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औरतें दुखी होने के बावजूद भी शादी के रिश्ते को क्यों निभाना चाहती हैं?

Posted: जून 12, 2020

अपने जीवन साथी को देख कर दिल यूँ धड़क जाता है और कहीं से आवाज़ आती है, “हाय! आ गए!” और हाथ-पैर फूलने शुरु! ऐसा ही हाल था अपना….

रेस्तरां में शायद सामने बड़े टेबल पर किटी पार्टी चल रही थी। इतना शोर! नहीं, नहीं शोर नहीं कहना चाहिए! बहुत रौनक लगी हुई थी।

उस एक ही हॉल में हमारे छोटे से टेबल पर जैसे अफसोस और बड़े टेबल पर शादी का माहौल लग रहा था।
उन सब सजी-धजी औरतों की बातें जिस तरह मेरे कानों में पड़ रही थीं मानो बहुत सारे रेडियो चैनल एक ही समय में अपने नेटवर्क के लिए संघर्ष कर रहे हों। कुछ समझ नहीं आ रहा था और कुछ-कुछ आ भी रहा था।
परन्तु वे सब बहुत खुश थीं, घर की परेशानियों को भूल बैटरी रीचार्ज कर रही थीं। उनके चेहरे की चमक अब घर की सब परेशानियां खुशी-खुशी अपने इसी आत्मविश्वास, जोश से हल कर देंगी।

हम औरतें बड़ी ढीठ होती हैं

परन्तु मैं और पापा इस टेबल पर बैठे हुए चाहे इस समय घर से बाहर थे। परन्तु लग रहा था जैसे वहीं मेरे ससुराल वाले घर के बरामदे में बैठे हों। जहां पापा को कई बार बिना पगड़ी क्या, बल्कि उनके तन के कपड़े भी उन्हें महसूस नहीं हुए होंगे।

लड़कियों की ऐसी किस्मत होने से ही तो सब डरते हैं। पापा मेरी आँखों के सागर में कोई कश्ती ढूँढ रहे थे और मैं उनकी तरल-सज़ल आँखों में किनारा। पर तूफान में भला कोई टिक सकता है? हाँ! तिनके! ढीठ तिनके!
हम औरतों जैसे ही ढीठ!

ससुराल में कदम कदम पर पता है क्या-क्या होगा

सांत्वना, सुलझाव तो तभी हो सकता था अगर मैं और पिता जी समाज की सोच के नज़रिए वाला घिसा-पुराना चश्मा उतार फेंके। और अगर ऐसा कर भी लें तो ये भरी दोपहरी में रेगिस्तान में रास्ता बनाने और उसपर चलने के समान था। और जिस रास्ते पर मैं चल रही हूँ, ये रास्ता तो जाना पहचाना है, ना! ससुराल में कदम कदम पर पता है क्या-क्या होगा ? और क्या-क्या हो सकता है। तो चल रहे हैं ।

तभी घड़ी पर ध्यान गया। मैं बोली,”पापा दो बज गए !”

“हाँ! बेटी, ठीक है। मैं बस पकड़ता हूँ, तुम रिक्शा पकड़ के घर चली जाओ।” और हम अपने-अपने रास्ते।

घर वालों के दिल के दरवाज़े वही सौ तालों में बंद नज़र आए

घर के लोहे के गेट ने तो दोनों बाँहें खोल स्वागत करने की कोशिश की पर मैं उस निर्जीव की हमदर्दी का बोझ अपनी आत्मा पर नहीं ढोना चाहती थी तो एक ही कपाट में से अंदर दाखिल हो गई। परन्तु घर वालों के दिल के दरवाज़े वही सौ तालों में बंद नज़र आए।

काम वाली हो, तो वह भी थोड़ा रौब रख लेती है

बच्चे आ चुके थे। छोटे-बड़ों को खाना देकर अब तक मैं अपने कमरे में दाखिल हो चुकी थी। और सोच रही थी और क्या करूँ? कैसे सबको खुश रखूं? नौकरी करते हुए पूरी तनख्वाह दे देती हूँ, कोई काम वाली भी नहीं लगवाई। हर काम अकेले और कमियाँ ढूंढ़ती नजरें ये काम और भी दूभर कर देती थीं। मेरी तन्ख्वाह में से ही जो मुझे दे देते हैं उसी में गुजारा करती हूँ। काम वाली हो तो वह भी थोड़ा रौब रख लेती है। पर मेरा तो कोई अधिकार भी नहीं! न पति, घर, बच्चों! किसी पर भी नहीं ।

तभी दोनों बच्चे भागते हुए आए। रीमा बोली,”माँ ! दादी बोल रही हैं कि जो नानू के संग आप खरीदने गए थे वो बताओ कि क्या लेकर आए?”

“उफ! देखा फिर मुझसे गलती हो गई मुझे खुद ही दिखा देना चाहिए था,पता नहीं क्यों भूल गई।”

मैं झट से लिफाफा लेकर माँ जी के कमरे में पहुँच गई। एक झटके ने लिफाफा मेरे हाथ से ले लिया था।

“चार घंटे बाज़ार! और एक चादर! हम तो सोचे खूब शॉपिंग करके आएगी?”\ “बहाने शॉपिंग के, बस चुगलियाँ करनी थीं! कर लीं?”

और 5 साल से कम आयु के मेरे ही बच्चे मुझ पर हंस रहे थे। उनकी मासूमियत पर मैं भी मुस्कुरा पड़ी।

तभी आवाज़ सुनी, “बेवकूफ!”

“अपने मन की पति के घर में जाकर करना”

हाँ! बेवकूफ ही तो थी। अपनी बेइज्ज़ती भी करवाई और बाकी चीजों की तरह ये चादर भी न संभाल सकी।
“चली जाऊँ कहीं? पर कहाँ? पिता को बातें सुननी पड़ेंगी! कहाँ जाऊँगी? बच्चों को क्या समझाऊंगी? कहाँ रहूँगी? कोई तो रास्ता! कोई तो सहारा हो! पर सहारा, सहारा तो पति का होता है! माँ ने भी तो यही सुनाया, “अपने मन की पति के घर में जाकर करना।”

वो पिता का घर! ये पति का घर!

वो पिता का घर! ये पति का घर! फिर बच्चों का घर! तो मेरा घर कहाँ? घर नहीं तो एक कोना ही सही! कहाँ है? जहाँ मैं ख़ुद को समझ सकूँ, समझा सकूँ। अपने अस्तित्व को पहचान सकूं ।

इन सबको अपने बारे में क्या बताऊँ? मैं तो खुद ही अपने बारे में कुछ नहीं जानती हूँ। उत्तर तो तब पता होंगे न अगर मैं ये प्रश्न भी खुद से कर पाऊँ कि मैं कौन हूँ! बस नाम है रजनी! रात, निराशा, अंधेरा और मेरे जीवन में भी अंधेरा।

तभी पति देव के आने की आवाज़ आई। अपने जीवन साथी को देख कर दिल यूँ धड़क जाता है और कहीं से आवाज़ आती है, “हाय! आ गए!” और हाथ-पैर फूलने शुरु! अब तक जो काम थोड़े बहुत सही हो रहे थे अब तो साँस भी नहीं आ पाएगी। यही सब लक्षण सच्चे प्यार के भी होते हैं ना! तो प्यार तो बहुत डरावना होता है।

चलो जी खाना खिलाने तथा बाकी काम हो गए।

एक ही पलंग पर अब एक-एक क्षण युग बनने वाला था

अब एक-एक क्षण युग बनने वाला था। बैड पर दो तकिए सम्माननीय क्योंकि पति के सिर को स्वयं पर सुशोभित कर आराम दिलवाते थे और तीसरा तकिया मैं जो उनके अहं को संतुष्टि देता था। उन्हें मर्द होने का अजीब अहसास करवाता था। उस सजीव तकिए को बाकी निर्जीव तकियों सा सम्मान कभी नहीं मिला।

सब सो चुके थे।रात की शांति में करवट लिए मैं बहुत रोई ! पर आवाज़ न आने दी! तकिया भी भीगने न दिया। पर मैं बहुत रोई!

फिर सामने पूर्णिमा का चाँद दिखाई दिया। खिड़की के पार पौधों पर कुछ जुगनू।

तभी पता नहीं क्या मन में आया कि चुप हो गई। पर नींद नहीं आ रही थी। बस सुबह का इंतजार था।

दोपहर में मैं सब्ज़ी लेने मंडी निकल गई

मन में बहुत कुछ था पर मैं उसकी भनक अपने श्वासों तक को भी होने नहीं देना चाहती थी। और दोपहर में सब्ज़ी लेने मंडी निकल गई। थैले में दो जोड़ी कपड़े, जमा पैसे ले लिए। पर एक दो गहने जो मेरे पास थे वो भी नहीं लिए क्योंकि वे या तो मायके वालों के था या ससुराल वालों के। बस जो पहने थे वही संग थे।

घर से निकलते ही पीछे से आवाज़ ने जान निकाल दी। मगर ये सीमा की आवाज़ थी जो मंडी जा रही थी।
“भाभी! चलो मैं भी मंडी जा रही हूँ।”

वो मेरे बारे में सब जानती थी। और शायद आज वो मुझे ज्यादा ही पढ़ने की कोशिश कर रही थी। वो सब्जी खरीद रही थी और मैं बच रही थी कि कैसे वहां से निकलूं। तभी किसी ने मेरी बाँह पकड़ ली।

“अरे! सीमा तुमने तो डरा ही दिया।”

अब मैं घर नहीं जाऊँगी

“भाभी! बनो मत! बताओ क्या हुआ?” और वहीं एक छोटी सी दिवार पर बिठा दिया। मैं भरी पड़ी थी। छोटी सी दीवार इस बाँध को रोक न पाई और बता दिया कि “मैं घर नहीं जाऊँगी!”

“भाभी कहाँ जाओगी?”

“पता नहीं।”

“मायके?”

“नहीं, नहीं! वहां तो कभी नहीं।”

“फिर कोई क्वॉटर लेकर रहोगी?”

“नही, नहीं! अकेली औरत! मैं कहाँ रहूँगी?”

सीमा खीझ कर, “फिर कुछ तो सोचा ही होगा?”

“नहीं ! सीमा कुछ नहीं, बस घर नहीं जाऊंगी!”

” भाभी! मैं पीजी में कमरा दिलवा देती हूँ! नौकरी तो है तुम्हारा खर्चा निकल आएगा।”

“पर मैं सारी उम्र! बच्चों के बिना कैसे रहूंगी?”

“भाभी फिर कदम तो उठाना ही पड़ेगा!”

“नहीं, नहीं! पीजी नहीं!”

संघर्ष, क्रांति, प्रश्न पूछने से शुरु होती है, पर उसके उत्तर भी खुद ढूंढने पड़ते हैं

“तो फिर भाभी सब्ज़ी लो! और घर चलो! क्योंकि या तो पूरा लड़ लो या पूरा मर लो! जिंदगी में बीच का कोई रास्ता नहीं होता! फिर तुम अब ये सोचना छोड़ दो कि तुम हो! तुम खुद से उम्मीद लगाना बंद कर दो। तुम्हारी समस्या का हल बस अब यही है।”

सच भी तो था कि यही बात मुझे व्यथित करती थी! परेशान करती थी! क्योंकि मैं खुद को पहचानने की, जानने की कोशिश कर रही थी। कोई अपने बारे में प्रश्न पूछे और उत्तर न मिलने पर फिर रजनी, अंधेरा, निराशा ही तो दिखाई देगी। मानते हैं कि संघर्ष, क्रांति, प्रश्न पूछने से शुरु होती है, पर उसके उत्तर भी खुद ढूंढने पड़ते हैं ।

केवल प्रश्नों तक सीमित रह कर तो मैं जो चल रहा है उससे भी हाथ धो लूंगी और जो भविष्य की उम्मीद मेरे बच्चे हैं वे भी मुझसे दूर हो जाएंगे। कम से कम उनको देख कर मुस्कुरा तो लेती हूँ। मेरे बिना उनका क्या होगा?
और लीजिए, साँप भी मर गया था और लाठी भी नहीं टूटी।

बिजली की गति से सब्ज़ी खरीद कर मैं घर में अपने बच्चों के पास थी।

मैं रसोई घर के काम में जुट गई। अब मैं हल्का महसूस कर रही थी। और बच्चों की चमकीली आँखें पूर्णिमा के चाँद की तरह दिखाई दीं।

समाज भी तो यही चाहता है कि हम उन्हें सुनें बस सुनाई न दें

पति की दुनिया में नहीं! परन्तु क्या पता बच्चे मुझे मेरा सम्मान, पहचान दिलवा दें! पर फिर मन को समझाया! नहीं, प्रश्न नहीं पूछने! तो बस नहीं पूछने! अब मेरा कोई नाम नहीं ।मैं कोई नहीं! रोबोट भी नहीं! मशीन भी नहीं! कुछ नहीं! अगर अपने अस्तित्व को कुछ भी नाम दिया तो फिर प्रश्नों के राक्षस मुझ पर हंसेगे। और समाज भी तो यही चाहता है, कि हम उन्हें सुनें बस सुनाई न दें! देखते रहें, पर दिखाई न दें!

बस निर्जीव! नहीं, नहीं निर्जीव, कैसे! फिर उनके काम कौन करेगा! जब वो कहें सजीव तो सजीव ! जब कहें निर्जीव तो निर्जीव बन जाएँ! अब घर में जीतने की खुशी में सब मुस्कुराते हैं, जोर-ज़ोर से हंसते हैं ।

अब मैं तो मैं हूँ ही नहीं

उधर न पिता जी ने डर के मारे फोन किया! न मैंने! क्योंकि मैं तो हूँ ही नहीं ।मैं तो वहीं सब्ज़ी मंडी की छोटी सी दीवार की नींव में स्वयं को दबा आई थी। अब बस उस दीवार को कोई सीमा, कोई पिता जी छुएं भी ना!
ताकि तकिए सजते रहें! सब खुश रहें!

और यूँ ही कई रजनियाँ स्वयं से बिना कोई सवाल पूछे, बहुतों के सवालों का जवाब बन जाती हैं। और बचपन, जवानी, बुढ़ापे तक उम्मीद का दीपक जलाए रखती हैं। और पिता से, पति से, बच्चों से इसी लौ के उजाले की उम्मीद में बुढ़ापे तक आ जाती हैं।

अब तक दिल के रेगिस्तान में कुछ छुट-पुट हरियाली इस उम्र में दिखाई देने लगती है, पर बसंत को क्या जवाब दोगे! जो पतझड़ में ही बीत गई!

मूल चित्र : Canva

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