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जिस घर में तुम्हारे जैसा पति हो वहाँ सास की क्या ज़रूरत?

हर रोज नमन ऑफिस जाने से पहले कितनी क्या व्यंजन बनेंगे, नमिता को बता के जाते। इतना ख्याल रखने वाला पति पाकर नमिता बहुत ख़ुश थी। 

हर रोज नमन ऑफिस जाने से पहले कितनी क्या व्यंजन बनेंगे, नमिता को बता के जाते। इतना ख्याल रखने वाला पति पाकर नमिता बहुत ख़ुश थी। 

ज्यादातर हम औरतों की शिकायतें सास और ननद से ही रहती हैं। क्योंकि यही दो ऐसे चरित्र है जो अधिकतर ही खलनायक माने जाते हैं समाज की नज़रों में। लेकिन नमिता के लिए तो उसके पतिदेव नमन किसी सास से कम नहीं थे।

जब नमिता की शादी नमन से तय हुई तब उसकी सहेली रेखा ने उसे चिढ़ाते हुए कहा, “नमिता तेरी किस्मत तो कमाल की निकली।”

नमिता ने कहा, “अच्छा! क्यों तेरी किस्मत को क्या हुआ। इतना अच्छी ससुराल है। जब चाहे जीजा जी के साथ मायके आ जाती है।”

“हाँ! लेकिन मेरी सास की जैसी कड़क सास तो नहीं तेरे पास क्योंकि तेरी ससुराल में तो सास ननद ही नहीं है। पूरे घर पे तेरा राज, जब जो मर्जी  करे कर सकती है।”

नमिता भी मन ही मन खुश होती और ससुराल के सुहाने सपनों में खो जाती।

शादी कर के जब नमिता ससुराल आयी तो उसका स्वागत उसकी मौसी सास ने किया जो बहुत ही सौम्य स्वभाव की थी। उनकी खुद की बहू भी उनकी तारीफ करते नहीं थकती थी। शादी के सभी समारोह खत्म होने के बाद मौसी जी जाने वाले दिन नमिता से मिलने आयी और कहा, “अच्छा! नमिता बेटा चलती हुँ। जब भी याद आए मुझे फ़ोन कर लेना। और जब भी जरूरत हो, मैं आ जाऊंगी। बस तुम अपनी मौसी सास को याद कर लेना।” आज मौसी जी के गले लगते हुए नमिता को ऐसा एहसास हुआ कि काश! ये मेरी असल सास होती। इतना प्यार और अपनापन था उनमें।

अगली सुबह नमिता की आंख देर से खुली। देखा तो नमन कमरे में नहीं थे। उसने कमरे से बाहर आ के देखा तो नमन किचन में काम कर रहे थे। नमिता सोचने लगी कि नमन कितने अच्छे हैं। मुझे बिना परेशान किये खुद किचन में काम करने लगे। नमिता तैयार हो के किचन में आयी तो देखा, सब्जियां कटी हुई, चावल, दाल सब धूल के भीगा के रखे हुए थे। नमिता बहुत ख़ुश थी कि इतना ख्याल रखने वाला पति मिला है।

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ये हर रोज की दिनचर्या थी नमन की। ऑफिस जाने से पहले कितनी मात्रा और क्या व्यंजन बनेंगे दोनो नमिता को बता के जाते। एक दिन नमिता ने नमन से कहा, “नमन! आप अब रसोई की चिंता मत किया कीजिये। मैं खुद ही देख लुंगी। आप अपने ऑफिस काम कर लिया कीजिये।”

नमन ने नमिता को ध्यान से देखते हुए कहा, “क्यों! अचानक ये बात कहा से आ गयी।”

“अरे! नमन लगता है तुम बुरा मान गए। वो तो मैं इसलिए कह रही थी कि सिर्फ तीन लोगों का ही तो खाना बनाना है तो मैं कर लुंगी और ऑफिस के भी कितने काम होते हैं।”

नमन ने कोई जवाब नहीं दिया। लेकिन नमिता को अब परेशानी होने लगी थी क्योंकि नमन उसको हर बात के लिए टोकता। कभी कहता “चाय बहुत पीती हो तुम? चार रोटी आजकल की लड़कियाँ कहा खाती हैं? तुम इतना क्यों खाती हो। तेल, चायपत्ती, राशन की खपत तुम्हारे आने से ज्यादा होने लगी है। हिसाब से खर्च किया करो।”

एक दिन तो नमन ने हद ही कर दी एक नींबू के लिए शोर मचाने लगा, “नमिता तुमने नीबू खाये क्या?”

“हाँ, क्या हुआ?”

“पूरा नींबू खा गयी? एक नींबू चार भाग करती तो चार दिन खाती।”

इतना सुनते नमिता ने अपने सिर पर हाथ रख के कहा, “हे भगवान पति के रूप में सास देने से अच्छा सास ही रहती तो अच्छा होता। कौन यकीन करेगा मुझ पे कि मेरे पतिदेव ही सास से बढ़कर हैं।”

नमन के इस रवैये से नमिता को बहुत गुस्सा आता लेकिन चुप रह जाती। नमन राशन से ले के सब्जी तक खुद ही लाता और सारी चीजों का हिसाब रखता। बात बात में नमिता को टोकता रहता। कपड़े से लेकर खाने तक, सब कुछ नमन के ही मन से होता।

एक दिन नमिता ने नमन से बिना पूछे छोले भीगा के रखे थे कि तभी रात में ऑफिस से आ के नमन की नजर छोले पर पड़ी। वो जोर से चिल्लाते हुए। उसने नमिता को बुलाया। नमिता भागती हुई रसोई में गयी और नमन से कहा, “क्या हुआ?”

नमन ने कहा, “जब देखो तब फोन पर लगी रहती हो। दिनभर पंचायत के अलावा भी कोई काम है या नहीं तुमको?”

नमिता ने कहा, “मतलब?”

“मतलब ये कि ये छोले तुमने किससे पुछ के भिगाये? जब देखो तब किचन में सामान खराब करती रहती हो। ऐसा लगता है कि तुम्हारे मायके में तुमको कुछ सिखाया ही नहीं गया। तुम्हारे तो औरत होने पर तुम्हें शर्म आनी चाहिए। आगे से कोई काम मुझ से बिना पूछे कभी मत करना… और हाँ ! जरा अपनी जीभ को भी वश में रखो। लगता है माँ बाप ने कुछ खिलाया नहीं। ये मत समझना कि घर में सास नहीं है, तो कुछ भी करोगी समझी”, कह के नमन जाने लगा।

तभी नमिता ने आवाज़ दी, “रूको! नमन बात अभी खत्म नहीं हुई। मेरे मायके की बात तो तुम मत करना क्योंकि वहाँ एक नींबू खाने पर हंगामा नही होता। और हाँ जो मेरे माँ बाप ने खिलाया मुझे वो तो तुम सपने में भी नहीं सोच सकते। हाँ! तुम्हारे व्यवहार से जरूर लगता है कि तुमने सब कुछ पहली बार देखा और खाया है।

और दूसरी बात, जिस घर में तुम्हारे जैसा पति हो वहाँ सास की क्या जरूरत? जो सास से बढ़कर है। और तुम्हारे जैसा पति किस काम का जो अपनी पत्नी को उसकी पसंद का खाना भी ना खिला सके। और हाँ! मुझे शर्म तो आ रही है लेकिन खुद के औरत होने पर नहीं। तुम पर कि तुम मेरे पति हो।”

तभी मौसी जी भी आ गयी और कहा, “बेटा नमन! बहु ने छोले मेरे लिए भिगाये थे। और तू क्या अब पत्नी के होते हुए? रसोई में ताकझांक करता रहता है। अब रसोई बहु की जिम्मेदारी है। उसकी अमानत उसे सौंप दे। समझा।”

“मौसी! आप कब और कैसे?” नमन ने कहा

“मुझे बहु ने सब बता दिया था। मैं तुझसे ही बात करने आने वाली थी। बहु ये सब मेरे लिए तैयारियाँ कर रही थी। समझा।”

नमन अपने ही नजरो में शर्मिंदा वहाँ से चला गया।

मूल चित्र : Image Source from Photo Images, via Canva Pro

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