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सामाजिक पितृसत्ता ही आज हमारी सबसे बड़ी बाधा है…जानिये कैसे?

Posted: जून 29, 2020

सामाजिक पितृसत्ता का ही परिणाम है कि दिल्ली में कोरोना को लेकर जब घरों में सर्वे हो रहे हैं, तो लोग अपनी जानकारी देने से कन्नी काट करे हैं।

जसलीन भल्ला, जिनकी आवाज आज देश में सबसे अधिक सुनी जा रही है। कोरोना वायरस संकट को लेकर जसलीन भल्ला की आवाज में रिकार्ड किया गया संदेश आज कांलर ट्यून के रूप में हर कोई सुन रहा है। जिसमें कहा जा रहा है “नमस्कार, कोरोना वायरस या कोविड 19 से आज पूरा देश लड़ रहा है। पर याद रहे, हमें बीमारी से लड़ना है, बीमार से नहीं। उनसे भेदभाव न करें, उनकी देखभाल करें।”

लोग अपनी जानकारी देने से कन्नी काट करे हैं

समाज का हर व्यक्ति फोन करते समय पहले इस संदेश को जरूर ही सुनता है। पर हर व्यक्ति के कानों पर जूं तक नहीं रेंग रही है और वह वही कर रहा है जो उसने अपने सांस्कॄतिक सोसलाइज़ेशन  और सामाजिक पितृसत्ता से सीखा है। परिणाम यह है कि दिल्ली में कोरोना के बढ़ते मामलों को लेकर जब सरकार घरों में सर्वे करने जा रही है तो लोग अपनी जानकारी देने से कन्नी काट करे हैं।

उनके अंदर यह डर घर कर गया है कि

उनके अंदर यह डर घर कर गया है कि उनके घर में किसी को कोरोना निकला तो अगर वह किराए का मकान पर है तो मकान मालिक मकान खाली करा लेगे या मोहल्ले के लोग उनसे बातचीत ही बंद कर देगे। सामाजिक पितृसत्ता का यह व्यवहार कोरोना जंग में सबसे बड़ी बाधा है।

सामाजिक पितृसत्ता की वजह से…

यही सामाजिक पितृसत्ता कोरोना पोजेटिव लोगों के साथ-साथ उनके घर के लोगों के अंदर मेंटल एन्जाइटी पैदा कर रहा है, जो कोरोना पोजेटिव लोगों के स्वस्थ्य होने में बहुत बड़ी समस्या पैदा कर रह है। इसका कोई सामाजिक अध्ययन अभी तक सामने नहीं आया है। परंतु, यह परेशानी का सबब तो बना हुआ है।

अगर कोई भी राज्य सरकार इस समस्या पर जल्द लगाम नहीं लगा सकेगी तब वह कोरोना संक्रमण पर पूरा नियंत्रण शायद कभी नहीं कर पायेगी। वजह लोग अपनी जानकारी छुपाकर स्वयं को क्वारंटीन करके ठीक होने का प्रयास तो करेंगे पर उनसे किसी को संक्रमण हुआ है या नहीं इसक पता कभी नहीं चलेगा और सक्रमण फैलता रहेगा।

मेरा इन दिनों का निजी अनुभव

बीते 15 जून को मेरे भाई साहब ने अपने दफ्तर में अपना कोरोना टेस्ट करवाया, उनको माइनर कोरोना पोजेटीव पाया गया। सावधानी के घर के बाकी सदस्यों ने भी अपना टेस्ट कराया पर सबों का रिपोर्ट निगेटीव रहा।

भाई साहब ने स्वयं को क्वारंटीन कर लिया और हमने सावधानी रखते हुए सरकार को सूचित किया। घर को सेनेटाइज करने के साथ-साथ हमने सेनेटाइज़र स्प्रै भी स्टाक कर लिया और तमाम एतियात बरतने शुरू कर दिए। खाने-पीने का समाज दूध-सब्जी भी खरीद कर रख लिया ताकि बाहर निकलना ही न पड़े। हमने सोचा हमारे कारण से किसी और को सक्रमण न हो इसलिए सावधानी बरतनी जरूरी है।

एमसीडी वालों ने जब घर के बाहर पोस्टर लगा कर चिन्हित किया कि इस घर में एक व्यक्ति कोरोना पाजिटिव है और घर के लोग क्वारंटीन में है। उसके बाद मोहल्ले के लोगों के व्यवहार में अचानक से बदल गया।

मोहल्ले के लोगों के व्यवहार में अचानक से बदल गया

यह स्थिति तब है जब मेरे आस-पड़ोस का समाज पढ़े-लिखे लोगों का समाज है। मोहल्ले के लोगों के इस बदलाव को मैंने और भाई साहब ने इगनोर किया क्योंकि दिल्ली भले ही दिल वालों का शहर हो यहां के लोगों की समाजिकता विश्व विख्यात है। लोगों को पड़ोस में रह रहे लोगों का नाम तक नहीं पता होता है भले ही गाहे-बगाहे लोग एक-दूसरे को देख मुस्कुराते हुए दुआ-सलाम कर लेते हो।

यह सामाजिक पितृसत्ता का व्यवहार उस रात भाई साहब के नींद में खलल डालने का सबब जरूर बन गया, जिसके वज़ह से हमलोग भी जागे रहे। भाई साहब को समझाया आपको इस बीमारी से सकारात्मक रूख से लड़ना होगा नेगटीव अप्रोच आपको मेंटल एन्जाएटी देगी। भाई साहब से रात के तीन बजे अपने डाक्टर से बात की उन्होंने भी यही समझाया, उसके बाद भाई साहब सोने गए और इन बातों से अपना ध्यान हटाया।

मोहल्ले के लोगों का नाकारात्मक व्यवहार परेशान करने वाला था

आज हम लोगों के सेल्फ क्वारंटीन का 13वां दिन है और भाई साहब पूरी तरह से स्वस्थ है उनके साथ हम बाकी लोग भी। परंतु, तीन-चार दिन पहले सब्जी खत्म होने मोहल्ले के लोगों का नाकारात्मक व्यवहार देखने को मिला वह परेशान करने वाला था।

आप सरकारी गाड़ी में अपना कूड़ा खुद डालना

यहीं नहीं कूड़ा इकठ्ठा करने वाला व्यक्ति भी यह कहते हुए मिला कि मैं अभी आपका कूड़ा नहीं ले सकता आप सरकारी गाड़ी में अपना कूड़ा डालना। सब्जीवालों ने तो डर से मोहल्ले में मेरे घर के सामने ही आना बंद सा कर दिया है। यह हालत उस दिल्ली के उस मोहल्ले की है जहां मैं अपने भाई साहब के साथ 2010 से रहता आ रहा हूं।

कमाल की समाजिकता

है न कमाल की समाजिकता….मैं जानता हूं इसका कुछ नहीं किया जा सकता है। दिल्ली भले दिलवालों की है पर यहां के लोगों का दिल किसी तिजोरी में बंद है।

हम लोग अभी एमसीडी के चिपकाएं पोस्टर के अनुसार तीस तक क्वारंटीन में है क्योंकि उन्होंने जांच के दो दिन के बाद से अपनी गिनती की है। हम लोग फिट हैं और तीन दिन के बाद समान्य रूप से अपनी दैनिक गतिविधियों में सक्रिय भी हो जाएगें।

समाज इस बीमारी को घर में छुपाकर रखने को मज़बूर कर रहा है

महत्वपूर्ण सवाल यही है कि ‘सरकार इस बीमारी से जी तोड़ तरीके से लड़ रही है और समाज इस बीमारी को घर में छुपाकर रखने को मज़बूर कर रहा है।’ फिर कोरोना महामारी से हमसे-आपसे मिलकर बना समाज, राज्य और राष्ट्र कैसे लड़ेगा? लोग कैसे भयमुक्त होकर अपनी टेस्टिंग कराने के लिए स्वयं आगे आएगे और पोजेटिव होने पर सेल्फ कोरोन्टाइन होने को प्रेरित होगे।

जब तक समाज का प्रत्येक व्यक्ति रोज कालर ट्यून में, “नमस्कार, कोरोना वायरस या कोविड 19 से आज पूरा देश लड़ रहा है। पर याद रहे, हमें बीमारी से लड़ना है, बीमार से नहीं। उनसे भेदभाव न करें, उनकी देखभाल करें”, सुनकर भी दोमुहां व्यवहार करेंगा तब तक समाज, राज्य या देश कभी भी कोरोना महामारी के संकट से नहीं ऊबर सकेगा।

सरकार को इस दिशा में कठोर कार्यवाही करनी चाहिए नहीं तो हम इस कोरोना जंग से अपने घर में सबसे पहले हार जाएंगे। हम सब को यह समझना होगा सामाजिकता के अभाव में कोरोना जंग लड़ना बेमानी है।

मूल चित्र : Canva

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