“मुझे नहीं चाहिए आज़ादी!” आखिर क्यों?

Posted: September 7, 2018

राम कुछ कह नहीं पा रहा था पर सब समझ रहा था। उसने अपने बाबा से कहा, “बाबा, मुझे नहीं चाहिए आज़ादी|” आखिर  क्या हुआ जो राम ने ऐसा कहा?

आज राम के भाई को शहीद हुए एक साल हो गया। अपने भाई को याद करते हुए दस साल के रामेश्वर ने अपने पिता से पूछा, “बाबा, ये आज़ादी क्या है? क्यों बड़े भैया उसके लिए शहीद हो गये। मुझे भी आज़ादी चाहिए।” तब  राम के बाबा ने कहा, “आज मैं तुम्हें एक कहानी सुनाऊँगा। आज़ादी की। पर अभी नहीं शाम को।” और, वो अपना झोला उठाए बाहर चले गये।

उसी दिन अंग्रेज़ों की गोली उन्हें शहीद कर गयी। और राम…..

राम उनका इंतज़ार करते-करते सो गया। उसने एक सपना देखा जिसमें वो अपने बाबा से मिला। वो उनसे चिपक गया। ज़िद कर बोला, “अब मैं आपको कहीं नहीं जाने दूँगा।”

उसके बाबा ने कहा, “जाना तो होगा, लेकिन मैं तुम्हें कहानी सुनाने आया हूँ। दिखाने आया हूँ कि आज़ादी कैसी होगी।”

“चलो भविष्य में चलते हैं।”

“क्यों ना वर्ष 2020 में चलें। तब तक तो मेरा देश बहुत विकास कर चुका होगा।”

राम की नम आँखे अचानक चमक सी उठीं।

वो चले और जैसे ही वो भविष्य में आए मानो कोई सपना सच हुआ हो। सब तरफ चमक थी।

राम ने देखा चारों तरफ सुंदर खिलौने थे। सभी ने सुंदर-सुंदर कपड़े-जूते पहने थे। उसने कल्पना भी नहीं की थी कि सब इतना सुंदर हो सकता है। नया-नया खाने का समान था। सब कुछ कहानियों जैसा था। इतनी बड़ी-बड़ी सड़कें थीं। उस पर सरपट दौड़ रही गाड़ियाँ। एक पूरा दिन निकलने को था।

राम और उसके बाबा को यकीन ही नहीं हुआ कि वो अपने देश में खड़े है। तभी पीछे से किसी ने आवाज़ दी, “दिखाई नहीं देता है क्या?” वो सड़क के बीच में थे और इतनी भीड़ मे कुछ समझ नहीं आ रहा था। अचानक देखा सामने वाली सड़क पर कोई खून में लथपथ पड़ा है। उन्होंने भाग के देखा तो सब उसके चारों तरफ खड़े होकर हाथ मे छोटा सा कोई यंत्र ले कर उसकी तरफ देख रहे थे। राम ने बाबा से पूछा, “ये इसको उठा क्यूँ नहीं रहे हैं बाबा?” बाबा ने कहा, “बेटा ज़रूर इस यंत्र मे कोई शक्ति होगी। देखो कितने सारे लोग मदद कर रहे हैं।”  राम को कहीं से एक और तेज़ आवाज़ आई और वो भाग गया। तब तक राम के बाबा ने देखा कि वो आदमी वहीं मर गया है और अब भी कोई उसे नहीं उठा रहा। वे उसकी मदद करने और कुछ भी समझ पाने में असमर्थ थे। फिर वो राम के पीछे भागे।

अभी भी दुविधा और सोच मे पड़े थे राम के बाबा। इससे पहले कि कुछ और सोच पाते, देखा एक बड़ी सी गाड़ी में एक परिवार बैठा था। बाहर चार छोटे बालक, थोड़े ग़रीब घर के थे शायद, उनसे खाना माँग रहे थे। लेकिन उस परिवार ने उन्हें डाँट कर भगा दिय। ये देख कर राम ने फिर से पूछा, “बाबा, आज़ादी ने इन नन्हे बालकों को खाना क्यूँ नहीं दिया? मैं इन्हें अपने साथ ले जाऊँगा।” राम के बाबा विचलित हो उठे।

आगे बढ़े, देखा लड़के-लड़कियाँ सब सुंदर से कपड़े पहन के स्कूल जा रहे है। उनका मन बहुत खुश हुआ कि मेरे देश की बेटियाँ भी अब पढ़-लिख कर अपने पैरों पर खड़ी होंगी। लेकिन उन्होंने देखा कुछ लड़के, लड़कियों को परेशान कर रहे थे और कोई लड़कियों की मदद नहीं कर रहा था। उनका बस चलता तो जाने क्या कर बैठते। एक तरफ जहाँ ये देख कर उनका खून खौल गया वहीं दूसरी तरफ वो हताश हो गये। कहाँ इस उम्र के लड़के-लड़कियाँ अपने देश के लिए शहीद हो गए, और आज यहाँ, आज़ादी मिलने के बाद ये युवा पीढ़ी इतनी संकीर्ण हो गयी?

अब राम इतनी सुंदर खाने की वस्तु देख अचम्भित था। राम के बाबा ने देखा सब चॉक्लेट, केक जैसी चीज़ें खा रहे हैं। जब उन्होंने देखा कि ये सब सेहत के लिए सिर्फ़ और सिर्फ़ हानिकारक हैं तो वो पूरी तरह से टूट गये। अपने हरे-भरे देश में कटे पेड़, ग़रीबी, आतंक और बिना किसी औचित्य के जीते जीवन देख कर बस अब वो वापिस जाना चाहते थे। राम कुछ कह नहीं पा रहा था पर सब समझ रहा था। उसने अपने बाबा से कहा, “बाबा मुझे नहीं चाहिए आज़ादी। यहाँ कोई किसी से बात भी नहीं करता। सब भागते रहते हैं।” राम के बाबा ने खुद को संभाला और कहा, “अगर तुम चाहते हो कि ऐसा ना हो तो तुम्हें कोशिश करनी होगी। छोटी से छोटी कोशिश से सब बदल सकता है। तुम अपने दोस्तों  को जा कर बताना कि हम बहुत आगे बढ़ सकते हैं। सबको शिक्षा मिलेगी। अच्छे कपड़े मिलेंगे। और भी सब बताना।” इतना कहते-कहते वो रुक गये और सोचने लगे की आज का ये दुर्भाग्यपूर्ण मानव तो अपनी कमज़ोरियों का ही गुलाम हो गया है और नम आँखे लिए कहीं ओझल हो गये।

राम की नींद टूटी और वो रोने लगा। उसकी माँ ने उसे गले लगाया और कहा, “नहीं  बेटा, बाबा शहीद हुए हैं। हमें आज़ादी मिले इसीलिए वो शहीद हुए हैं। रोते नहीं हैं।” राम ने कुछ न कहा। किसी से भी। बस अपनी माँ से चिपक गया पर वो आज़ादी के लिए नहीं लड़ा…..

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