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‘समाज क्या कहेगा’ की सोच पर हथौड़ा मारती है फिल्म शादीस्थान

Posted: जून 14, 2021

 फिल्म शादीस्थान का ये डायलाग बहुत कुछ कहता है, “हम जैसी औरतें लड़ाई करती हैं ताकि आप जैसी औरतों को अपनी दुनिया में लड़ाई न करनी पड़े।”

ओटीटी प्लेटफार्म डिज़्नी प्लस हांटस्टार पर निर्देशक राज चौधरी ने कीर्ति कुल्हारी, के.के मेनन और निवदिता भट्टा़चार्य के साथ एक कहानी सुनाई है ‘शादीस्थान’। जिसकी कहानी में छुपी गहराई आधी आबादी की घुटन से जुड़ी हुई है।

निर्देशक राज चौधरी एक साथ दकियानूसी, सामंती व पितृसत्तात्मक सोच तथा आधुनिक सोच के टकराव को एक साथ अपनी कहानी में पिरोने की कोशिश की है जिसमें वह पूरी तरह से कामयाब भी होते हैं।

कमी खलती है तो बस तमाम कलाकार अपने अभिनय में विषय की गंभीरता व गहराई को अपने चेहरे पर नहीं ला पाते हैं। कीर्ति कुल्हारी बहुत हद तक प्रयास करती है कि वह अपने अभिनय से बांध सके।

कहानी को बांधे रखती है मनोरंजन के साथ उसकी गंभीरता व गहराई के साथ लिखे गए कुछ संवाद, जो पूरी कहानी देखने के लिए रोक कर रखते हैं। मसलन, “पैदा होते ही दबा दो”, “लड़की की शादी होते ही दबा दो”, “मां बनते ही दबा दो”, “इतना दबा दो कि चाहकर भी अपने बारे में न सोचे।”

इसी तरह दूसरा संवाद जो लगभग कहानी के अंत में आता है- “हम जैसी औरतें लड़ाई करती हैं ताकि आप जैसी औरतों को अपनी दुनिया में लड़ाई न करनी पड़े।”

क्या कहानी है फिल्म शादीस्थान की

रूढ़ियों में घिरा हुआ और उसके साथ ही जीने वाला संजय शर्मा (राजन मोदी) अपनी पत्नी कमला शर्मा (निवेदिता भट्टाचार्य) व बेटी आर्शी शर्मा (मेघा शंकर) और संगीतकारों के एक बैंड के साथ मुबंई से अजमेर जाने को मजबूर है क्योंकि उनकी फ्लाइट छूट चूकी है। इस बैंड में गायिका साशा (कीर्ति कुल्हारी), अपूर्व डोगरा (फ्रेडी), जिम्मी (शैनपेन खिमसर) और इमाद (अजय जयंती) है।

रूढ़िवादी परिवार और आधुनिक सोच वाला बिंदास बैंड सफर में अपने ख्यालों को लेकर कभी एक-दूसरे को झेलता है तो कभी एक दूसरे से टकराता है। इसी झेलने और टकराहट में रूढ़िवादी परिवार की बेटी जो एक दिन के बाद ही अठारह साल कि होने वाली है फूट पड़ती है क्योंकि उसकी शादी उसके इच्छा के बिना हो रही है। और आर्शी एक संवाद में साशा से कहती है इस वक्त वह उसके जैसा बनना चाहती है।

पूरे सफर में रूढ़िवादी परिवार के साथ इतना कुछ घट जाता है कि संजय शर्मा और कमला शर्मा अपने अब तक जीवन के बारे में सोचने को मजबूर हो जाते है और अंत में दोनों इस नतीजे पर पहुंचते है, जो कमला शर्मा के संवाद में आता है “अपनी मन की कहूँ तो भाड़ में जाए समाज!”

फिल्म शादीस्थान की कहानी कैसे अपने अंत तक पहुंचती है? रूढ़िवादी परिवार अपने सोच में कैसे बदलाव लाता है? क्या आर्शी की शादी उसके इच्छा के बिना हो जाती है? इस सारे जबाव के लिए आपको फिल्म देखनी होगी, जो चूंकि समाज का आइना रख देती है इसलिए आपको पसंद आएगी।

फिल्म शादीस्थान के महिला किरदार हमारे आस-पास की महिलाएं ही है

शादीस्थान फिल्म के सारे किरदारों में मुख्य किरदार महिला पात्रों का ही है।

साशा (कीर्ति कुल्हारी) का किरदार एक आधुनिक आत्मनिर्भर महिला है जो अपने हिसाब से तय की गई जिंदगी जी रही है। एक तरफ, जहां उसका किरदार उसको मजबूत आत्मनिर्भर महिला के रूप में दिखाना चाह रहा है तो वहीं एक संवेदनशील महिला भी है जो अज़मेर शरीफ के मजार पर दुआ करते समय रोने भी लगती है।

कमला शर्मा (निवेदिता भट्टाचार्य) का पूरा किरदार एक आम महिला का है, जो न चाहकर तमाम रूढ़िवादी ख्यालों के साथ जी रही है क्योंकि उसके पास कोई विकल्प नहीं है। उसकी इच्छा है कि वह सब कुछ छोड़कर कुछ दिनों के लिए कहीं चली जाए, पर कहीं जा नहीं सकती है। एक संवाद में तो वह यहां तक कहती है कि “हमारे समाज का जो चक्रव्यूह है उससे निकल पाना थोड़ा मुश्किल है।” जाहिर है वह समाज के चक्रव्यूह को जानती है पर विकल्प नहीं होने के कारण वह निकल नहीं सकती है।

आर्शी शर्मा (मेघा शंकर) एक युवा लड़की है पर वह कहती है कि अगर उसका बस चले तो वह मरना चाहती है। वह घर से भाग कर अपने दोस्त के चली जाती है, खाना नहीं खाती है, क्योंकि वह घरवालों के अपने शादी करने के फैसले के खिलाफ है। पर अपनी माँ को देखकर कभी स्वयं को आत्मनिर्भर महसूस नहीं करती है। वह अपने बारे में कोई कठोर फैसला नहीं करना चाहती क्योंकि उसे लगता है उसके फैसले का खमियाजा उसकी माँ को भी झेलना पड़ेगा।

अपने आस-पास के सामाजिक महौल को ध्यान से देखे तो ये तीनों किरदार हमारे आसपास मैट्रों में, बसों में, आटो में, मोहल्लों में मॉल में, सब जगह दिख जाती है। ये तीनों किरदार हमारे सामने से गुजरते हैं और अपनी कहानी अपने मौजूदगी में ही बयां कर रहे होते हैं, पर हम देखकर भी देख नहीं पाते हैं।

क्यों देखनी चाहिए शादीस्थान

फिल्म शादीस्थान की कहानी हमारे समाज के साथ इतनी गहरी धंसी हुई है। कहानी ने बड़ी शानदार तरीके से अपनी बात दर्शकों तक पहुंचाने की कोशिश की है कि वर्तमान समय की लड़कियां किस तरह के पारिवारिक व सामाजिक जकड़न से बाहर निकलने को बेताब हैं।

केवल वह ही नहीं उसकी माँ भी इस चक्रव्यूह में अभिमन्यू की तरह फंसी हुई है। वह घायत है, खून से लथपथ है, पर उसको चक्रव्यूह से बाहर निकलने का रास्ता ही नहीं पता है, वह विवश है।

फिल्म के कहानी में बार-बार निर्देशको से अधिक संजीदगी और मेहनत की मांग करती है, जिसकी कमी खलती है।


मूल चित्र: Stills from Shaadisthan trailer, YouTube

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