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चाहे कुछ भी हो, मैं हार नहीं मानूंगी!

इस लड़ाई को लड़ते-लड़ते न ही वो कमज़ोर पड़ेगी, न ही कभी हार मानेगी बल्कि योद्धा की तरह इन चक्रव्यूहों को भेदकर इस लड़ाई पर जीत हासिल करेगी।

इस लड़ाई को लड़ते-लड़ते न ही वो कमज़ोर पड़ेगी, न ही कभी हार मानेगी बल्कि योद्धा की तरह इन चक्रव्यूहों को भेदकर इस लड़ाई पर जीत हासिल करेगी।

बंधनों में बँधती ही जा रही है
वो स्त्री है जो रिश्ता निभा रही है
मिटाओगे उसका अस्तित्व क्या तुम
जो ख़ुद को तुझमें बसा रही है…

अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ना एक स्त्री के जीवन का हिस्सा हो गया है। भले ही हम महिला सशक्तिकरण के क्षेत्र में कितना ही आगे निकल गए हों, पर आज भी उसे माँ के गर्भ से लेकर ससुराल में पहुँचने तक, या यूँ कहें कि जीवन समाप्ति तक अपने अस्तित्व की लड़ाई हर रोज़ लड़नी पड़ती है।

यह लड़ाई शहरों की अपेक्षा ग्रामीण क्षेत्र की महिलायें आज भी लड़ रही हैं। जिन्हें आज भी रीति-रिवाजों और अंधविश्वासों की बेड़ियों ने जकड़ रखा है।

बेटी का जन्म ख़ास न होकर बोझ बढ़ाने की सोच तक सीमित है। कुछ परिवार आज भी अपनी बेटियों को उन स्कूलों में नहीं जाने देते जहाँ महिला शिक्षिका न होकर पुरूष शिक्षक हैं। इसके साथ-साथ देहात क्षेत्र का माहौल आज भी बहुत बदल नहीं पाया है। बहुओं से अपेक्षा बेटे को जन्म देने की ही की जाती है।

माँ-बाप के दिए संस्कारों के कारण कितनी भी मानसिक प्रताड़नाए क्यों न दी जाती हों पर समाज में अपनी बेईज्जती के डर से माँ-बाप उन्हें आवाज़ उठाने से रोक देते हैं। ऐसे ससुराल में उस बेटी का, उस स्त्री का प्रति दिन एक इम्तिहान की होता है। लेकिन इन इम्तिहानों में भी अपनी ज़िंदगी को गुलज़ार बनाए रखने की वो कोशिश करती रहती है और अपने मन को समझा लेती है।

कितनी दुःख की बात है यह हम सभी के लिए। जो सृष्टि के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है, जिसके बिना परिवार का समाज का अस्तित्व असम्भव है, वह आज भी अपने अस्तित्व को बचाने की लड़ाई लड़ रही है। लेकिन इस लड़ाई को लड़ते-लड़ते न ही वो कमज़ोर पड़ेगी, न ही कभी हार मानेगी बल्कि योद्धा की तरह इन चक्रव्यूहों को भेदकर इस लड़ाई पर जीत हासिल करेगी।

ज़िंदगी के कई इम्तिहान बाक़ी हैं
मेरे हौसलों की उड़ान बाक़ी है
हारूँगी नहीं कमज़ोर न समझ
अभी होना जहाँ में मेरा नाम बाक़ी है।

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मूल चित्र : Pexels

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Swati Kanojia

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