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…और अब सबका अगला सवाल था कि कन्यादान कौन करेगा?

खून के रिश्ते होने से परिवार नहीं बनता, परिवार तो वो है जिसने अपने सम्बन्धी को किसी संकट में देख, बिना किसी की परवाह किये उसका हाथ पकड़ने का निर्णय किया।

खून के रिश्ते होने से परिवार नहीं बनता, परिवार तो वो है जिसने अपने सम्बन्धी को किसी संकट में देख, बिना किसी की परवाह किये उसका हाथ पकड़ने का निर्णय किया।

सम्प्रीती आज दुल्हन बनी मण्डप में खड़ी थी। श्रेयांश ठीक उसी के पास खड़ा अपने सामने अपने सपने को सच होते हुए देख रहा था। तभी पंडित जी ने कन्या के माता पिता को कन्यादान के लिए आगे आने को कहा। पंडित जी ने फिर से बुलाया पर कोई आगे नहीं आया।

श्रेयांश और सम्प्रीती एक साथ कॉलेज में पढ़ते थे और एक दुसरे से प्यार करने लगे। वक़्त के साथ उन्हें पता ही नहीं चला कब उन्होंने ज़िन्दगी साथ बिताने का फैसला कर लिया। जब उन्होंने घर पर सबको बताया तो उन्हें स्पष्ट मनाही मिली। बहुत सारे विवाद हुए, तर्क हुए, इज्ज़त और समाज में नाम की दुहाई दी गयी, हाथ तक उठ गए, लेकिन सम्प्रीती और श्रेयांश दृढ थे।

वो एक दुसरे के बिना अपना जीवन किसी और के साथ सोच भी नहीं पा रहे थे। धीरे धीरे श्रेयांश के माता पिता, उनकी ज़िद्द के आगे झुककर मान गए और उन्होंने दोनों की शादी करवाने का निर्णय किया, लेकिन सम्प्रीती के घरवाले किसी भी तरह से शादी के लिए मानने को तैयार नहीं थे।

दादाजी ने ये कहकर मना कर दिया कि अगर कोई शादी में गया तो उनका कोई भी बेटा या बेटी शादी में नहीं आयेंगे। ना ही कभी कोई सम्बन्ध रखेंगे। दूसरी तरफ़ सम्प्रीती के मामा ने भी आने से मना कर दिया। सम्प्रीती के पिता चाह कर भी उसकी शादी श्रेयांश से नहीं करवा पा रहे थे। वो एक बार के लिए समाज की परवाह किये बिना बेटी की ख़ुशी चुनने को तैयार हो गए लेकिन अपने ही पिता के खिलाफ़ कैसे लड़ कर उसकी शादी करवाएं।

उनके दोनों बच्चे जो सम्प्रीती से अभी छोटे थे, उनकी शादी का ख्याल भी उन्हें परेशान कर जाता। उधर सम्प्रीती की माँ को मायके से हमेशा हमेशा के लिए मुंह फेर लेने की धमकी दी गयी। उनके मायके से कभी कोई उनके घर नहीं आएगा, ऐसा उनके भाई कह चुके थे। दोनों परिवार से हमेशा के लिए रिश्ता तोड़ देने और उनके साथ ना देने के कारण वो इतनी हिम्मत नहीं जुटा पाए कि वो सम्प्रीती की शादी करवा सकें।

पंडित जी ने फिर दोहराया, “वधू के माता पिता आगे आयें और कन्यादान की विधि के लिए बैठें। सब लोग कुछ खुसुर-फुसुर कर रहे थे।

“सम्प्रीती आई कैसे? कौन आया यहाँ फिर उसके साथ? उसके मम्मी पापा के बिना ये शादी कैसे होगी? लगता है पहले ही भाग कर शादी कर ली थी? क्या वधु पक्ष से कोई नहीं आया है? आजकल के बच्चे माँ-बाप की सुनते कहाँ हैं? और पढ़ाओ लड़कियों को ऊँची-ऊँची पढ़ाई!”

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तभी सुकन्या, सम्प्रीती की बड़ी बहन के सास ससुर आगे आये और हवन कुंड के पास आगे बैठ गए। उन्होंने कन्यादान किया। फेरे पूरे हुए और दूल्हा दुल्हन ने सबका आशीर्वाद लिया।

सुकन्या नवें महीने में थी। कभी भी बच्चा हो सकता था इसलिए वो शादी में नहीं आई लेकिन जब उसे पता चला कि उसके मम्मी-पापा के सामने धर्मसंकट खड़ा है, तो उसने अपने सास-ससुर से विनती की कि वो सम्प्रीती के धर्म माता-पिता बनकर उसका कन्यादान कर दें। अपनी बहू की विनती वो टाल ना सके। शादी संपन्न हुई।

सुकन्या के सास ससुर ने उन सभी अवधारणा को गलत साबित कर  दिया था कि बहु के मायके की खोट उनकी खोट होती है। उसके घर की त्रुटियाँ उसे ताने देने और नीचा दिखाने में काम ली जा सकती है। उसकी बहिन और परिवार पर लान्छन लगाने की बजाय उन्होंने उस परिस्थिति को हर मुमकिन कोशिश से सुलझाया और ये प्रमाणित किया कि परिवार क्या होता है।

केवल बहु के घर से कीमती उपहार और कपड़े लेने, मौज शौक से खाने-पीने, मीठी बातें करने को ही पारिवारिक बंधन नहीं कहते। उनके साथ उनके बुरे समय में खड़े होने की ज़िम्मेदारी भी होती है बहु के ससुराल वालों की।  जितना अधिकार से वो अपनी बहु के प्राप्ति का बखान करते हैं उतने ही निर्भीक होकर उन्हें उसकी खामियों को भी अपनाना चाहिए। साथ ही परिवार की एक नयी परिभाषा भी सामने आ गयी।

खून के रिश्ते होने से परिवार नहीं बनता। जो उस घड़ी में हमारा साथ छोड़ जाये जब हमें उनकी सबसे ज़्यादा ज़रूरत है, तो वो परिवार कैसे हुआ। परिवार की ख़ुशी के पहले समाज को चुन ले। इज़्ज़त और बच्चों की ज़िन्दगी को एक ही पलड़े में तोल दे। अपने ही बच्चों की ख़ुशी की कीमत लगा दें, अपने ही बच्चों को मर्यादाओं में बाँध दें, उन्हें ज़िन्दगी भर आक्षेप और ग्लानि  में रहने के लिए छोड़ दें?

असल में परिवार तो वो है जिसने अपने सम्बन्धी को किसी संकट में देख, बिना किसी की परवाह किये उसका हाथ पकड़ने का निर्णय किया। तो असल में कन्यादान का अधिकार भी तो उसी का हुआ ना। है ना?

मूल चित्र : Canva 

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Shweta Vyas

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