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मैं तुम्हारे प्यार में गिरना नहीं उड़ना चाहती हूँ…

पहले तो आप प्रेमिका को विजेता की ट्रॉफ़ी के तरह सजा-धजा कर घूमते हो। फिर वही प्रेमिका अलग-अलग रूप में इस रिश्ते का बोझ उठाती है…   तीन सौ पैंसठ दिनों के सालभर के जीवन में एक दिन, एक सप्ताह या एक महीने के रूप में वेलेटाइन डे-वीक-महीना हमारे आस-पास बीत रहे पल को कुछ […]

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पहले तो आप प्रेमिका को विजेता की ट्रॉफ़ी के तरह सजा-धजा कर घूमते हो। फिर वही प्रेमिका अलग-अलग रूप में इस रिश्ते का बोझ उठाती है…  

तीन सौ पैंसठ दिनों के सालभर के जीवन में एक दिन, एक सप्ताह या एक महीने के रूप में वेलेटाइन डे-वीक-महीना हमारे आस-पास बीत रहे पल को कुछ इस तरह रचा-बसा दिखता है कि हम जीवन में प्रेम का मूल्यांकन करने लगते हैं। इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि वेलेटाइन-डे मनाने की परंपरा ने हमारे जीवन में बदलाव तो किया है क्योंकि प्रेम हर किसी को चाहिए। आस्कर वाइल्ड से कुछ शब्द उधार लूं, तो वह लिखते है कि “जिस तरह सूर्य के बगैर बगीचे में फूल मुरझा जाते हैं, ठीक उसी तरह प्रेम बिना जीवन भी नीरस बन जाता है।”

वैलेंटाइन्स डे तो गया और अगला अगले साल ही आएगा लेकिन जाहिर है प्रेम केवल एक दिन का एहसास या अनुभूति मात्र नहीं है, उसकी जरूरत जीवन भर के लिए हम सभी को है। अपने सीमित अनुभव में, अपने आस-पास हम-उम्र, पढ़ी-लिखी आत्मनिर्भर और कैरियर बनाने के लिए उन्मुख महिला साथियों को देखता हूं। उनके जीवन में प्रेम के महत्व के बारे में सोचता हूं तो मेरे ज़हन में पहला सवाल यहीं कौंधता है, प्रेम की दुनिया में क्या महिलाओं को स्वतंत्रता, समानता और सम्मान मिल पाता है, जिसकी इच्छा उनको वास्तव में होती है? आखिर प्रेम के पूरे दास्तानगोई में महिलाएं कहां है? क्यों इन पढ़ी-लिखी आत्मनिर्भर और कैरियर उन्मुख महिला साथियों को केवल प्रेम नहीं, प्रेम में सम्मान भी चाहिए साथ में जीवन की उन्मुक्त छलांग भी।

स्त्री सब सह सकती है सिवाय…

हिंदी साहित्य के जाने-माने लेखक कलम के जादूगर कहे जाने वाले प्रेमचंद कहते हैं कि “प्रेम में नारी सब-कुछ सह सकती है, दारुण-से-दारुण दु:ख, बड़े-बड़े संकट, यदि नहीं सह सकती, तो अपनी उमंगों का कुचला जाना।” समाज में स्त्री-पुरुष के वर्ग में बंटे समाज में जितनी असमानता मौजूद है वह पुरुषों को स्त्री के समक्ष चतुर बना देती है। समानता के इस बोध का अभाव स्त्री प्रेम में कभी कोई ठोस धरातल नहीं दे पाता है।

‘न’ को ‘हाँ’ में तो बदलना काफी नहीं

किसी भी स्त्री का प्रेमी पहले उसके जीवन में  मौजूद “न” को “हां” में बदल देता है, जो पिता या भाई या दादा से उसके सुरक्षा बोध के चिंताओं के कारण नहीं मिल पाता है। प्रेमी ही वह प्रथम पुरुष होता है जो अपने कंधे पर प्रेमिका का सर रखकर, उसका भरोसा जीतता है। धीरे-धीरे जब स्त्री इसे संबंध का नाम देने की हसरत जाहिर करती है, पहले तो वह चकित हो उठता है फिर जब उसे स्वीकार कर भी लेता है तो उसके साथ जीवन एक साझेदार के रूप में कम, एक नियंत्रक पुरुष के रूप में अधिक जीता है। वह या तो वह अपने प्रेम को ज्ञान के चाश्नी में लपेटने लगता है या फिर पूरी सामाजिक-पारिवारिक जिम्मेदारी का बोझ  प्रेमिका के कंधे पर लाद देता है।

जिम्मेदारी का बोझ प्रेमिका के कंधे पर

इन सब से परे अगर प्रेम सामाजिक दायरे में विवाह के बाद ही अपने जीवनसाथी के साथ पनपता है तो वहां भी प्रेमिका घर-गृहस्थी में अपना जीवन झोंका हुआ महसूस करती है। शुरुआत में प्रेमिका के रूप में मिली जीवनसाथी को विजेता की ट्रॉफ़ी के तरह सजा-धजा कर घूमता है। जैसे-जैसे समय बीतता है प्रेम की चिड़िया अपना घोसला छोड़ कहीं जा चुकी होती है। दोनों ही स्थिति में स्त्री के जीवन में प्रेम जिस रूमानियत के साथ आता है, वह टिक नहीं पाता।

प्रेम में वह अपना समपर्ण

पुरुष का भावानात्मक नियंत्रण उसे ठगा हुआ सा महसूस करवाता है। प्रेम में वह अपना समपर्ण करती जाती है। सबसे पहले वह अपनी आजादी ही अपने प्रेमी के हवाले करती है। इस तरह से वह अपना विश्वास प्रेमी को अर्जित करना चाहती है क्योंकि इसके अतिरिक्त उसके पास कोई विकल्प होता ही नहीं है। लंबी गुलामी के बाद आजाद भारत के कई दशक  गुज़र जाने के बाद पढ़ी-लिखी प्रगतिशील आजाद ख्याल महिलाओं की एक पीढ़ी अस्तित्व में आ चुकी है, लेकिन उस अनुपात में पुरुषों को प्रगतिशील मूल्य सिखाए ही नहीं गए। किसी भी स्त्री को पति से अधिक पार्टनर मिल सके इसकी संख्या बहुत कम है।

कई स्त्रियां आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर हैं पर…

आज कई स्त्रियां आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर भी हैं पर बचपन से वह जिस समाजीकरण में बड़ी होती हैं, वह अपने अस्तित्व को पुरुष के साथ ही सोचने को विवश होती हैं। बचपन से उसके गति इच्छा पर जिस तरह का नियंत्रण रहा होता है कि वह हमेशा किसी पर आश्रित जीवन ही जीने को विवश होती है।

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आर्थिक-सामाजिक-राजनीतिक रूप से चेतनाशील और आत्मनिर्भर होने के बाद वह स्वयं से प्रेम करने के बजाए अपनी सारी ऊर्जा प्रेम के तलाश या प्रेमी को बचाने में ही खपा देती है। बहुत कम ही आत्मनिर्भर स्त्रियाँ होती हैं जो प्रेम में अपने स्वयं के अस्तित्व की तलाश कर पाती हैं। इससे तो यही लगता है कि प्रेम की दुनिया में आधी-आबादी की पूरी दुनिया जो कुछ भी हासिल करना चाहती है, वह उसके अधिकार की तरह नहीं, बल्कि उसकी झोली में डाला गया है, जिसकी लाइफ टाइम वारंटी के नियम और शर्तें पहले से लागू हैं।

प्रेम में आजादी कम, सामाजिक सुरक्षा ज़्यादा

प्रेम में आधी-आबादी का अपना अस्तित्व बहुत अधिक सब्जेक्टिव है। प्रेम उसके लिए उसकी आजादी कम, उसकी सामाजिक सुरक्षा को बनाये रखने का आशियाना ज़्यादा है जिसके अपने कायदे पहले से तय हैं। फिर एक बड़े सवाल के जवाब को भी तलाशना जरूरी है कि होना क्या चाहिए किसी के भी प्रेम में? आधी-आबादी के लिए प्रेम के दुनिया कैसी होनी चाहिए?

किसी की विवशता नहीं गरिमा बढ़े

किसी भी स्त्री का प्रेम उसकी मुक्ति का रास्ता बने, जहां उसकी गरिमा और सहजता दोनों मौजूद हों। प्रेमी और प्रेमिका दोनों किसी विवशता में नहीं जुड़े, दोनों एक-दूसरे को भावनात्मक मजबूती  ही नहीं प्रदान करें, दोनों अपने व्यक्तित्व का बेहतर विकास असीम क्षितिज में कर सकें। दोनों एक-दूसरे के सहयात्री बनें जीवन के हर सफर में, तभी दोनों एक-दूसरे का सम्मान भी करेंगे, एक-दूसरे के जिम्मेदारियों का सम्मान कर सकेंगे और एक नए समाज का सृजन कर सकेंगे। दोनों के व्यक्तित्वों के स्वतंत्र विकास के बिना प्रेम असंभव है।

ज़ाहिर है प्रेम सबसे पहले प्रेमी और प्रेमिका दोनों के आज़ादी की मांग करता है, जिस प्रेम संबंध में आजादी आ जाएगी प्रेम अपने आप चला आएगा।

मूल चित्र : Instants from Getty Images Signature via Canva Pro 

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