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वो 5 बातें जो मैं अपनी माँ से किसी भी हाल में नहीं सीखना चाहती

Posted: अप्रैल 18, 2019

मैंने इन 5 बातें पर गौर किया और बदलते वक्त का तक़ाज़ा कहता है, जो बातें हमें हमारी मां ने सिखाईं, वो हमारे बच्चों को, सिखाना पर्याप्त नहीं होगा।

‘माँ ने ये सिखाया’, ‘उसी ने मुझे ये बताया’, ‘मां की सीख बहुत काम आयी’, दिन का कोई ऐसा लम्हा नहीं गुज़रता होगा जब हमें हमारी मां की याद नहीं आती।

कोई हमारे खाने की तारीफ करे तो सबसे पहले हम यही कहते हैं कि माँ ने सिखाया था। अच्छा बोलना,अच्छे संस्कार,अच्छा काम,अच्छी सोच, मां हर विशेषण का पर्याय बनती है और हमें इस बात पर बहुत गर्व भी होता है। लेकिन एक बच्चे की माँ बनने के बाद मैंने कुछ बातों पर गौर किया और बदलते वक्त का तक़ाज़ा कहता है, जो बातें हमें हमारी मां ने सिखाईं, शायद वो हमारे बच्चों को आज के समय में सिखाना पर्याप्त नहीं होगा। जो बातें उस समय आवश्यक मानी जाती थीं, वो इस दौर में संशोधित कर हमारे बच्चों को देने की ज़रूरत है।

आईये, चलते हैं उन 5 बातों की ओर जो मैंने अपनी माँ से नहीं सीखने का निर्णय किया-

1. सहन करना

“बेटा! सहनशक्ति की ताकत ईश्वर ने हम औरतों को दी है। घर की सुख-शांति हमेशा औरतों के हाथ में होती है।”

कुछ हद तक सही है लेकिन घर समान गाड़ी के दो पहिये होते हैं आदमी और औरत। किसी भी एक पहिये पर बोझ डालने से गाड़ी व्यवस्थित तरीके से नहीं चलाई जा सकती है। गलत के खिलाफ आवाज़ उठाना, अन्याय के खिलाफ बोलना और शोषण का विरोध करना मेरे समय के नए मूलमंत्र हैं, बजाय सहने के।

2. सही समय पर शादी और बच्चे कर लेना

मेरी माँ ही नहीं, शायद आप सब पाठकों ने भी कहीं ना कहीं ये सुना होगा या सहा होगा। खासकर, अगर हम लड़कियां हैं तो हमारे घरों में लड़कियों की पढ़ाई खत्म होते ही शादी की चिंता माँ-बाप को सताने लगती है और शादी होते ही नाती-पोतों का मुंह देखने की इच्छा होने लगती है।

शायद मैं अपने बच्चों के साथ ऐसा ना कर पाऊँ। उन्हें तब तक शादी करने की ज़बरदस्ती नहीं की जाएगी, जब तक वो खुद इतने बड़े फैसले के लिए मानसिक तौर पर तैयार नहीं हो जाते। ठीक उसी तरह, उनके वैवाहिक जीवन के फैसले लेने की पूरी-पूरी छूट होगी उन्हें। मेरे बेटे-बहु या बेटी-दामाद के हर फैसले में उनका साथ देना और उसका सम्मान करना मेरी ज़िम्मेदारी होगी।

3. मासिक धर्म का सही ज्ञान

मासिक धर्म का ज़िक्र होना घर में जैसे कोई पाप था। इधर-उधर कुछ नहीं छूना, दिन में सोना नहीं, अनर्गल व्यवहार करना, गुप-चुप उसकी बात करना, हम सब ने अपने बचपन में बहुत देखा है और कई घरों में आज भी देखते हैं।

आने वाली पीढ़ी को इसका सही ज्ञान देना, उसे छुपाने का मुद्दा बनाने की बजाय, उसे समझने में उनका साथ देना और धीरे-धीरे सदियों से चली आ रही इस रूढ़ि परंपरा को विज्ञान के मत से समझाना, मेरी पहल होगी।

4. शारीरिक और मानसिक तौर पर उन्हें तैयार करना

हमारे समय में लड़कियों को अगर कोई छेड़ देता तो वे नीची गर्दन कर वहां से निकल जाती थीं और घर वाले भी यही हिदायत देते थे कि ऐसे उलझन में पड़ने की ज़रूरत नहीं है। लेकिन आज के समय के चलते “सेल्फ डिफेंस” हर बच्चे के लिए अनिवार्य है, विशेषकर लड़कियों के लिए। हर तरह के आपत्तिजनक व्यवहार का उन्हें मुंह-तोड़ जवाब देना आना चाहिए।

5. “अच्छा नहीं लगता” का बंधन

‘ऐसा नहीं पहनते बेटा, ऐसा अच्छा नहीं लगता’

‘ऐसे नहीं बोलते, अच्छा नहीं लगता’

‘सीधा बैठना सीखो’

‘सीधे चलो’

‘ज़ोर-ज़ोर से गाना मत गाओ’

यहां सिर्फ ये 5 बातें, लेकिन और बहुत लंबी सूची है। पर, हमारे बच्चों के लिए नहीं होगी। उन्हें उनके हिसाब से रहने की उन्हें पूरी आजादी होनी चाहिए। उनके उठने-बैठने जैसी क्रियाओं पर पाबंदी, उन्हें केवल हमारी संकीर्ण सोच का ही उदाहरण देगी।

अनुभव में जब नवीनीकरण का तड़का लगे तभी परवरिश का स्वाद आए। पुराने लोगों की कुछ सीख और नए ज़माने के नुस्खे, हमारी आने वाली पीढ़ी का बेहतर कल तैयार कर सकती है।

ये वो 5 बातें थी जो मैंने देखी, सुनी और सही, अगर आपके पास भी हैं कुछ किस्से, तो साझा ज़रूर करें। आपके मत का स्वागत रहेगा।

मूलचित्र: Pixabay

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