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बड़ी गाड़ी को सर चलाएं या मैडम क्या फर्क़ पड़ता है?

महिलाएं ट्रक से लेकर ओला, उबर तक चला रही हैं, मगर चौंकाने वाली बात यह है कि गाड़ियों को भी लोग जेंडर से जोड़कर देख रहे हैं।

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महिलाएं ट्रक से लेकर ओला, उबर तक चला रही हैं, मगर चौंकाने वाली बात यह है कि गाड़ियों को भी लोग जेंडर से जोड़कर देख रहे हैं।

महिलाएं आज वायुसेना में बड़े बड़े भरी भरकम लड़ाकू विमान उड़ा रही हैं। महिलाएं ट्रक से लेकर ओला, उबर तक चला रही हैं, मगर चौंकाने वाली बात यह है कि गाड़ियों को भी लोग जेंडर से जोड़कर देख रहे हैं। एक सर्वे का कहना है कि महिलाएं अगर बड़ी और भरी भरकम गाड़ी चलाती हैं, तब महिला के साथ दुर्घटनाएं ज्यादा होती हैं। वहीं अगर महिलाएं छोटी गाड़ियां चलाती हैं, तब उनके साथ ऐक्सिडेंट होते हैं, मगर उसकी गंभीरता कम होती है।

जानिए क्या कहता है सर्वे?

इंश्योरेंस इंस्टीट्यूट फॉर हाइवे सेफ्टी के शोधकर्ताओं और ऑटो बीमाकर्ताओं द्वारा इस सर्च को किया गया था। उन्होंने साल 1998 से 2015 तक पुलिस में रिपोर्ट किए गए टाउ अवे फ्रंट (Tow-away front) और साइड क्रैश में पुरुषों और महिलाओं के चोटों का विश्लेषण किया। निष्कर्ष में यह सामने आया कि फ्रंट क्रैश में महिलाओं के साथ दुर्घटना होने की संख्या तीन गुणा थी, जिसमें हड्डी टूटने और अन्य चोट शामिल थीं। वहीं फेफड़े या मस्तिष्क की गंभीर चोट से पीड़ित होने की संभावना दुगनी है।

गाड़ियों का जेंडर होता है क्या?

शोधकर्ताओं ने यह भी पाया कि पुरुषों और महिलाओं को लगभग समान अनुपात में मिनीवैन और एसयूवी में दुर्घटनाग्रस्त पाया गया। लगभग 60% पुरुषों की तुलना में लगभग 70% महिलाएं कारों में दुर्घटनाग्रस्त हुईं। 5% से कम महिलाओं की तुलना में 20% से अधिक पुरुष पिकअप में दुर्घटनाग्रस्त हो गए।

जेसिका जर्मेरियन, वाहन अनुसंधान के IIHS की उपाध्यक्ष ने सर्वे अपने दिए बयान में कहा कि आंकड़ों से यह पता चलता है कि महिलाएं अक्सर छोटी, हल्की कारों को चलाती हैं और वे पुरुषों की तुलना में साइड-इंपैक्ट और फ्रंट-इन-रियर क्रैश में पुरुषों की तुलना में अधिक चोटिल होने की संभावना रखती हैं। शायद गाड़ियों को भी नहीं पता होगा कि उसकी बनावट को देखते हुए, उसे महिला और पुरुष से जोड़ दिया जाएगा।

सर्वे को एकतरफा कहना गलत नहीं

हालांकि यह सर्वे एकतरफा रहा क्योंकि इसमें महिलाओं को गाड़ियों की बॉडी से जोड़कर देखा गया, और निष्कर्ष यह निकाला गया कि महिलाएं भारी भरकम गाड़ियां नहीं चला सकतीं। ऐसे भी गाड़ियों के एडवरटाइजमेंट में भारी गाड़ियों के साथ केवल पुरुषों को दिखाया जाता है। छोटी गाड़ियों में महिलाओं और परिवार को दिखाया जाता है। यह सरासर गलत है क्योंकि गाड़ियों का कोई जेंडर नहीं होता, तब उसके साथ पुरुषों और महिलाओं को लेकर भेदभाव क्यों?

भारी गाड़ियाँ चला रही महिलाएं

समाज में ऐसी अनेक महिलाएं हैं, जो आज ट्रक चला कर अपने परिवार का भरन पोषण कर रही हैं।

योगिता रघुवंशी उत्तर प्रदेश से हैं मगर वह पली बढ़ी महाराष्ट्र में हैं। योगिता सबसे ज्यादा शिक्षित ट्रक ड्राइवरों में से एक हैं। उन्होंने वकालत की डिग्री हासिल की हुई है, मगर पति की मौत के बाद उन्होंने ट्रक चलाने को ही अपना पेशा बना दिया। उन्होंने इस तथ्य के कारण ड्राइवर बनने का सोचा क्योंकि वह शुरुआत के समय में कानून के क्षेत्र में जितना कमाएंगी वह पर्याप्त नहीं होगा।

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थोपामपद्दी, कोच्चि केरल की राधामनी टी के, के लिए उम्र सिर्फ एक संख्या है। 69 वर्षीय इस महिला के पास गाड़ी चलाने के लिए 11 से अधिक लाइसेंस हैं। साथ ही राधामनी 20 से अधिक प्रकार के भारी वाहन चलाना जानती हैं। उन्होंने साल 1981 में छोटी गाड़ियों का लाइसेंस हासिल किया और साल 1988 में बड़ी, भारी गाड़ियों का लाइसेंस अपने दम पर हासिल किया। राधामनी अर्थमूवर्स, फोर्कलिफ्ट, मोबाइल क्रेन, रफ़ टेर्रेन क्रेन और ट्रेलर  जैसी भारी भरकम गाडियां चलाती हैं, जबकि वह सबसे उम्रदराज वाहन चालक हैं।

गाड़ियों के लिए एकाग्रता होना जरूरी

इन दो उदाहरण से यह साफ हो गया है कि गाडियां जेंडर से नहीं बल्कि सावधानी और एकाग्रता से चलती हैं। हालांकि मेरा मानना है कि महिलाएं पुरुषों के मुकाबले ज्यादा ज़िम्मेदार होती हैं।

सर्वे को एक पक्षीय होकर किया गया है, क्योंकि अब तक लोगों को एडवरटाइजमेंट में गाड़ियों के साथ पुरुषों को देखने की आदत कम नहीं हुई है, तब असलियत कोई क्यों देखना चाहेगा?

मूल चित्र : michaeljung from Getty Images via Canva Pro

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