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ज्योति त्रिपाठी

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तुम्हारा पौरुष और मेरा अस्तित्व…

मैं अपने हर श्रृंगार से बढ़ा सकती हूं, तुम्हारे जीवन की खूबसूरती, पर नहीं चाहती कि तुम्हारे पौरुष से ढक जाए मेरा अस्तित्व।

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और रो पड़ती है मेरे भीतर की स्त्री तुम्हारी ‘प्यास’ की बदलती परिभाषा देख…

डरने लगी हूँ अब ये सोच के रुई के फाहे-सा नन्हा मादा शरीर, जब दब जाता होगा तुम्हारे भारी भरकम अहं के तले, तुम्हें कैसी सन्तुष्टि मिलती होगी...

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जब अपनी कहानी मैं खुद कहने लगी, तो तुम कहते हो मैं स्त्रीवादी हूँ?

इतिहास गवाह है कि कल से ले कर आज तक, और ना जाने कितने और कल तक, मर्द के लिए औरत बस अपनी जीत का डंका पीटने का एक ज़रिया रही है... 

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