साथ समय के चल रही हूँ, ऐ ज़िंदगी तेरी कहानी मैं ख़ुद ही लिख रही हूँ

Posted: September 11, 2019

टूट गयी जो गुड़िया वक़्त के आघात से, उसको फिर से गढ़कर नयी सी कर रही हूँ, समय को बदलकर
साथ समय के चल रही हूँ,
ऐ ज़िंदगी तेरी कहानी मैं ख़ुद ही लिख रही हूँ। 

समय को बदलकर
साथ समय के चल रही हूँ
ऐ ज़िंदगी तेरी कहानी मैं ख़ुद ही लिख रही हूँ ।

टूट गयी जो गुड़िया
वक़्त के आघात से
उसको फिर से गढ़कर
नयी सी कर रही हूँ
ऐ ज़िंदगी तेरी कहानी मैं ख़ुद ही लिख रही हूँ।

बैठे थे मुझको जो
कमज़ोर मान के
उनके नाम भी
निशानी कर रही हूँ
ऐ ज़िंदगी तेरी कहानी मैं ख़ुद ही लिख रही हूँ।

करे सितम जो वक़्त भी
हँस कर ही सह रही हूँ
ऐ ज़िंदगी तेरी कहानी मैं ख़ुद ही लिख रही हूँ।

मानोगे तुम भी मुझको
सोना खरा ही एक दिन
इम्तिहान की अगन में
हर पल जो जल रही हूँ
ऐ ज़िंदगी तेरी कहानी मैं ख़ुद ही लिख रही हूँ।

मूल चित्र : Pexels 

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