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अगर आज भी मैं पहले जैसी होती, तो क्या आप…

ये तो रूचि है! उसके कॉलेज की सबसे खूबसूरत और स्मार्ट लड़की और तो और उसकी क्रश भी। वैसे क्रश तो वो बहुत लोगों की थी पर किसी को भाव नहीं देती थी।

ये तो रूचि है! उसके कॉलेज की सबसे खूबसूरत और स्मार्ट लड़की और तो और उसकी क्रश भी। वैसे क्रश तो वो बहुत लोगों की थी पर किसी को भाव नहीं देती थी।

“उफ़! पूछो मत कितनी मुश्किल से ट्रेन मिली है। घर का सारा काम निबटाना था। फिर आफिस जाकर बाॅस का वो पैकेट भी लेना था, जो वहां उनके ससुराल पहुंचाना है।”

“खैर, तुम बताओ सारी तैयारी हो गई? नन्हे के बर्थडे की?”

अनिरूद्ध अपनी बर्थ पर बैठा, फ़ोन पर अपनी पत्नी काजल से बात कर रहा था जिसको लाने और अपने बेटे का पहला बर्थडे मनाने अनिरुद्ध अपने घर जा रहा था।

थोड़ी ही देर में एक स्टेशन पर ट्रेन रुकी। अनिरुद्ध की सीट लोअर साइड थी। उसके ऊपरवाली सीट पर  कोई लड़का था और बाकी की चार सीटों पर एक परिवार आया हुआ था। लगभग पैंतीस छत्तीस साल की एक महिला, उसके दो बच्चे, एक उम्रदराज महिला और एक तेरह चौदह साल का लड़का।

बच्चों ने चढ़ते ही हुड़दंग मचाना शुरू कर दिया।

महिला सामान लगाने के बाद सबको आदेश देने लगी। जाने क्यों अनिरुद्ध को उसकी आवाज़ जानी पहचानी लग रही थी, पर मास्क के कारण वह पहचान नहीं पा रहा था। उनकी बातों से जान पड़ता था कि बुजुर्ग महिला सास थीं और उनके साथ वाला लड़का शायद सहायक। सबकी वेशभूषा काफी अच्छी थी, अच्छे घर से लग रहे थे।

वह महिला अपने बच्चों के साथ-साथ, अपनी सास पर भी काफी चिल्ला रही थी और बहुत बेअदबी से पेश आ रही थी। सास को पता नहीं उसका भय था या अपनी और बेइज्जती का डर, जो एक बार भी पलटकर जवाब नहीं दे रहीं थीं।

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अनिरुद्ध अपने दिमाग पर जोर डाल ही रहा था कि कुछ खाने के लिए महिला ने मास्क हटाया।  फिर क्या अनिरुद्ध के तो होश ही उड़ गए।

ये तो रूचि है! उसके कॉलेज की सबसे खूबसूरत और स्मार्ट लड़की और तो और उसकी क्रश भी।  वैसे क्रश तो वो बहुत लोगों की थी पर किसी को भाव नहीं देती थी।

अनिरुद्ध बहुत पढ़ाकू हुआ करता था इसलिए उसकी मदद ले लिया करती थी और उसकी इज़्ज़त भी करती थी पर वो तो उसे दिल दे बैठा था। जिस दिन इज़हार करने गया उसी दिन वो अपनी शादी तय होने के लड्डू लेकर आई थी। अनिरुद्ध कोआज तक लड्डू उतना कसैला कभी नहीं लगा था। पता नहीं क्यों फिर भी उसकी आस, तब तक बनी रही जब तक रूचि की शादी नहीं हो गई।

सोचता शायद कोई फिल्मी ट्विस्ट आ जाए उसकी जिंदगी में और वो उसका हीरो बन जाए पर ना ऐसा होना था और ना हुआ।

जाने कितनी रातें उसने, उसकी यादों में तकिये गीले करके बिता दीं। फिर उसे भूलने के लिए सारा ध्यान पढ़ाई में लगा दिया इसका नतीजा यह हुआ उसे अच्छी खासी नौकरी मिल गई। फिर शादी हुई और उसके बाद नन्हें, पर दिल से उसकी चाहत की खलिश मिटी नहीं। रोज याद आ ही जाती, एक दो-बार और आज तो सामने ही आ गई लगभग, दस सालों के बाद।

मन किया अपना मास्क उतारे और जाकर पूछे उससे, “मैं याद हूं या नहीं?”

पर पता नहीं उसके व्यवहार को देख मन खराब सा हो रहा था। देखने से लग रहा था ज़रूर किसी अफसर की बीबी है और सारी अफसरशाही उसी के सर चढ़कर बोल रही थी। जिसका फ़ोन आता ऐसे बात करती मानों अगला भिखारी हो। सास को तो  उसने जाने कितनी बार ही डपट दिया था।

फिर भी अनिरुद्ध ने सोचा अपना परिचय तो देदे तभी फिर रुचि का फ़ोन बजा, बातों से लग रहा था जैसे उस तरफ शायद उसके पति थे। वह कह रही थी, “कहा था ना आपको, खुद आओ फिर ही जाऊंगी मैं ये शैतान बच्चे और सौ बच्चों की एक बच्ची, आपकी माँ सब मेरे मत्थे। मैं तो तंग आ गई हूँ। सबने नौकरानी बनाकर, जो रख दिया है मुझे…कहे देती हूँ मैं, अगली बार से कहीं जाना आना हुआ तो खुद सब हैंडल करना और ध्यान से सुनो! स्टेशन आ जाना, वरना किसी ड्राइवर को भेज दो अगर ऐसा किया तो मैं ट्रेन में ही छोड़ दूँगी तुम्हारी मां को। शरीर संभलता नहीं और हर जगह जाने को तैयार रहतीं हैं। अब अगर ये नहीं होतीं तो फ्लाइट लेकर आ जाते ना हम लोग?”

और ना जाने  क्या क्या और कितनी देर तक बोलती रही…

कभी की ब्यूटी क्वीन लगने वाली रुचि अब औसत से भी कम लगने लगी थी। वैसे भी जिस स्ट्रेस में वो दिख रही थी,उससे चेहरे की चमक उड़ जाना तो वाजिब ही है। खैर, रंग रूप तो कोई बहुत बड़ी बात नहीं है पर जो उसका व्यवहार और व्यक्तित्व अभी नज़र आ रहा था अनिरुद्ध को वह सोचने पर मजबूर हो गया कि आखिर ऐसा क्या हुआ होगा उसके साथ जो वो इतना बदल गयी?

उसे काजल का ख्याल आ गया अचानक से, कितनी इज्जत करती है वह सबकी। कभी भी अपनी  नौकरी की धौंस जमाने की कोशिश नहीं की उसने  बिल्कुल सादा जीवन जीती है। जबसे नन्हें पैदा हुआ है, एक साल से वह अनिरुद्ध के मम्मी-पापा के पास ही रह रही है ताकी उसकी परवरिश अच्छे से हो जाए। सास-ससुर नहीं माँ-बाप समझती है वो तो उसके माँ-बाप को। हाँ ऐसा नहीं है कि काजल गुस्साती नहीं या लड़ती नहीं पर कभी अपनी मर्यादा से बाहर नहीं जाती। संतुलित सा व्यक्तित्व है उसका।

फिर भी जाने क्यों इतने सालों से वह मृगतृष्णा में जिए जा रहा था।आज उसे पता चला कि हर चमकने वाली चीज सोना नहीं होती,वो तो सोने के पीछे दौड़ रहा था पर उसके पास तो पारस है।अनिरुद्ध दूसरी तरफ मुंह घुमाकर सो गया। बिल्कुल मन नहीं किया रुचि से बात करने का, अपनी ड्रीमगर्ल का असली रूप,उसकी हकीकत जानकर आज वो बहुत अच्छा महसूस कर रहा था। बहुत अच्छी नींद आने वाली थी आज उसे पर उस चक्कर में कहीं वह अपना स्टेशन ना मिस कर दे इसलिए अलार्म सेट कर के अनिरुद्ध चैन की नींद में डूब गया।

कहते हैं न कि ‘दूर का ढोल सुहावना होता है।’ हम हमेशा, जो हमारे पास नहीं है, उसके प्रति एक मृगतृष्णा लिए जीते रहते हैं पर जब हकीकत सामने आती है तब लगता है जो हमारे पास है, वही सर्वश्रेष्ठ है। लकिन एक बात सोचने वाली ये है कि इससे अनुरुद्ध के बारे में क्या कहा जा सकता है? अगर उसकी पत्नी कुछ ऐसा सोच रही होती, तो? अगर रूचि आज भी कॉलेज वाली रूचि होती तो?

इमेज सोर्स – YouTube |Train Crash|Short Film|Ft.Divya Dutta |N.Padmakumar

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