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बेटा, मैं अपनी इज़्ज़त के साथ कोई समझौता नहीं करुँगी…

ये क्या थर्ड क्लास गद्दे बिछा रखे हैं तुम्हारी माँ ने जतिन? बेबी को रैशेस आ जायेंगे। हटाओ इसे और नया सेट जो मैंने मंगवाया था वो बिछा दो।

ये क्या थर्ड क्लास गद्दे बिछा रखे हैं तुम्हारी माँ ने जतिन? बेबी को रैशेस आ जायेंगे। हटाओ इसे और नया सेट जो मैंने मंगवाया था वो बिछा दो।

“सोच लो सुमन फिर बाद में ना कहना कि अपने मुझे समझाया क्यों नहीं था?”

“इसमें सोचना क्या है जी, बेटे बहु ने इतने प्यार से बुलाया है।  बहु का नाजुक वक़्त है इस समय ही तो मेरी सबसे ज्यादा जरुरत होगी उसे।”

अपनी पत्नी का उत्साह देख रमन जी ने कुछ और कहना उचित नहीं समझा। जब से ये ख़बर मिली की बहु रूचि माँ बनने वाली थी सुमन जी का उत्साह देखते बनता था। जब बेटे बहु ने उन्हें आने को नहीं कहा तो रमन जी के बार बार मना करने के बावजूद भी उन्होंने पूछ ही लिया जतिन से, “बेटा कहो तो आ जाऊँ? तुम दोनों को आराम हो जायेगा।”

“नहीं माँ, अभी नहीं, जब ज़रुरत होगी तब बुला लूंगा।”

सुमन जी तब निराश हो गई थी लेकिन अब जब डिलीवरी के दिन पास थे और रूचि की तबियत ज्यादा गिरी-गिरी रहती थी तब जतिन ने अपनी माँ को बुला लिया,  “माँ आप आ जाओ तो रूचि की चिंता मुझे नहीं रहेगी।”

बेटे के बुलावे का इंतजार करती सुमन जी का उत्साह देखते बन रहा था पिछली सभी बातें भूल वो रात दिन तैयारियों में लगी रहती कभी छोटे-छोटे गद्दे सिलतीं, तो कभी नन्हे मोज़े बुनतीं। बेटे के लिये बेसन के लड्डू और बहु के लिये ड्राई फ्रूट के लड्डू भी तैयार कर लिये थे।

“थोड़ा आराम भी कर लो नहीं तो वापस से गठिये का दर्द शुरू हो जायेगा”,  रमन जी चिंतित हो बोल उठे।

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“दादी बनने की ख़बर ने तो जैसे जादू कर दिया है मुझपे देखना अब कोई दर्द नहीं होगा मुझे!” हॅंस कर सुमन जी ने कहा तो रमन जी सोच में डूब गये।

बहुत प्रेम से सुमन जी रिया को बहु बना लायी थीं। हमेशा बेटी समान समझा लेकिन रिया ने कभी सुमन जी को वो मान ना दिया उसके लिये तो सास ससुर और ससुराल एक जेल की तरह थी।

रिया तो फिर भी दूसरे घर से आयी थी लेकिन दुःख तो तब हुआ जब बेटा भी अपनी पत्नी के प्रेम में आकंठ डूब गया। हर बात में उसकी तरफदारी कर माँ बाप को बुरा भला कह रिया के साथ दूसरे शहर में बस गया।

ऐसा बेटा जो शायद ही कभी हाल पूछने को फ़ोन करता हो जिसे एक दिन भी फ़िक्र ना हुई की कैसे है उसके बूढ़े माँ बाप, उस बेटे के अपने स्वार्थ में बुलाने पे सब कुछ भूल कैसे भोली सुमन भागी भागी चल दी थी। रमन जी अच्छे से समझ रहे थे, जतिन क्यों अचानक से बार बार फ़ोन कर कुशल पूछने लगा था?  लेकिन ये बात ममता में अंधी हो चुकी माँ को कैसे समझाते वो?

निश्चित समय पे सुमन जी निकल पड़ी बेटे के घर के लिये, ट्रेन में ठीक से बिठा जब रमन जी निकलने को हुए तो भावुक हो उठीं सुमन जी।

“आप भी साथ चलते तो कितना अच्छा होता।”

“मैं अभी से क्या करूँगा वहाँ आराम से आऊंगा तब साथ ही आ जाना मेरे।” डबडबाई आँखों से पति पत्नी ने एक दूसरे को विदा किया।

अगले दिन मुंबई ट्रेन सुबह ही पहुंच गई थी। दरवाजे के पास किसी तरह समान निकाल खड़ी हो गईं सुमन जी। ट्रेन रुकते ही जतिन दिख गया। अपने इकलौते लाडले को आज पूरे दो साल बाद देखा था सुमन जी ने।

माँ बेटा अपनी गाड़ी से घर पहुँचे दो कमरों का सुन्दर सजा धजा फ्लैट था बेटे का। सास को देख बहु रिया आयी और औपचारिकता दिखा कमरे में चली गई। रिया का ऐसा व्यवहार कोई नया तो था नहीं इसलिए सुमन जी मौन ही रह गईं। जतिन ने ही माँ को उनका कमरा और रसोई दिखा दी।

अगले दिन से सुमन जी की भाग दौड़ शुरु हो गई। सुबह जल्दी उठ जतिन की नाश्ता और डब्बा देती फिर घर के दूसरे काम करती साथ ही समय समय पे रिया का दूध फल और खाना भी बनाना होता। जतिन ने साफ कह दिया था रिया को डॉक्टर ने गर्म ताज़ा खाना ही खाने को बोला है। रिया तो ज्यादातर अपने कमरे में ही रहती, बस एक बाई थी जो दोपहर के समय आती और सिर्फ साफ सफाई कर चली जाती।

समय बीत रहा था उस छोटे से फ्लैट में सुमन जी को बहुत घुटन होती। रूचि बस काम से काम रखती और जतिन देर से ऑफिस से आता और रूचि के पास ही बैठता। सुमन जी को कानपुर का अपना खुला घर और बगीचा बहुत याद आता।

काम का बोझ बढ़ने से घुटनों की तकलीफ भी बढ़ गई थी। रात-रात भर घुटने दर्द करते खुद ही कभी तेल तो कभी गर्म पानी की सिकाई करतीं सुमन जी। रमन जी जब पूछते तो हॅंस कर टाल जातीं सुमन जी।

अपनी माँ की धीमी चाल और थका चेहरा जतिन देख कर भी अनदेखा कर देता। जल्दी ही रिया के डिलीवरी का समय पास आ गया और एक रात दर्द भी शुरू हो गया। कोई ख़ास दिक्कत नहीं थी, इसलिए नार्मल डिलीवरी से बच्चा हो गया। पोते की ख़बर सुन सुमन जी बहुत ख़ुश हुईं।

“जतिन बेटा मुझे भी मेरे पोते को देखना है, ले चल अस्पताल मुझे।”

“आप वहाँ क्या करेंगी जा कर? दो दिन बाद आ जायेंगे रिया और बेबी फिर मिल लेना”, जतिन के रूखे से ज़वाब को सुन सुमन जी चुप रह गईं।

जिस दिन रिया अस्पताल से आने वाली थीं, सुमन जी ने रिया के कमरे में पहली बार कदम रखा।  सारा कमरा अच्छे से साफ कर नई चादर डाल दी और अपने हाथों से सिले बच्चे के गद्दे बिछा दिये। रिया आयी तो पोते और बहु की नज़र उतार सुमन जी जतिन को कहा, “बेटा इन्हें कमरे में ले कर चल, मैं बहु के लिये दूध और लड्डू ले कर आती हूँ।”

जल्दी से दूध गर्म कर प्लेट में दो लड्डू रख सुमन जी कमरे की ओर बढ़ीं कि कदम वहीं दरवाजे पे रुक गए।

“ये क्या थर्ड क्लास के गद्दे बिछा रखे हैं तुम्हारी माँ ने जतिन? बेबी को रैशेस आ जायेंगे। हटाओ इसी वक़्त इसे और बेबी का नया सेट जो मैंने मंगवाया था वो बिछा दो।”

“लेकिन रिया माँ ने इतने प्यार से अपने हाथों से बनाया है उन्हें बुरा लगेगा।”

“और बेबी को रैशेस हो गए तब? तुम्हें अपने बच्चे की ज़रा भी परवाह नहीं जतिन?”

रिया की डांट खा जतिन ने फटाफट गद्दे बदल दिये। दरवाजे पे खड़ी सुमन जी अपने बेटे बहु को व्यवहार देख बहुत दुखी हो गई लेकिन बिना कुछ जताये कमरे में ट्रे रख वापस आ गई।

रिया बच्चे को बिलकुल सुमन जी के पास नहीं जाने देती उसके अनुसार सुमन जी के शरीर से घर के कामों के बाद पसीने की दुर्गन्ध आती जो की बच्चे के लिये बिलकुल सही नहीं थी।

बस दूर से ही निहार लेती सुमन जी अपने पोते को और जतिन, वो भी मूक दर्शक बना रहता।

एक दिन दोपहर पे दरवाजे की घंटी बजी सुमन जी ने दरवाजा खोला तो आधुनिक परिधान में सजी एक लड़की खड़ी थी, “किनसे मिलना है आपको?”

सुमन जी के पूछने पे अजीब सी शकल बना वो लड़की अंदर घुस गई। तभी सामने से रूचि भी आ गई।

“अरे स्नेहा तुम कनाडा से वापस कब आयी बताया भी नहीं?”

“मेरी छोड़ तू मुझे पहले ये बता रूचि की आखिर लगा ही ली तूने फुल टाइम मेड? चलो जान छुटी तुम्हारी तुम्हारे सास के आने से। मैंने तो पहले ही कहा था फुल टाइम मेड लगा ले लेकिन तुझे ही पैसे दिख रहे थे अब मुंबई है तो पैसे तो खर्च करने ही पड़ेंगे। अच्छा ये बता कितने में रखा है इन्हें? और काम तो ठीक करती है ना?”

स्नेहा अपने रो में बोलती जा रही थी और रूचि का चेहरा सफ़ेद पड़ चुका था। सुमन जी के सामने सारी सच्चाई आ चुकी थी। फुल टाइम मेड के पैसे और नखरों से बचने के लिये उन्हें यहाँ बुलाया गया था। अब समझ आ रहा था जतिन का बार बार फ़ोन करना और माँ का मनुहार करना। धक् सा सुमन जी का कलेजा रह गया।

रूचि हाथ पकड़ स्नेहा को कमरे में ले गई और सुमन जी कटे वृक्ष समान बिस्तर पे गिर पड़ीं। वो समझ चुकी थीं कि उनकी जरुरत इस घर में किसी को नहीं थी। कितनी पागल तो वो जो इतना तिरस्कार सह कर भी बेटे बहु के मोह में फंसी रही थी। शाम तक सुमन जी खुद को संभाल चुकी थीं।

अपने आत्मसम्मान को ममता के आड़ में बहुत छिपा लिया था सुमन जी ने लेकिन आज की घटना ने उनके आत्मसम्मान को झकझोर दिया था। अब एक पल भी वो अपने सम्मान से समझौता कर इस घर में नहीं रह सकती थीं। रात को जतिन आया घर में सन्नाटा देख वो रूचि के पास गया।

“माँ…!” दरवाजे से जतिन ने आवाज़ लगाई, लेकिन आज सुमन जी वो पहले वाली माँ नहीं रह गई थी जो बेटे की एक आवाज़ पे दौड़ी चल देती अपने स्वार्थी बेटे बहु से उनका मोह भंग हो चुका था।

“जतिन, कल सुबह सबसे पहली ट्रेन की टिकट मेरे लिये  कटवा दो। अगर ट्रेन में सीट ना मिले तो हवाई जहाज की कटवा दो और हां चिंता मत करना इस टिकट के पैसे मेरे पति तुम्हारे अकॉउंट में डाल देंगे। अब जाते हुए दरवाजा बंद कर के जाना।”

आज माँ के आगे कुछ ना बोल पाया जतिन। चुपचाप कमरे से निकल गया।

अगले दिन शाम को कानपुर में सुमन जी को यूँ  अचानक आया देख रमन जी एक बार तो चौंक से गए लेकिन अपनी पत्नी के दुर्बल हो चुकी  काया और उदास आँखों से सब समझ गए। आँखों ही आँखों में रमन जी ने अपनी पत्नी के दिल के दर्द को जान लिया था। टूटे क़दमों से दोनों पति पत्नी चल पड़े अपने आशियाने की ओर।

मूल चित्र : Still From Short Film Lost & Hound, Pocket Films/YouTube 

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