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तुम्हारी बेबी दीदी अब बड़ी होने को है…

"दी, मैं बहुत खुश हूंँ आपके लिए। याद है आपको एक दिन हम लोग अकेले थे और आपने क्या कहा था? वो बात फांस सी चुभी थी मन में।"

“दी, मैं बहुत खुश हूंँ आपके लिए। याद है आपको एक दिन हम लोग अकेले थे और आपने क्या कहा था? वो बात फांस सी चुभी थी मन में।”

“एक लड़की को देखा तो ऐसा लगा…” गाना बजने लगा था मन में, पहली बार जब देखा था बेबी दी को। मैं तो बस देखती रह गई थी, इतनी सुंदर और प्यारी लेकिन, मानो भगवान बना तो कोई अनुपम कृति रहे थे, पर कमर तक बनाते-बनाते शायद थक गए और बाकी का हिस्सा बिना देखे बना डाला …

बेबी दीदी का कमर से नीचे का हिस्सा काफी छोटा था मानो बच्चे का शरीर हो, चलने फिरने से लेकर अन्य क्रियाकलापों में कहने लायक तो कोई परेशानी नहीं थी…पर उनकी औरों से ये भिन्नता हर जगह उन्हें मजाक का पात्र बना देती। लेकिन वो बहुत मजबूत और जीवट वाली लड़की थीं, हार नहीं मानतीं कभी।

मैं बहुत बार मिली उनसे पर उनके चेहरे पर कभी परेशानी, हार जैसे भाव देखे ही नहीं। सिवाय एक बार, जब वो अकेली थीं घर पर और मेरा जाना हुआ था उनके घर, जब मैं गई थी तो लगा शायद वो रो रही थीं।

“दी, आप रो रही थीं क्या? आपका गुलाबी चेहरा लाल पड़ा हुआ है”, मैंने पूछ डाला।

“नहीं रे… रो नहीं रही थी। बस यही सोच रही थी कि मांँ-बाप ने कितने प्यार से बेबी नाम रखा होगा, कभी सोचा भी ना होगा कि उनकी बेबी, सारी जिंदगी बेबी ही बनी रह जाएगी, कभी बड़ी ना हो पाएगी।”

उनकी ये बात भीतर तक उतर गई मेरे।

इतना सुंदर रूप, गुण, चरित्र और ऐसा शरीर…वो मजाक की पात्र नहीं थीं। मुझे तो लगता था, भगवान ही अपना मजाक बना बैठे थे। तीन बहनों में सबसे बड़ी बेबी दीदी और सबसे छोटा भाई चिराग, मेरी दोस्त रानी तीसरे नंबर की बहन थी।

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पढ़ने लिखने में भी दीदी अच्छी थीं, बहुत जल्दी एक स्कुल में टीचर की नौकरी लग गई उनकी। और कुछ तो होना था नहीं उनके जीवन में, तो नौकरी लगने के बाद माता-पिता भी एक हद तक निश्चिंत हो गए। शादी न तो उनसे कोई करना चाहता था और उस पर डाक्टर ने भी उनकी शादी करने से मना कर रखा था। कारण, डाक्टरों का कहना था कि दीदी के शरीर का निचला हिस्सा बेहद कमजोर है, उनके पैरों में बस अपने ऊपरी शरीर का बोझ उठाने इतनी ही ताकत है। हमारे यहां के ‘शादी के बाद बच्चा’ वाले काम यानि प्रेग्नेंसी हुई तो उनकी जान पे बन आएगी।

ऊपरवाले ने शारीरिक विषमता के साथ-साथ उनकी मानसिक पूर्णता पर भी ग्रहण लगा दिया था।कैसा न्याय था ये।

हर चीज का समय होता है और सामाजिक दवाब भी और भला इंतजार भी तो उम्मीद पे किया  जाता है। धीरे-धीरे नैना दीदी और रानी की भी शादी हो गई। पर कभी मुझे बेबी दीदी के चेहरे पे मलीनता या विषाद ना दिखा। उन्होंने तो अपने जीवन से समझौता कर लिया था, नौकरी के बाद वैसे भी उनका आत्मविश्वास चार गुना बढ़ गया था।

फिर अपनी शादी के बाद मैं भी घर गृहस्थी में रम गई। रानी से कभी कभी बात होती, बेबी दी का हाल पूछना ना भूलती मैं कभी। रानी ने बताया चिराग की भी शादी हो गई, पर उसकी पत्नी की बेबी दी से नहीं बनी तो वो अलग हो गई कुछ ही दिन बाद।।

उस निरीह प्राणी से भी किसी की नहीं बन सकती सुनकर मैं अथाह सोच में पड़ गई। रानी ने बताया कि बूढ़े होते मांँ-पिता काफी परेशान रहते हैं कि आखिर उनके बाद इसका क्या होगा। रानी उन्हें आश्वासित तो कर देती कि वो रख लेगी बेबी दी का ख्याल, पर ये महज आश्वासन था, ये माता पिता भी समझते थे और वो खुद भी। बात तो थी ही परेशानी वाली पर किया भी क्या जा सकता था।

एक दिन अचानक रानी का फोन आया, बोली, “बेबी दी की शादी हो रही है।”

मैंने पूछा, “पर डाक्टर ने तो…”

रानी बोली, “लड़के ने कहा है कि वो लोग बच्चा गोद ले लेंगे। लड़का वैसे कुछ खास तो नहीं करता, अपनी छोटी सी दुकान है, पर अपना मकान है, मांँ है पिता नहीं हैं। अपने ही शहर के हैं और सबसे अच्छी बात की रिश्ता उधर से ही आया है।

सुनकर भरोसा तो नहीं हुआ, पर फिर लगा शायद दी की सुंदरता, सुशीलता, संस्कार और व्यवहार उनकी विषमता पर हावी हो गए हों। उनकी चाहत के अनुसार एक पुरुष का सानिध्य तो मिला उन्हें, पर बार बार मन में खटकता कि आखिर क्या स्वार्थ रहा होगा लड़के का?

माना बेबी दी की नौकरी है, पर कुछ नहीं तो, एक शारीरिक रूप से स्वस्थ साथी की कामना तो हर मनुष्य की आधारभूत आवश्यकता होती ही है, हो सकता है उस लड़के में भी कोई कमी…

खैर, जो भी हो भगवान उनके जीवन में अब खुशहाली लाएं। लेकिन मेरे मन से अनजानी आशंका कभी गई नहीं, जब जब बेबी दी को याद करती, मन सशंकित हो उठता।

लगभग साल भर बाद मायके जाना हुआ। सोचा रानी को फोन करती हूं, बेबी दी का नंबर लेकर एक बार उनसे मिल आती हूंँ। मुझे भी अच्छा लगेगा और वो भी बहुत खुश होंगी मुझे देखकर। पता नहीं कैसी चल रही होगी उनकी जिंदगी…

बेबी दी मेरे आने की बात सुनकर काफी खुश हुईं। उन्होंने अगले ही दिन की छुट्टी लेकर मुझे फोन किया और यहांँ तक बोली कि अकेली कैसे आओगी, तुम्हारे जीजाजी को भेज देती हूंँ। पर मैंने मना कर दिया कहकर कि अपना ही शहर है दी, उन्हें परेशान ना करना मैं आ जाऊंँगी।

बहुत सारी शंकाएं लेकर गई उनके घर। लगा पता नहीं दी के घर का माहौल कैसा होगा, खुलकर बात कर पाएंगी भी या नहीं।

बेबी दी के घर के आगे रिक्शा रूका तो वो बाहर ही खड़ी मिलीं। पहले से भी ज्यादा सुंदरता और आत्मविश्वास से चमकते उनके चेहरे को देखते ही मुझे आभास हो गया कि दी अपने जीवन से खुश हैं।

फल और मिठाइयों के अलावा मैं साड़ी, चूड़ियां, बिंदी, सिंदुर सब-कुछ लेकर गई थी। दी बहुत खुश हुईं। उनकी सास भी मृदुभाषी थीं, प्यार से मिलीं। दोनों सास-बहू ने मिलकर जितना सुस्वादु खाना बना रखा था, उतने ही प्यार से परोसा और खिलाया।

उनके पति भी मेरे मन में बनी छवि से बिल्कुल विपरीत दिखे, देखने में अच्छे और चेहरे से ही सज्जन से लगे। काफी बोलने वाले, हंँसी मज़ाक करने वाले। थोड़ा बहुत मेरे साथ हंँसी मजाक कर वो अपनी दुकान को निकल लिए और बेबी दी और मैं उनके कमरे में आराम करने आ गए।

मैं कुछ कहती पूछती उससे पहले ही बेबी दी बोल पड़ीं, “तुम्हें आश्चर्य हो रहा होगा ना अनु? मुझे भी हुआ था एक बार नहीं बीसियों बार। जब रिश्ता आया तब, जब इनसे मिली तब, जब शादी हुई तब और जब सबकुछ आराम से चलने लगा तब भी।

तुझे पता है, दुनिया में हर जगह उपहास का पात्र बनती रही तो भी उतना दुख नहीं होता था, जितना ये सोचकर होता कि मेरे मांँ-बाप मुझे लेकर इतने चिंतित रहते हैं। इस शादी के लिए हांँ तो मैंने यही सोचकर की कि ऐसे मेरा जीवन कौन सा फूलों की सेज है, बहुत होगा तो थोड़ी और जिल्लत और अपमान सहना पड़ेगा, सह लूंँगी। कम से कम मांँ पिता को कुछ ना दे पाई इतना सा चैन तो दे दूंँ।

बस समझ ले वैसा जुआ खेल गई अनु, जिसमें मेरे पास हारने को कुछ ना था। पर शायद किस्मत भी थक गई थी मुझे सता सता कर। तभी तो अपना प्रतिरूप भेज दिया मेरे जीवन में। ये लोग इंसान बहुत अच्छे हैं, इतना ही कहुंँगी तुम्हें।”

“पर दी, कुछ तो होगा ना इसके पीछे, मेरा मतलब जीजा जी.,.”, मेरा संशय था कि मिटने को तैयार ना था।

“दरअसल, एक वक्त इनकी माली हालत खराब होने के चलते, जिससे इनकी शादी होने वाली थी उस लड़की ने ही शादी से इंकार कर दिया था। नतीजतन इन्होंने प्रण कर रखा था कि अब शादी करेंगे ही नहीं। इनकी दुकान के रास्ते से मेरा स्कुल आना जाना था। ये कहते हैं इन्हें पता ही ना चला कब इन्हें मुझसे प्यार हो गया और बाद में ये जान कर भी कि मैं इन्हें बच्चा नहीं दे सकती, ये अपने फैसले से ना डिगे।

कहा फिर उस लड़की जिसने मुझे इनकार किया, उसमें और मुझमें क्या फर्क रह जाएगा। हमने बच्चा गोद लेने का पंजीकरण करा रखा है, जल्दी ही मिल जाएगा”, दी हुलसकर बोलीं।

“और आपकी सास?”

“वो भी कहती हैं, ‘कहांँ बेटा शादी ही नहीं करना चाहता था और आज इतनी सुंदर सुघड़ बहू है। मैं तो इसका घर बसा देखकर ही खुश हूंँ।’ और तुझे पता है मेरे पति अब मुझसे ज्यादा कमाते हैं और मुझसे कह रखा है कि तुम जब तक नौकरी करना चाहती हो करो, जब छोड़ना चाहो छोड़ देना।अपने परिवार की परवरिश अच्छे से कर सकूंँ इतना कमा लेता हूंँ मैं। मैंने सोचा है एक बार बच्चा आ जाए फिर नौकरी छोड़कर उसे अपना सारा समय दूंगी।”

“आपकी कहानी तो परीकथा सी है दी! इस ज़माने में भी ऐसा होता है क्या?”

“अब भरोसा हो गया है मुझे भी। शुरुआत में तो सब सपने सा ही लगता था। और तो और, इसे प्यार की पराकाष्ठा ही कहेंगे ना कि एक दो बार अपने बच्चे की जिद क्या कर दी मैंने, इन्होंने अपना ही आपरेशन करवा लिया, ये कहकर कि मेरे और मेरी जिंदगी के साथ इतना बड़ा रिस्क नहीं ले सकते ये। इतना अच्छा इंसान तो मैंने देखा ही नहीं अनु”, दी जाने कहां खो गईं बोलते बोलते।

“दी, मैं बहुत खुश हूंँ आपके लिए। याद है आपको एक दिन हम लोग अकेले थे और आपने क्या कहा था? वो बात फांस सी चुभी थी मन में।”

“अच्छी तरह याद है बहना! आज अपने मन से वो फांस निकाल ले…अब जब बेबी का बेबी आ जाएगा तो बेबी भी बड़ी हो जाएगी…”, कहकर दी मुस्कुरा दी।

दीदी के घर आई थी मैं तो मन पर बोझ लिए, पर जाते वक्त खुद को बहुत हल्का और अच्छा महसूस कर रही थी। सच बात है दुनिया में अच्छाई है तभी तो दुनिया चल रही है। काश हर किसी के दुखों का अंत इतना ही सुखद हो।

“बेबी अब बड़ी होने को है!” सोचकर अपने आप मुस्कुरा दी मैं।

दोस्तों, मेरी ये कहानी आप सबों को कैसी लगी, जरूर बताना, आपके विचारों का दिल से स्वागत है।

मूल चित्र : Stiill from Maggi Masala/ South Veg Masala Ad, YouTube 

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