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तुम्हारे कुर्ते का गला कितना गहरा था…

"नहीं सुनना मुझे कुछ... इतनी भीड़ में तुम पर ही क्यों नजर गई उनकी? कुछ तो किया होगा तुमने? यूं ही तो कोई परेशान नहीं किया करता..."

“नहीं सुनना मुझे कुछ… इतनी भीड़ में तुम पर ही क्यों नजर गई उनकी? कुछ तो किया होगा तुमने? यूं ही तो कोई परेशान नहीं किया करता…”

“नहीं मैं पूछना चाहता हूं, आखिर क्या कह दिया था तुमने?”

“पर सुनो तो सही जो मैं तुमसे कहना चाहती हूं कि…”

“नहीं तुम सिर्फ इतना बताओ मुझे कि तुम्हारे कपड़े का गला था कितना गहरा?”

“लेकिन सुनो तो… मैंने…”

“नहीं सुनना मुझे कुछ… इतनी भीड़ में तुम पर ही क्यों नजर गई उनकी? कुछ तो किया होगा तुमने? तुम्हारा ही कोई दोष होगा? यूं ही तो कोई किसी को बेवजह परेशान नहीं किया करता…”

हैरान सी मैं देर तलक उसे देखती रही।

धीरे से मैंने कहा, “शिक्षक हो ना तुम? देते हो गलत और सही को परखने की शिक्षा?

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हां, क्या कह दिया था मैंने? क्या पहना था मैंने? निगाहें नीचे थी या ऊंची थी? आवाज कैसी थी मेरी? मेरे आत्मसम्मान को जो वो कुचला कर चला गया, नहीं देखा तुमने?

बेवजह! कहीं भी और किसी भी तरह, कोई भी, कुछ भी कर या कह सकता है मुझे? क्यों?

तुम्हारी सीख या सोच के दायरों से जरा सा भी अलग अगर मैं तुम्हें दिखाई दूं, तो पूरा हक है तुम्हें मुझे कुचलने का? क्यों? क्योंकि एक औरत हूं मैं?

क्या फायदा तुम्हारा इतना शिक्षित होने का जब इंसान को इंसान समझने का नजरिया तुम में है ही नहीं?

हां गलत हूं मैं? गलत हूं मैं कि सोचा मैंने कि तुम तो समझ लोगे किस अग्नि परीक्षा से रोज गुजरती हूं मैं…

पर नहीं तुम उन अनपढ़ लोगों की सोच से भी ज्यादा नीचे हो

पढ़ लिख तो गये हो तुम…पर सोच पर है तुम्हारी अब भी कितनी पहरे?

समझ चुकी हूं मैं कि पढ़ाई-लिखाई या किसी भी बड़े ओहदे पर बैठा हुआ कोई भी व्यक्ति…हां कोई भी…

हां, उसकी भी सोच हो सकती है बहुत ही सड़ी गली…

भेद भाव करने वाले का तो होता कोई धर्म नहीं… तुम तो भेड़ की खाल में छुपा हुआ शैतान हो…

जो करते हैं दिखावा मदद और हमदर्दी का…

अरे, तुमसे बेहतर तो अब लगते है मुझे वो, जो देते हैं मेरे मुंह पर ताना…चाहे हो वो कितने भी नीच…

कम से कम अपना बनकर वो करना तो नही चाहते, मेरे अस्तित्व को अपने अधीन…

नहीं अब नहीं करूंगी मैं तुम जैसे किसी पर भी आंख बंद कर के भरोसा…

समझ चुकी हूं अब मैं, पढ़ाई लिखाई या ऊंचे ओहदे का मानिसिकता से नहीं होता कोई भी सरोकार…

मेरे आत्मसमान को तो शायद सुख वो भी दे सखता है, जिसके हाथ में हो एक टूटा हुआ खिलौना!”

मूल चित्र : Still from Short Film Anti-Dowry Film/Benshi Films, YouTube (for representaional purpose only)

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