना, या फिर ताईजी को दे देना, जैसे उन्होंने अपनी बहू को रखा है वैसे वो मेरी बेटी को भी रखेंगी। आप वादा करो कि उसे मेरी तरह डरपोक और…” संजना की सांस उखड़ रही थी मगर अपनी बेटी की उसे फिर भी बहुत फिक्र थी।

कोई भी बेटी कभी इतनी कमज़ोर न हो…

“मेरी बेटी को मेरी तरह ना बनाना भाई!” उसने भाई से वादा लेना चाहा तो भाई ने भी उसके पतले और कमज़ोर हाथों को अपने आंखों से लगा लिया। संजना का पति वहीं खड़ा था एक हरफ़ भी नहीं बोला और ना ही संजना ने उससे बात करने की कोई कोशिश की। 

फिर वो सब को छोड़ कर चली गई थी। बाबा को पता नहीं संजना के ससुर ने क्या पट्टी पढाई कि उन्होंने उसके ससुराल वालों के ख़िलाफ़ कोई कम्पलेन नहीं होने दिया। लेकिन इस बार संजना के बड़े वाले भाई ने बहन से किया हुआ वादा पूरा किया। उसकी बेटी को अपने साथ लेकर दूसरे शहर चला गया। सुनने में आया था कि उसकी पत्नी ने भी संजना की बच्ची को अपना लिया था। 

इसलिए ही शायद ममता जी अपनी पोती को इतना मजबूत बनाना चाहती थीं कि कोई भी उसकी कमज़ोरी का फायदा ना उठा पाए , न ही उसके दिल में ये रहे कि इस दुनिया में उसका साथ देने वाला कोई नहीं है। 

ममता जी कि बस यही आस थी की “ऊपर वाले सबकी बच्चियों की किस्मत अच्छी करना, मायके के साथ ससुराल में भी उसे बहुत मान सम्मान इज़्ज़त दिलवाना। कोई भी लड़की बेटी होने की वजह से या बेटी पैदा करने की वजह से संजना जैसी ना बने…”

मूल चित्र – Provoked (2016)

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