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भगवान् का होना, एक ज़रुरत या एक खुदगर्ज़ी, एक साज़िश

"भगवान् का होना तो ज़रूरी है, भगवान् न हो तो इंसानियत कैसे बिकवा पाएँगे?" प्रश्न है, 'क्या भगवान् का जन्म एक खुदगर्ज़ी, एक साज़िश है?'

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गौमाता

गौमाता के कितने भक्त! पर क्या इनमे से किसी को उसकी ज़रा सी भी फ़िक्र है?

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डायरी का एक पन्ना-ज़िन्दगी, मुझे इंतज़ार है तुम्हारा

ज़िन्दगी तेरे उन लम्हों के नाम, जो इम्तिहान लेते हैं-"ज़िन्दगी जब भी मिलना, पूरी तैयारी से मिलना क्योंकि इम्तिहान इस बार तुम दोगी। जवाब इस बार तुम दोगी।"

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उड़ने का साहस-हो अगर संग, तो साथ दो

जिंदगी की कई बारीकियों से तब मैं अंजानी थी-"जिंदगी बदलती है हर पल, पर न सोचा कि तू बदल जायेगा, ऐसे कैसे कोई अपना, सामने से पलट जायेगा?"

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क्यों मुस्कुरा रहे हो ऐ दोस्त? मैं, रुकने वाली नहीं

"आज एक अरमान दफ़न हुआ है, कल और ख़्वाब शहीद होंगे," पर मैं, रुकने वाली नहीं तब तक, जब तकअपने ख़्वाब को हक़ीक़त ना बना लूँ।

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महिला दिवस क्यों?

गर्भ में ससुराल में,भीड़भरे बाज़ार में, नारी को इंसान होने का ही प्रमाण नहीं, तो क्यों उस नारी को गर्वांवित कर महिला दिवस मनाऊ मैं?

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