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merelafz_rashmi

An ordinary girl who dreams

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पगफेरा – शक्ति का रूप और होंठों पर मुस्कराहट

रिंकी को मम्मी की धड़कन महसूस हो रही थी। दिल का एक हिस्सा जैसे टूट रहा हो अंदर और चेहरे पर जाने कौन सी शक्ति ले कर बैठी थीं।

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मुश्किल होता है ये बचपन भी…

बचपन के दिन केवल सुहाने नहीं होते हैं , बचपन का अल्हड़पन बयां करती कविता। 

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शून्य हूँ मैं, सिफ़र हूँ मैं

जीवन में शून्य हो  कर भी जीवन में खुश रहने की महत्ता सिखाती कविता 

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एक किताब तेरी

औरों को लगा तू खुशकिस्मत है, पर तेरी किताब में लिखा क्या था? 

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ज़ख़्मो की दुकान

"आपकी तरह मेरे पास भी कोई रास्ता नहीं है, ये सब रोकने का - पर वक़्त अब रहा भी नहीं है सिर्फ़ बेबस होने का"- सोई इन्सानियत को अब जगाना होगा। 

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ये महज मैं हूँ ? क्यूँ डरता है ये मैं?

कौन है यह मैं? क्या यह वही मैं है जो बदलाव लाना चाहता है पर हिचकिचाता भी है? सोचिये ज़रा!  

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“मुझे नहीं चाहिए आज़ादी!” आखिर क्यों?

राम कुछ कह नहीं पा रहा था पर सब समझ रहा था। उसने अपने बाबा से कहा, "बाबा, मुझे नहीं चाहिए आज़ादी|" आखिर  क्या हुआ जो राम ने ऐसा कहा?

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एक वीरांगना – लीनी की याद में

कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो अपनों की ख़ुशी के साथ-साथ, समाज के प्रति भी अपना धर्म बख़ूबी निभाते हैं। ऐसी ही एक वीरांगना थी लीनी। 

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मेरा सामान खो गया है

"यहाँ का कोई भी रिवाज़ समझ नहीं आता, जहाँ हर दिन कोई आता है - और मुझे थोड़ा और छीन कर ले जाता है ...." क्या आपको ऐसा रिवाज़ समझ आता है?

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ज़िन्दगी में रंग भरते – गुब्बारे – एक पल के लिए ही सही!

"ये गुब्बारे टूटने वाले सपनों की तरह होते हैं", मगर वो गुब्बारा मिलते ही मानो उसे दुनिया का सबसे बड़ा ख़ज़ाना मिल गया हो। ऐसा क्या था उस गुब्बारे में?

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सावित्री – क्या सिर्फ़ एक पतिव्रता? या एक स्वतन्त्र महिला?

जहां एक तरफ हम अपनी बेटियों को पढ़ाने की और स्वतंत्र बनाने की बात करते हैं, वहीं दूसरी ओर, उन्हें अपने निर्णय ख़ुद लेने से रोकते हैं। ऐसा ख़्याल मुझे वट-सावित्री की कथा पढ़ते-पढ़ते आया।

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