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मायके से बेटी की डोली उठती है और ससुराल से अर्थी…

एक बार शादी और कन्यादान कर दिया तो फिर बेटी कैसी है उसकी चिंता नहीं करते। वो जिंदा भी है या नहीं ये भी जानने को इच्छुक नहीं रहते।

एक बार शादी और कन्यादान कर दिया तो फिर बेटी कैसी है उसकी चिंता नहीं करते। वो जिंदा भी है या नहीं ये भी जानने को इच्छुक नहीं रहते।

हमारे पितृसत्तात्मक व्यवस्था ने शादी को केवल औरतों को नियंत्रित करने के लिए बनाया है, जिसमें एक औरत की शादी होने के बाद उसे अपने घर-बार से सारे रिश्तों को छोड़कर अपने ससुराल जाना पड़ता है। बेटी मानों एक धन है जो पहले पिता की संपत्ति होती है, फिर शादी के बाद अपने पति की संपत्ति बन जाती है।

हमारी भारतीय संस्कृति में दान करने की परंपरा है और दान की गई चीज़ वापस नहीं ले सकते। यही मानसिकता बेटी के कन्यादान के साथ जुड़ी है। एक बार उसका दान कर दिया तो बस “दे दिया”। फिर बेटी कैसी है, कैसी नहीं है, उसकी चिंता ही नहीं नहीं करते। वो जिंदा भी है या नहीं ये भी जानने को इच्छुक नहीं रहते।

बेटी चाहे जो बोले उसे शादी के गठजोड़ में रहना ही पड़ता है

शादी को चलाने के लिए प्रेम की आवश्यकता होती है, पर वो प्रेम न मिले, उसकी जगह अगर नफ़रत और घृणा मिले तो भी बेटी को उस रिश्ते में रहना ही पड़ता है। यह समाज की पितृसत्तात्मक सोच है जिसने बेटी की शादी को अपनी नाक का सवाल बना लेते हैं। बेटी का रिश्ता तोड़ना नाक का सवाल बन जाता है। अब नाक भला कैसे कट सकती है, इसलिए बेटी को एक कड़वे रिश्ते में रहना पड़ता है। अगर बेटी ससुराल से मायके आ जाए तो लोग थू-थू करने लगेंगे, बेटी का दोष गिनाने लगेंगे कि बेटी में ही खोट है कोई इसलिए चली आई मायके। माता-पिता भी यह सब सुनकर अपनी बेटी को वापस उस नरक ससुराल में भेज देते हैं।

बेटी की शादी से पहले न सुनी तो शादी के बाद क्या सुनेंगे

बेटी जब आत्मनिर्भर बनना चाहती थी तो उसे रोका। उच्च शिक्षा पाने से रोका। शिक्षा पाने के बाद उसे आर्थिक रूप से स्वावलंबी बनने से रोका। उसकी एक न सुनी। जब वो ससुराल के रिश्तों और अपने पति से अलग होना चाहती है तो उसे निकलने में समर्थन क्या ही करेंगे? छोड़ देते हैं दलदल में धंसने के लिए।

बेटी का काम केवल शादी के बाद ससुराल का घर बसाना बना दिया जाता है। एक लड़की के लिए “शादी ही सब कुछ है” यह उसे सीखा कर भेजा जाता है। उसमें बेटी असफल रहती है तो उसे उसी हालत में छोड़ देते हैं। बेटी लाख कह ले उसकी नहीं सुनते। बेटी के माता-पिता इस पितृसत्तात्मक समाज के दबाव में रहकर सोचते हैं कि मायके से बेटी की डोली उठती है और ससुराल से अर्थी। उन्होंने डोली से विदा करने का काम कर दिया है अर्थी से निकालने का काम ससुराल वालों का है। बेटी अब पराया धन जो हो गई है।

बेटी की सुनो दूसरों की नहीं

बेटियां पराया धन होती हैं इस बात को बेटी के माता-पिता मानने से इंकार करें। बेटी बेटे की तरह ही उनकी संतान है अपने बेटे की जैसी सुनते हैं अपनी बेटी की भी सुने। उसे कोई धन न समझें, उसे इंसान समझें। बेटी का कन्यादान करने के बजाय उसे अपना साथी खुद चुनने दें। उसकी सुनें अगर वो शादी नहीं करना चाहती तो नहीं कराएं। शादी ही सब कुछ नहीं होता। बेटी को अपना जीवन जीने दे अपने हिसाब से, उसे अपना करियर चुनने की सुविधा दें। बेटियां ख़ुद नहीं निकल पातीं शादी के गठजोड़ से क्योंकि वे सक्षम नहीं होती। उन्हें सक्षम बनाएं, उच्च शिक्षा दें, आर्थिक रूप से स्वावलंबी बनाएं वो खुद अपना निर्णय ले लेगी।

मूल चित्र : Manik Mandal from Pexels

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