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पत्नी करे तो फ़र्ज़, पति करे तो जोरू का गुलाम?

Posted: May 13, 2020

आपकी नजर में पत्नी की, पत्नी की परिवार का ध्यान रखना जोरू का गुलाम हो गया? और पत्नी जो पति और उसके परिवार वालों के लिए करती है, वो फर्ज!

“सुनो जी रीना बहुत बीमार है। सुना है राघव भैय्या ने भी छुट्टी ले रखी है। आप चलोगे क्या शाम को मेरे साथ? मेरी बहुत अच्छी सहेली है, आपको पता ही है। वैसे तो मुझे जाना है खाना देने उसे, पर आप चलोगे तो अच्छा लगेगा।” रिति ने अपने पति रोहन से पूछा।

“ठीक है शाम को तैयार हो जाना चलेंगे,” रोहन ने रीति से कहा।

श्याम को दोनों रीना के घर पहुंचे। रीना के पति ने दरवाजा खोला, “आइये आइये बैठिये।”

रोहन ने पूछा, “कैसी तबीयत है भाभी की?”

“अब ठीक है। कमजोरी बहुत आ गई है। वायरल की वजह से पूरा शरीर उठ नहीं रहा”, और चेयर आगे करते हुए उसने रीना के बेड के पास ही दोनों को बैठने को कहा और राघव अपने हाथ से रीना को जूस पिलाने लगा।

रोहन ने पूछा, “अपने आप नहीं ले सकतीं क्या?”

“नहीं, अभी बहुत कमजोरी है और रिति भाभी आपका बहुत शुक्रिया। चार पाँच दिन से आप ही खाना भेज देती हैं”, राघव ने रीति को कहा।

“अरे! इसमे क्या बहुत बड़ी बात है! कोई भी होता तो वो करता ऐसा। वैसे भी टाइफाइड के कारण हास्पिटल में थी तो आपका भी कितना काम बढ़ गया था। बच्चों का ध्यान, हास्पिटल भी जाना। फर्ज है मेरा।”

“जी शुक्रिया बस अब कुछ महीनों के लिए खाना बनाने वाली का इंतजाम भी कर दिया। कोई अच्छा कुक नहीं  मिल रहा था। अब आप खाना नहीं भेजिएगा।”

“अच्छा भैय्या कोई और परेशानी हो तो बेझिझक बताइयेगा”, रिति ने कहा।

“जी ज़रूर।”

यह कहकर वह हाल-चाल पूछ कर, थोड़ी देर बैठ कर अपने घर आ गए। रोहन राघव की रिती से बुराई करने लगा, “कैसे रीना भाभी को हाथ से जूस पीला रहा था हमारे सामने। ये नहीं कि उन्हें खुद पीने दे। छोटी बच्ची थोड़ी ही है।”

रीति बोली, “बहुत कमजोरी में हाथ काँपते है। अभी चल भी नहीं पाती।”

“अरे बेकार की बातें हैं ये। राघव तो रीना भाभी के पल्लू से बंधा रहता है शायद।”

रीति और रोहन में बहुत बहस हुई पर रोहन तो समझने को तैयार नहीं था। उसे तो पति का अंहकार था कि पत्नी के लिए ये सब क्यूँ करना।

रीना ने सही होने के बाद शुक्रिया कहने के लिए घर बुलाया रिति के परिवार को। बीमारी में रिती ने बहुत ध्यान रखा था। राघव रसोई में रीना की मदद करा रहा था, कभी खाना खिलाने में।

घर आकर रीति ने कहा, “देखो भैय्या ने कितनी मदद की जबकि अब रीना बीमार नही।”

रोहित गुस्से से बोला, “हाँ पहली बार में ही लगा था जोरू का गुलाम । वो कह भी रहा था कि हमेशा मदद करता हूँ।”

“रीना भाभी कह भी रही थी ये बीमारी में हर किसी का ध्यान रखते हैं, मायके वाले हों, तब भी।”

रोहन ने तेजी से बोलते हुए कहा, “हर बात पर पत्नी की हाँ में हाँ और हर बात में अपने ससुराल की तारीफ़। गुलामी ही करता रहता है।”

“कैसी बात करते हो रोहन? पहली बार उसे कितनी कमजोरी थी हास्पिटल से आई थी और अगर मदद की भी तो और कौन करेगा? अपने घर परिवार की भी तो तारीफ कर रहे थे! रीना के मायके की तो गलत लगी आपको।”

“आप तो मेरे मम्मी-पापा के बीमार होने पर भी ध्यान नहीं रखते कि एक फोन कर लूँ! आपकी नजर में पत्नी की, पत्नी की परिवार का ध्यान रखना जोरू का गुलाम हो गया? और पत्नी जो पति और उसके परिवार वालों के लिए करती है, वो फर्ज! तो मैं तारीफ ही करूंगी कि वो कितने अच्छे हैं।”

“ज़्यादा बातें ना बनाओ रिति। कभी तुम मुझसे ये उम्मीद करती हो, तो माफ करना। मैं कभी जोरू का गुलाम नहीं बनने वाला।”

“तुमसे कभी उम्मीद भी नहीं है रोहन, जो पत्नी की परेशानियों को समझे। मैंने अपनी बीमारी में भी कभी तुम्हें बच्चों को सम्भालते नहीं देखा। कभी मेहमान आए तो रसोई में आते, सहायता करते, तो कभी भी नहीं। तुम्हें कोई नहीं समझा सकता रोहन। तुम्हारी सोच अभी सीमित दायरे में है।”

“अच्छा मेरी सोच इतनी बेकार नहीं कि पत्नी का काम खुद करूं। औरत इसिलिए बनी है। लड़के वाले कभी नहीं झुकते। लड़की के परिवार वाले को ही झुकना पड़ता है। हम क्यूँ फोन करें उन्हें? उन्हें ही करना होगा हमें। मैं दामाद हूँ।”

रिती का गुस्सा अंदर ही अंदर उबल रहा था पर बात बढ़ेगी इसलिए लिऐ वहाँ से कमरे में चली आई। आज उसे बहुत छोटी सोच लग रही थी रोहन की।

ये बहुत घरों की कहानी है, जहाँ पति पत्नी की भावनाओं को नहीं समझते या मदद करना अपनी बेइज्जती समझते हैं। एक कप चाय बनाने में लगता है कि ये उनका नहीं उनकी पत्नी का काम है।

पता नहीं कब बदेलेगी ये सोच?

मूल चित्र : फिल्म घर की मुर्गी

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