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बिना जाने समझे किसी के चरित्र का हनन करना कितना उचित है?

आज समाज चाहे कितना भी आगे बढ़ रहा हो, पर लोगों की सोच में मझे विशेष परिवर्तन देखने को नहीं मिलते। अफ़सोस की बात है कि महिलाएं ही महिलाओं को नहीं बख्शतीं।

आज समाज चाहे कितना भी आगे बढ़ रहा हो, पर लोगों की सोच में मझे विशेष परिवर्तन देखने को नहीं मिलते। अफ़सोस की बात है कि महिलाएं ही महिलाओं को नहीं बख्शतीं।

बदलता वक़्त हम सब के लिए यदि अच्छाइयाँ लाता है तो वो बुराइयाँ भी साथ लेकर आता है। जहाँ एक तरफ कुछ लोग आपकी कामयाबी की प्रशंसा करते हैं वहीं कुछ लोग आपके चरित्र की गणना भी कर रहे होते हैं।
वो आप में वो तमाम बुराइयाँ देखने और दिखाने लग जाते हैं जो उन्हें अपनों में दूर-दूर तक दिखायी नहीं देतीं।  फिर चाहे उनमें लाख कमियाँ हों लेकिन आप के किरदार को मिर्च-मसाला लगाकर ऐसे पेश किया जाएगा जैसे दुनिया की सबसे घटिया स्त्री और लड़की हैं आप।

कई बार यह बात सत्य साबित होती और अक्सर दिखायी देती है कि एक महिला ही महिला की सबसे बड़ी दुश्मन बन जाती है। माफ़ कीजिएगा, यह कहना उचित तो नहीं, पर मानना पड़ेगा कि ये झूठ नहीं है। ऐसे कई उदाहरण मेरी निजी ज़िंदगी में मैंने पाए हैं, पर यहाँ मैं किसी और का नहीं बल्कि अपना ही एक अनुभव आप लोगों के साथ साँझा करना चाहती हूँ।

मैं पेशे से एक शिक्षिका हूँ। मुझे अपने पद की मर्यादा और गरिमा का बख़ूबी ख़्याल है, लेकिन यह समझदार दुनिया हमें वक़्त बेवक्त बता ही जाती है कि कितनी अच्छी सोच वह हम कामयाब लड़कियों और स्त्रियों के लिए रखती हैं।

आज समाज कितना भी आगे बढ़ रहा है, पर लोगों की सोच में विशेष परिवर्तन देखने को नहीं मिलते। अफ़सोस की बात है कि मैंने महिलाओं और पुरुषों की अत्यंत पिछड़ी सोच को देखा है। कामयाब लड़की और औरत कुछ लोगों के लिए सिर्फ़ इतनी ही सोच तक सीमित है कि वह चालाकी से किसी को भी अपने इशारों पर नचा सकती है।

हमारे कामयाब होने से समाज में एक अलग तरीक़े का डर मैं अब महसूस कर रही हूँ, जैसे हमें अपनी संस्कृति का लिहाज़ नहीं, हमें रिश्तों की क़दर नहीं, हम प्यार के लायक़ नहीं, हम शादी के लायक़ नहीं, और उन चीज़ों के लायक़ नहीं जिनकी हक़दार बाकि लोग हैं, ख़ासकर वो औरतें जो घर पर रहकर परिवार का ध्यान रखती हैं,  कभी ग़लत के ख़िलाफ़ आवाज़ नहीं उठतीं, अपने फ़ैसले ख़ुद नहीं करतीं, बल्कि उन्हीं रीति-रिवाजों पर चलती आयीं हैं जो सदियों से चले आ रहे हैं। ये तुलना क्यों की जाती है मुझे आज तक समझ नहीं आया।

हाल ही में मुझे एक नया अनुभव मिला मेरे अपनों से, कि मैं उनके रिश्ते बिगाड़ने का काम कर रही हूँ! फ़ेसबुक जैसी सोशल नेटवर्किंग साइट पर किसी जान-पहचान वाली महिला की बिना सोचे समझे फ़्रेंड रिकुएस्ट एक्सेप्ट करना ही था कि मेरे चरित्र को नया नाम भी मिल गया। मुझे अंदाज़ा भी न था इस बात का कि जिनकी पोस्ट उम्र में बड़े होने के लिहाज़ और उनको सम्मान देने के नाते मैंने पसंद की वो ही मेरे चरित्र के लिए नया नाम लेकर आएंगीं।

अफ़सोस है मुझे ऐसे रिश्तों से जो आपको समझते क्या, जानते भी नहीं हैं। मैं उनकी सोच और समझ पर क्या लिखूँ? मैंने उनकी फ़्रेंड रिरिकुएस्ट एक्सेप्ट की और वो मेरे चरित्र को नया नाम दे गया और न करने पर भी वह उस महिला के मन में मेरा ऐसा ही चरित्र गढ़ देता जो मुझे जानती तक नहीं।

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लोगों की ऐसी निम्न स्तर की सोच देखकर मुझे निराशा होती है कि न जाने हम किस ओर हैं! एक तरफ़ हम हर क्षेत्र में आगे बढ़ रहे हैं, दूसरी तरफ़ हमारी सोच का स्तर भी निम्न होता जा रहा है। मैं मानती हूँ कि इसमें दोष भी कुछ गलत लोगों का है जिनके कारण यह भावना सभी के मन में अंकित है पर कुछ लोगों के कारण सभी को एक ही सोच के दायरे में रखना कहाँ तक उचित है?

जब चर्चा के किरदार हुए
फ़क़त चरित्र पर वार हुए
पर जो हमने किया नहीं
फिर कैसे हम क़सूरवार हुए

मूल चित्र : Canva

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Swati Kanojia

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