उफ़्फ़! जब अपने ही लिए गए निर्णय खुद पे भारी पड़ने लगें…

Posted: November 1, 2019

अब गौरी को लगने लगा कि अब तुषार, माला का ध्यान रख रहा है तो कहीं उससे दूर तो नहीं चला जायेगा। तुषार समझाता कि इस समय माला और बच्चे को उसकी ज़्यादा ज़रुरत है। 

गौरी को पाँच साल हो गये शादी करके आये। वो प्यार के पल कैसे बीत गये तुषार के साथ पता ही नहीं चला। सब आसपास के कहते ऐसा लगता है जैसे नयी नयी शादी हुई हो। बस एक कसक थी, उनके कोई बच्चा नहीं था। इलाज करा कर थक गये। कोई उम्मीद भी नहीं रही। तुषार ने गौरी को इतना संभाला कि अगर बच्चे की याद में वह उदास होती तो तुषार कुछ ऐसा सरप्राइज देता कि वह दर्द भूल जाती।

फिर तुषार की दोस्ती माला से हुई। बराबर का ही केबिन था उसका। माला सुंदरता की मिसाल थी, जो देखता देखता रह जाता। सोच-पहनावा आजकल के जमाने का। तुषार से काम के सिलसिले में बातें होती रहतीं। माला की शादी नहीं हुई थी। अभी नयी थी शहर में। आफिस के गेस्ट हाउस में रूकी थी। आफिस की तरफ से एक महीने को मिलता था गेस्ट हाउस, जब तक घर ना ढूंढ ले कोई। तुषार ने अपने घर के ऊपर मकान दिलाने में मदद की थी।

पड़ोसन बन कर आ गयी थी माला। गौरी भी अकेले होने कि वजह से माला का ध्यान रखती। दोनों में दोस्ती होने में ज़्यादा समय नहीं लगा। गौरी कुछ भी बनाती माला को भेजती। माला भी तारीफ करते नहीं थकती थी।

माला, गौरी के करीब आ गयी थी। बच्चा ना होने की वजह से गौरी, माला को अपना दर्द बताती। माला की गोद मे सिर रख कर बड़ी बहन की तरह रो लेती और माला समझा देती।

एक दिन माला को गौरी ने फोन किया। माला आई तो गौरी का रो-रो कर बुरा हाल था, “क्या हुआ? क्यों रो रही हो गौरी दीदी?”

“अब तुषार का दुःख नहीं देखा जाता।”

“मुझे नहीं बताते पर अलग कमरे में रोते देखा है मैंने उन्हें बच्चे के लिये। कल सब आफिस वालों ने अपने बच्चों को घुमाने का प्लान बनाया। पर तुषार सीने में दबा गये दुःख। मैंने रात रोते हुये देखा उन्हें। टूट गयी अब मैं। ना मायके में बता सकती हूँ रोज़-रोज़ एक ही बात,  ना ससुराल में। तुम ही हो जिसे बता सकती हूँ।”

“आज जो माँगू दोगी?” माला ने चौंंक कर कहा, “क्या? बोलो दी।”

“मेरे तुषार के बच्चे की माँ बनोगी?”

“क्या कह रही हो दीदी? मैं समझी नहीं”, माला पसीने-पसीने हो गयी।

गौरी ने कहा, “तुम हाँ कर दो तो तुषार को मैं समझा लूँगी। ये हमारा अपना बच्चा होगा। तुम को जानते हैं,  समझते हैं हम, एक साल हो गया है अब साथ। मान जाओ”, गौरी ने हाथ जोड़ कर कहा।

“नहीं दीदी हाथ मत जोड़िए। सैरोगेट मदर बनना, ये बहुत बडा़ फैसला है। मेरे घरवाले तैयार नहीं होंगे। मेरे लिये लड़का देख रहे हैं। मुझे कुछ समय चाहिये।”

कुछ दिन तक माला समझाती रही लेकिन उसका परिवार तैयार नहीं था। लेकिन माला की ज़िद ने अपने परिवार को मना लिया।

तुषार को जब पता चला, वह बहुत नाराज़ हुआ। गौरी ने अपने मारने की धमकी देकर कुछ दिनों में उसको भी मना लिया। जब माला का चेकअप हुआ हुआ कुछ दिनों में तो माला को खुश खबरी मिली। तुषार और गौरी माला का खुब ध्यान रखते।

पर अब गौरी को लगने लगा कि अब तुषार, माला का ध्यान रख रहा है तो कहीं उससे दूर तो नहीं चला जायेगा।माला को जो चाहिये होता, तुषार तुरंत हाज़िर कर देता। गौरी को लगने लगा कि कहीं वह तुषार को खो ना दे।वो तुषार से बार-बार पूछती, “तुम माला को तो प्यार नहीं करने लगे?” तुषार समझाता कि इस समय माला और बच्चे को उसकी ज़्यादा ज़रुरत है। वो हम दोनों का बच्चा है।

पर गौरी को लगने लगा कि माला को सैरोगेट बनवाना कहीं गलत फैसला तो नहीं। माला अब माँ जैसा महसूस करने लगी। वो जो अहसास महसूस करती, गौरी को बताती। पर गौरी को तो नकारात्मक विचारों ने घेर लिया।उसे लगने लगा कि माला उसकी जगह ना ले ले। किसी को उसकी अब ज़रूरत नहीं।

तुषार, गौरी के साथ रहता और गौरी से बातें करता। पर गौरी को लगता तुषार उसके साथ खुश नहीं है।
माला और बच्चा ही अब उसकी खुशी है। तुषार समझाता पर गौरी अपने मन को नहीं समझा पा रही थी कि माला को थोडे़ ही दिन तुषार की ज़रूरत है।

आज वह दिन आ गया जिसका सबको इंतजार था। माला को तुषार और गौरी हॉस्पिटल लेकर गए। माला को एडमिट करने के लिए ले गए थे। तभी तुषार कुछ डॉक्टर से बात करने लगा।

 गौरी ने एक पत्र नर्स को देते हुए कहा कि इसे तुषार को दे देना और वह हॉस्पिटल से बाहर चली गयी। नर्स ने तुरंत तुषार को पत्र दिया। उसमें लिखा था, “तुषार मैं जा रही हुँ। अब मेरी ज़रूरत नहीं है। तुम माला और बच्चे के साथ खुश रहना।’ तुषार पत्र पढ़कर तुरंत हॉस्पिटल से बाहर गया। उसको गौरी हॉस्पिटल के बाहर टैक्सी का इंतज़ार करती मिल गयी।

तुषार ने तुरंत गौरी को गले से लगा लिया, “यह क्या कर रही हो, गौरी? कहाँँ जा रही हो मुझे छोड़कर? तुम्हें कैसे मैं बताऊं, तुम मेरे लिए क्या हो? तुमने अपने दिमाग में पता नहीं क्या-क्या सोच रखा है। गौरी मैं तुम्हें भूला नहीं हूं। सिर्फ माला और हमारे बच्चे के लिए हम दोनों का फ़र्ज़ बनता है कि हम उनका ध्यान रखें।”

“माला शादीशुदा ना होकर भी हमारे लिए इतना बड़ा त्याग कर रही है, वो भी अपने घर वालों की मर्ज़ी के बिना। हमें उसका शुक्रगुज़ार होना चाहिए और तुम ध्यान रखने की बात को ना जाने कहां से कहां ले गयीं। मैंने कितना समझाया तुम्हें।”

 “तुम्हारे बिना मैं जी भी नहीं सकता। हम दोनों मिलकर उस बच्चे को पालेंगे, जो हमारा इस दुनिया में आने वाला है। चलो गौरी माला एडमिट है, उसे हमारी ज़रूरत है।”

गोरी रोने लगी और माफी मांगने लगी, “माफ कर दो तुषार। मेरे मन में पता नहीं क्यों तुम्हें खोने का डर बैठ गया।और मुझे ऐसा लगने लगा जैसे तुम माला के साथ अपना जीवन बिताना चाहते हो।”

“चलो गौरी अभी यह वक्त नहीं है। अभी हमें माला के पास जाना है,” तुषार ने कहा।

हॉस्पिटल के अंदर आते ही डॉक्टर ने बताया कि माला ने बेटी को जन्म दिया है और वह सबसे पहले गौरी दीदी के गोद में उस बच्चे को देखना चाहती है।

थोड़ी देर बाद माला को होश आ गया। माला ने पूछा, “गौरी दीदी, तुम कहां चली गयीं थीं मुझे छोड़कर इस हालत में? मुझे थोड़ी देर पहले नर्स ने सब कुछ बता दिया।”

“अगर तुषार मेरी चिंता करते, तो मुझे ऐसे अकेले छोड़कर नहीं जाते। वह मुझे छोड़कर तुम्हारे पास तुम्हें ढूंढने के लिए चले गए। आपने ऐसा सोचा भी कैसे?” बच्चे को डॉक्टर ने गौरी की गोद में दे दिया। गौरी ने तुरंत जाकर माला के पास बच्ची को दिया और बोली, “माफ कर दो गौरी। कई बार आँखों पर पर्दा पड़ जाता है।”

“यह देखो तुम्हारी बच्ची”, बच्ची को माला की गोद में दे दिया गौरी ने।

“देखो हूबहु तुम्हारे जैसी है।”

माला ने कहा, “मैं उसकी मासी हूंँ। आप इसकी माँँ हैं।”

और सब खुश हो गये।

माला के घरवाले भी आ गए थे। कुछ दिन बाद हॉस्पिटल से डिस्चार्ज होने के बाद माला ने अपना तबादला अपने घर के शहर में करवा लिया। गौरी और तुषार ने बहुत रोकना चाहा पर माला ने कहा, “दीदी रुक गई तो दिल पिघल जाएगा। मेरा यहां से जाना ही ठीक होगा। मासी बनकर आती रहूंगी और बच्ची से मिलती रहूंगी।”

तुषार और गौरी माफी मांगने लगे, “माला तुमने हमारे लिए जो भी किया है हम उसका कर्ज़ कभी नहीं चुका सकते।”

सबकी आँखो में नमी थी।

मूल चित्र : ‘चोरी चोरी चुपके चुपके’ फिल्म से 

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