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कुछ रिश्ते निभाने का अब मेरा दिल नहीं करता…

"ये रिश्ते, ये नाते, मेरी समझ में नहीं आते। सच्ची बताऊँ दिल भर गया है इनसे। मन करता है एक लम्बी नींद सो जाऊँ कभी आंख ना खुले कोई ना दिखे..."

“ये रिश्ते, ये नाते, मेरी समझ में नहीं आते। सच्ची बताऊँ दिल भर गया है इनसे। मन करता है एक लम्बी नींद सो जाऊँ कभी आंख ना खुले कोई ना दिखे…”

ट्रिगर वार्निंग: इस लेख में आत्मघाती विचारों का विवरण भी है जो आपको परेशान कर सकता है  

“ये रिश्ते मेरी समझ में नहीं आते। कभी लगता है इनसे अच्छा तो कोई है ही नहीं। जितना प्यार ये करते हैं और कोई कर ही नहीं सकता। फिर कोई आंटी, कोई चाची, कोई ताई, कोई मौसी दिल दुखा ही देती हैं। फिर ऐसे लगता है इन लोगों से अच्छे तो गैर होते हैं, जो काम करवाने के बाद थैंक्स तो बोल देते हैं।

अपने रिश्तेदारों के लिए जान भी लगा दो तो भी कुछ लोग दिल पर चोट लगाने का मौका नहीं छोड़ते। ये रिश्ते, ये नाते, सच्ची बताऊँ दिल भर गया है इनसे। मन करता है एक लम्बी नींद सो जाऊँ कभी आंख ना खुले कोई ना दिखे…”

“नैना! क्या हो गया? पागल हो गई हो क्या? कैसी बातें कर रही हो तुम? अपने बच्चों के बारे में भी नहीं सोचतीं? जो दिल में आता है बोलती रहती हो”, रेशम ने नैना को झकझोरते हुए कहा जो पता नहीं कहाँ गुम थी बस बहते आँसू के साथ बोले जा रही थी।

“मैंने कहीं पढ़ा था यार रेशम! उसने लिखा था कि मैं एक बार मरना चाहता हूँ मर के देखना चाहता हूँ कि मेरी मौत पर कौन-कौन रोता है। कभी-कभी मेरा दिल भी यही करता है। मुझे देखना है…”

“बस बहुत हो गया! रेशम करीब-करीब चिल्लाई…हुआ क्या है? मुझे भी नहीं बताओगी? मैं तो तुम्हारी बेस्ट फ्रेंड हूँ ना…”

उसकी बात पर नैना ने हल्की सी मुस्कान के साथ उसको देखा पर बोली कुछ नहीं और एकदम से नैना हिचकियाँ लेकर रोने लगी। रेशम ने उसे सीने से लगा लिया। उसे पता था कि वो अंदर से कितनी दुखी है।

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पैदा होने के कुछ साल बाद माँ-बाप अलग हो गए। माँ ने तो दूसरी शादी कर ली और …और बाबा दूसरे शहर चले गए। वो फिर कभी नहीं आए पता नहीं दूसरी शादी की या नहीं मगर नैना से कभी नहीं मिले। माँ ने भी नैना को अपने साथ नहीं रखा क्योंकि उनके पति और ससुराल वाले नहीं चाहते थे कि नैना उनके घर रहे। इस तरह बेचारी नैना कुछ साल चाचा-चाची के साथ रही। मगर किस्मत में तो अभी भी धक्के खाना लिखा था।

चाची की बहन चाची के पास आकर रहने वाली थी क्योंकि उसे पढ़ना था और चाची ने उसे अपने पास बुलाया था। कमरे दो ही थे और चाची का कहना था कि उनकी बहन आएगी तो माँ वगैरह तो आएंगे ही मिलने तो अगर रुकना होगा तो कहाँ रहेंगी?

चाचा थोड़ा परेशान थे। उसके सर पर हाथ रख कर बोले भी थे कि बेटा हो सके तो अपने चाचा को माफ़ कर देना। वो बस चाचा को देखकर रह गई। उसने तो कोई कसर नहीं छोड़ी थी चाची को खुश करने में दौड़-दौड़ कर उनका काम करती। जो काम नहीं कर पाती थी, उसे भी करने की कोशिश करती। फिर?

मासी ने अपने साथ रख लिया। चाची के साथ तीन साल रही थी करीब-करीब सारा ही काम आ गया था इसलिए मासी को आराम हो गया। कपड़े धोने हो, कपड़े प्रेस करने हो खाना बनाने में हाथ बँटाना हो, सब काम कर लेती और मासी सदके वारी रहतीं। दूसरों के सामने खूब तारीफ करतीं कि नैना को वो कितना मना करती है फिर भी वो सारे कामों में आगे-आगे रहती है, और एक उनकी खुद की बेटी, वो काम से कितना भागती है!

ये सब सुनकर नैना कितना खुश होती कि मासी अपनी बेटी से ज्यादा उससे प्यार करती हैं और वो और कामों में लग जाती। मासी ने घर में ट्युशन लगवा दिया गया था क्योंकि वो स्कूल तो नहीं जाती थी मगर नाम लिखवा दिया था तो परीक्षा दे देती थी। इस तरह दसवीं तक वो पढ़ गयी।

देखने में काफी अच्छी थी इसलिए रिश्ते भी आने लगे। एक  घर से रिश्ता आया तो वो लोग तो पीछे ही पड़ गए। इस तरह वो शादी करके ससुराल आ गयी।

किस्मत ने यहाँ भी पीछा नहीं छोड़ा। पति मिला तो बहुत गुस्से वाला। उनका गुस्सा बहुत खराब था। जो हाथ में आता उठा कर फेंक देते। बच्चों पर भी हाथ उठा देते। वो खामोश रहते-रहते थक चुकी थी। अब वो भी बोल देती। चिल्लाने लगती, रोने लगती, फिर खुद ही खामोश हो जाती। इस पर भी सास आफत मचा देती कि हमें तो बोला गया था कि लड़की के मुंह में जबान ही नहीं है मगर इसको देखो कैसे जवाब देती है।

चाची और मासी याद आती तो जाकर मिल आतीं। रेशम मासी के घर के पास ही रहती थी वहीं से उनकी दोस्ती हुई थी। इत्तफाक से नैना के घर के पास ही उसकी भी शादी हो गयी थी इसलिए दोनों बराबर मिल लेते थे।

रेशम नैना से बहुत प्यार करती थी उसे पता था कैसे मासी तारीफ कर कर के उससे काम करवातीं हैं और नैना भी तो कुछ समझती ही नहीं थी। अपनी मासी के बारे में कोई गलत बात बर्दाश्त ही नहीं कर पाती थी।

मगर अब उसे सब समझ आ गया था कि सबने उसका फायदा उठाया था। मासी के पास कुछ दिन के लिए रहना ही तो चाहती थी तो कैसे उन्होंने कहा, “ससुराल में दिल लगाओ, ये ना हो कि तुम्हारे साथ भी वही हो जो तुम्हारी माँ के साथ हुआ था। भाग-भाग कर मायके ना आया करो, वैसे भी आजकल रुही अपने बच्चे के साथ आई है, अभी दस दिन वो और रहेगी।

दामाद जी बोल रहे थे काम में मन नहीं लगता तुम्हारा सास के साथ जबान भी चलाती हो। देखो नैना मेरी तरह सब नहीं होते। तुम चाहे जो करती थी मैं कुछ नहीं बोलती थी, मगर सब बर्दाश्त नहीं करेंगे। सही से रहो, नहीं तो अब मैं अपने पास नहीं रख पाऊंगी तुमको।”

नैना रो रही थी। रेशम उसे संभालने की कोशिश कर रही थी मगर आज वो उससे भी नहीं संभल रही थी। नैना की मासूमियत का सबने ही फायदा उठाया…

अपना घर मिल कर भी नहीं मिला था। पति ने कभी साथ नहीं दिया, सास को मुफ्त की नौकरानी मिल गई थी जो चाहतीं बोल देतीं। बेटा भी उन्ही की तरफ बोलता था। हाँ इन सबमें बच्चे जरूर उसके साथ होते, कैसे सहमे से उसके आंचल से लगे खड़े रहते। माँ के आंसू साफ करते। माँ को प्यार करते। वो भी अपने बच्चों को देख कर बहल जाती मगर फिर अगले पल वो टूट जाती…

“बहुत जी लिया सबके लिए अब मैं सिर्फ अपने लिए अपने बच्चों के लिए जिऊँगी। बहुत कमज़ोर पड़ चुकी, बहुत रिश्ते निभा लिए, मगर अब बस अब नहीं। अब मैं और मेरे बच्चे…मैं और मेरे में वही आएगा जिसे रिश्ते की कद्र होगी। जो सच्चा प्यार करेगा चाहे वो पति हो सास हो मासी हो या फिर चाची। कोई भी…”

उसने मजबूती से ठान तो लिया मगर इस पर कितना  चल पाएगी ये तो वक़्त और किस्मत ही बताएगी। काश अब तो किस्मत नैना के साथ दगा ना करे बस यही दुआ है कि उसने जो ठाना है किस्मत उसका साथ दे दे उसके हिस्से की खुशी उसे मिल जाए…

इमेज सोर्स: Still from Dying to be Me – A Short Film by Deva Katta/YouTube 

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