जीवन का संगीत – कभी उतार, तो कभी, चढ़ाव

Posted: January 15, 2019

जीने के लिए, पलक की ही तरह, आइये, यही नजरिया अपनाएं-‘जिंदगी प्यार का गीत है’-जहाँ, कभी उतार है, तो कभी, चढ़ाव। संगीत के सुरों के भांति। 

मुंबई शहर में, हर दिन, न कितने जाने ख़्वाब बनते हैं, और टूट जाते हैं। किसी की आँखों में, सुपरस्टार बनकर, चकाचौंध की दुनिया में प्रवेश करना है, तो, किसी की चाहत होती है, लोग उसकी एक नज़र और ऑटोग्राफ के लिए दीवाने हों। तो किसी को, अपनी आवाज़ हर दिल की धड़कन तक पहुँचाने की चाह होती है।

पलक भी उन में से एक थी। संगीत जगत में अपना मुक़ाम हासिल करने के लिए वह कई सालों से संघर्ष कर रही थी। दो सालों के थका देने वाले, किन्तु उर्जापूर्ण संघर्ष और अपनी सुरीली आवाज़ के कारण उसे एक गाना ऑफर हुआ। पर अफ़सोस, वह गाना किसी भी फिल्म के लिए नहीं लिया गया। और, इससे पहले कि उसकी आवाज़ हर किसी तक पहुँचती, उससे पहले ही वह गाना डिब्बा-बंद हो गया। पर, पलक ने अपना संघर्ष जारी रखा। लाख मेहनत के बावजूद भी, उसे रिजेक्शन ही मिलते और अपमानजनक शब्दों का सामना भी करना पड़ता, जिसके कारण, उसका मन उदास रहने लगा। धैर्य जवाब देने लग गया, और, उसने कोशिश करना छोड़ दिया। और, रियाज तो कब का छुट चूका था।

एक शाम उसके दिमाग़ में यही बातें घूम रही थीं। क्या वह कभी गायिका बन पायेगी? इतने सालों की मेहनत और घर पर किया वादा क्या वह निभा भी पाएगी? या फिर? इतने सारे सवाल उसके सामने काले बादलों के तरह मंडराने लगे। न जाने उसे क्या सुझा, और, उसके कदम जुहू बीच के पास आकर थम गए। लहरें किनारों से अठखेलियाँ कर रही थीं। कभी ऊँची उठतीं, तो कभी, बिलकुल शांत शरमा जातीं। लहरों के शोर, और कोलाहल के बीच, पलक का मन बिलकुल शांत था। चेहरा मौन था, और पैर, समुंद्र की ओर बढ़ने लगे थे। वह अब अपनी जिंदगी ख़त्म कर देना चाहती थी। तभी, उसके कानों में बांसुरी की धुन गुंजी। मिश्री-सी मीठी धुन। पलक ने अपनी नज़रें दौड़ाई तो वहां एक 10-12 साल का बच्चा हाथों में अपनी बांसुरी थामे, बड़े ही सुकून के साथ, उसे बजा रहा था। सारी परेशानियों से दूर, मानों, उसकी पूरी दुनिया, उस बांसुरी में ही समाई हो।

पलक उस बच्चे के पास आकर रुक गई। उसने कहा, “वाह! कितनी अच्छी बांसुरी बजाते हो तुम। बहुत सुंदर, कर्णप्रिय।”बच्चे के पास ही बैठे, उसके पिता ने कहा,”धन्यवाद बेटी, ये मेरा बेटा है कन्हैया। इसे संगीत से बहुत लगाव है। मैं, बांसुरी बेचने वाला हूँ। घर-घर जाकर अपनी बांसुरी सुनाता हूँ। और, बच्चे मुझसे बांसुरी खरीदते हैं।”

पलक ने उस बच्चे से कहा, ”कन्हैया, तुम भी कुछ बोलो। तुम्हारी बांसुरी की धुन बहुत खुबसूरत है।”

कन्हैया के पिता ने कहा,”बेटी, ये बोल नहीं सकता। बचपन में ही इसकी आवाज़ चली गई थी। पर इसे संगीत से बहुत लगाव है। दिनभर, इस बांसुरी के साथ, यह धुन बनाता है और गाने बजता है।” उन्होंने आगे कहा,”मुझे विश्वास है, मेरे बेटे के बांसुरी की धुन, एक दिन, पूरी दुनिया सुनेगी।” उसके बाद, वे दोनों वहां से चले गए। पर, कन्हैया अब भी बांसुरी बजा रहा था, जिसकी धुन थी, ‘जिंदगी प्यार का गीत है,जिसे हर दिल को गाना पड़ेगा।’

किनारों पर, शोर करती लहरें भी, बांसुरी की धुन के साथ, ताल मिला रही थीं।

सचमुच, जिंदगी प्यार का ही गीत है। जीवन संगीत है। जहाँ, कभी उतार है, तो कभी, चढ़ाव। बिलकुल संगीत के सुरों के भांति।

पलक को समझ आ गया कि वह कितनी बड़ी गलती करने जा रही थी। एक पल को उसने अपनी आँखे बंद की, तो उसे, अपने सामने बहुत भीड़ दिखी, जहाँ ‘पलक-पलक’ की गूंज आ रही थी, और लोग, पलक के गानों पर झूम रहे थे।

तेज कदमों से पलक, अपने घर लौट आई। क्योंकि, आज रियाज़ भी करना है और, संगीत जगत में सितारा बनकर चमकना भी है।

मूल चित्र: Pexels

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