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बस एक थप्पड़ ही तो मारा! – औरत हो, अब थोड़ा तो सहना सीखो!

Posted: फ़रवरी 6, 2020

बंद दरवाज़ों के पीछे नील-निशान की इतनी अनदेखी कहानियां छुपी हैं कि अगर सामने आ जाएँ तो देव संस्कृति के चोले में सड़ती गलती पितृसत्ता की सोच घृणित कर जाएगी।

बस एक थप्पड़? ये जुमला बड़ा आम है

बस एक थप्पड़ ? ऐसे जुमले बड़े आम हैं। औरत की ज़िंदगी में कहीं न कहीं, कभी न कभी, कोई आ कर ये सलाह दे ही जाता है। और हम औरतें भी इस सलाह को मान लेती है। बरसों से मानती आयी हैं। यहां तक की ये सलाह औरत में होने वाले गुणों की फेहरिस्त में कब तब्दील हो गया इसका पता नहीं चला।

27% औरतें शारीरिक प्रताड़ना की शिकार होती है।

31% शादी शुदा औरतें अपनी ज़िंदगी में शारीरिक व मानसिक प्रताड़ना की शिकार होती हैं।

हिंदुस्तान में हर तीसरी औरत अपने घर या काम काज की जगह पर शारीरिक या मानसिक तरह से प्रताड़ित होती है, होती आयी है और शायद होती रहेगी क्योंकि ‘बस एक थप्पड़ ही तो मारा है। औरत हो थोड़ा सहना सीखो।’ ये कहने वालों की कमी नहीं।

बड़ी शर्मिंदगी के साथ कहने पर मजबूर हूँ कि ये शब्द किसी बड़े करीबी को कहे गए और मैं कुछ नहीं कर पायी।

“शादी दो लोगों के बीच का मामला है। इस तरह भड़काओ मत! अब किसी को तो झुकना पड़ेगा। और आखिर आदमी है, कुछ तो हुआ होगा कि आपा खो कर हाथ उठा बैठा। अब इतनी सी बात पर कोई घर छोड़ता है भला?”

ये सलाह थी घर के बुज़ुर्ग की, और मैं फिर एक बार मन मसोस के रह गयी।

सब कुछ सहना औरत के हिस्से आता है

औरत पर हाथ उठाना अच्छा नहीं, किन्तु ये किसी अपराध की श्रृंखला में नहीं आता। और अपराध की शृंखला में आएगा भी कैसे? जिस समाज में ‘ढोल गवाँर शूद्र पशु नारी, सकल ताड़न के अधिकारी’, जैस दोहे को ढोल मंजीरे के साथ हर मंगलवार को औरतें ही सप्रेम, श्रद्धा से गाती हो, वहाँ एक थप्पड़ मायने नहीं रखता।

इसके पहले की कोई मुझे इस दोहे का कोई दूसरा रूपांतरण सिखाये, व्हाट्सप्प या इंटरनेट पर इसके विवरण मैंने भी पढ़े हैं, किन्तु ‘शादी की गाड़ी को आगे ले जाने के लिए थोड़ा बहुत ऊपर नीचे सहना पड़ता है’ ये कहने वालों की कमी नहीं, इसे हम में से कोई नकार नहीं सकता। और ये ऊपर-नीचे, थोड़ा-बहुत, कम-ज्यादा, नोक-झोंक, सब कुछ सहना औरत के हिस्से आता है।

हर विषय को नज़र अन्दाज़ करना

बहुत सोचने पर भी इस सोच की जड़ तक नहीं पहुंच पाती। ये तो समझती हूँ कि पितृसत्तात्मक सोच समाज को पुरुष प्रधान बनाती है और कहीं न कहीं पुरुष स्वयं को बेहतर या उच्च मान कर जीता है। दूसरी ओर बचपन से ही दूसरे के घर जाने की जो ट्रेनिंग दी जाती है लड़कियों को, उसमे सबसे अहम विषय, हर विषय को नज़र अन्दाज़ करना होता है और उम्र की इस दहलीज़ तक आते-आते लड़की नज़र अंदाज़ करने में माहिर हो हो चुकी होती है। वित्तीय स्वतन्त्रता या फाइनेंशियल इंडिपेंडेंस न होना भी औरतों को कमज़ोर बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ती, उस पर समाज के वो चार अनदेखे लोग जिनके सवाल से बचने के लिए औरत थप्पड़ खा कर मुस्कराना सीख लेती है।

परस्पर सम्मान और विश्वास की नींव

किसी भी मनुष्य को जब शारीरिक तौर पर चोट लगती है तो वो घायल ज़रूर होता है किन्तु हताश और टूटा हुआ महसूस नहीं करता। किन्तु जब रिश्ते में बात यहां तक पहुंच जाये की सामने वाला हाथ उठा दे तब स्तिथि और होती है। ये हर रिश्ते में होता है किन्तु एक पुरुष और नारी के बीच परस्पर सम्मान और विश्वास का रिश्ता ही पनपता है।

एक औरत पर जब हाथ उठाया जाता है तो इस परस्पर सम्मान और विश्वास की नींव हिल जाती है। उस रिश्ते पर भी सवाल उठता है, जिसके हक़ से वो अपना नाम, अपनी पैदाइश की ज़मीन, अपना काम, अपने ख्वाब सब कुछ छोड़ कर एक दुसरी ज़मीन पर अपनी जड़ जमाने की कोशिश में सालों बिता देती है। ऐसे में अचानक मिला थप्पड़ उसे झकझोर देता है और उसके वजूद पर सवाल उठता है।

कौन है?

क्यों है?

किस लिए है?

उसमें और उस पशु में क्या अंतर है जो कि खाने की आस में खूंटे से बंधा रहता है?

या उसमें और उस बाज़ार में बैठने वाली औरत में फ़र्क़ क्या है? वो अपनी मर्ज़ी से शरीर का एक सौदा करती है और यहाँ उसे स्वयं अपने शरीर पर हक़ नहीं। दो वक़्त की रोटी, सर पर छत और समाज में ईज़्ज़त के बदले थप्पड़ खाने हैं तो खाओ।

बस एक थप्पड़ या बेबसी, डर, मायूसी, धोखा, शर्मिंदगी

बेबसी, डर, मायूसी, धोखा, शर्मिंदगी ये सब महसूस होता है उस एक थप्पड़ में।

समझती हूँ, पढ़ना मुश्किल हो सकता है। मेरे लिए लिखना भी आसान नहीं। लेकिन बंद दरवाज़ों के पीछे नील निशान की इतनी अनदेखी कहानियां छुपी हैं कि अगर सामने आ जाएँ तो समाज चरमरा उठेगा और देव संस्कृति के चोले में सड़ती गलती पितृसत्ता की सोच घ्रणित कर जाएगी।

ऐसे में थप्पड़ फिल्म ज़रूर देखना चाहूँगी। ‘थप्पड़… बस एक थप्पड़, पर नहीं मार सकता’- ये कहती हुई नायिका शायद हिंदुस्तानी फिल्मों के इतिहास में पहली बार होगी।

इस उम्मीद में कि इस नाज़ुक और अनदेखे विषय को उतने ही मर्मस्पर्शी तरीके से ढाला गया होगा। ये उम्मीद तो कतई नहीं कि इससे थप्पड़ खाने वाली औरतें बाहर आ जाएँगी और समाज में कोई क्रांति होगी किन्तु थप्पड़ मात्र ‘बस एक थप्पड़’ नहीं होता, ये एहसास ज़रुरी है और अगर किसी एक मर्द को थप्पड़ मारने से पहले उस शर्मिंदगी, दर्द, बेबसी का एहसास हो जाये तो बनाने वाले की उम्मीद पूरी होगी।

मूल चित्र : Canva

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