Shweta Vyas

Now a days ..Vihaan's Mum...Wanderer at heart,extremely unstable in thoughts,readholic; which has cure only in blogs and books...my pen have words about parenting,women empowerment and wellness..love to delve more on relationships and life...

Voice of Shweta Vyas

फिर लौट आओ

कभी आओ बैठो इन सरगोशियों में, बातें ढेर सारी करनी हैं तुमसे, छोड़ आओ अपना ये फ़हम कहीं दूर, कि अब कुछ पल तुम्हारा साथ ये दिल पाना चाहता है। 

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हाँ! वो भी देशभक्ति कहलाई थी

ज़रूरी नहीं हथियारों से ही लड़ा जाए, अपने घर से देश के लिए लड़ती आयी थी, हां! यही देशभक्ति कहलाई थी। हां! वो भी देशभक्ति कहलाई थी। 

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लकी या अनलकी-क्या नाम दें ऐसे वैचारिक सम्बोधनों को!

सबको साथ लेकर चलने की कोशिश और मानवता, कुछ तो मापदंड होंगे, जो मान भी लिए जाएँ, तो लकी या अनलकी होने की श्रेणी में डालते होंगे, पैसे की बरकत नहीं।

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मेरी पहली ‘ना’- चलता रहेगा ‘ना’ का ये सिलसिला

मेरी पहली 'ना' आज भी उत्पन्न कर देती है ज़लज़ला, पर माफ़ कीजियेगा यूँ ही चलता रहेगा 'ना' का ये सिलसिला।

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5 बातें जो मैं अपनी माँ से नहीं सीखना चाहती!

मैंने कुछ बातों पर गौर किया और बदलते वक्त का तक़ाज़ा कहता है, जो बातें हमें हमारी मां ने सिखाईं, वो हमारे बच्चों को, सिखाना पर्याप्त नहीं होगा।

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बस इतना ही कहने आयी हूँ – नहीं बनना मुझे सीता और द्रौपदी

रक्षक के भेष  छुपे भक्षक बोलो, "क्या है मेरा जो मुझे जननी कहते हो, जन्म मेरा ही बाकी अब तक, स्वयं चुभा तीर, रहेगा रक्षक का आडंबर कब तक?"

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मेरा पति ‘परमेश्वर’ नहीं – सावित्री बनने की उम्मीद सिर्फ औरत से ही क्यों

जो पति अपनी पत्नी को उचित सम्मान और प्यार ना दे, वो उसी दंड का पात्र हो, उसी अवहेलना का पात्र हो, जिसकी खरा ना उतारने पर, औरत होती है। 

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मैं रहूँ या ना रहूँ भारत ये रहना चाहिए!

कमज़ोर होना जितना गलत नहीं उतना ख़ुद को कमज़ोर मान लेना है। जान देने का सौभाग्य मिले ना मिले, आवाज़ उठाने का हौसला खोना नहीं चाहिए।

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यादों का पिटारा – कबाड़ में बेच आऊं

तलाश है मुझे अपने आप की - अब बहुत हुई जंग, छोड़ो मेरा दामन, हट जाओ परे, सबसे, मेरे ख्याल और मेरा ज़हन से।

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शमा का #MeToo: अपनी “मैं” की पहचान

"गरीब हैं। लेकिन, इतना समझते हैं, गलत को सहते जाएंगे तो हमेशा सहते ही रहेंगे।" #Me Too का सही अर्थ शमा ने आज मेरे को सिखाया।

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कैसे पहचान करें नकारात्मक लोगों की!

दुर्भाग्यवश, ये प्रजाति हमें हमारे ही बीच मिलती है। पड़ोस में, ऑफिस में, रिश्तेदारों में, दोस्तों में। मुश्किल ये है कि इन्हें पहचाना कैसे जाए? इनसे दूर कैसे रहा जाए?

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बिखरते रिश्तों को समेटता …..’आशालय’

पता नहीं कितनी कहानियाँ... बढ़ती उम्र के साथ घटती उम्मीदों की। बड़े से घरों में बढ़ती दूरियों की। कितने उधड़ते-बुनते रिश्तों से बना था ये 'आशालय'।

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