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काश! आप मुझे माफ़ कर पाते…

राधा भी अपने पति की परछाई थी, जिसने कभी अपने और देवरानी के बच्चों में कोई फ़र्क नहीं किया। खुद के पति के कमाई पे कभी अधिकार नहीं जताया। 

राधा भी अपने पति की परछाई थी, जिसने कभी अपने और देवरानी के बच्चों में कोई फ़र्क नहीं किया। खुद के पति के कमाई पे कभी अधिकार नहीं जताया। 

कहते हैं आप जैसा बोते हो वही काटते हो। स्वर्ग नर्क सब यहीं है। आपके कर्म ही आपको स्वर्ग और नर्क सब दिखाते हैं।

अपने अस्सी साल के बुजुर्ग भाई-भाभी के पैरों पे गिर उदय रो रहा था। ऐसा करुण रूंदन कि जो देखे वो पिघल जाये। तो वो भाई कैसे नहीं पिघलता जिसने भाई नहीं अपनी संतान समझ पाला था उदय को? आज भी कमल जी ने अपने पर हुए विश्वासघात को भूल अपने भाई को गले लगाया और माफ़ कर दिया।

कमल अपने पिता की पहली संतान थे और उसके बाद  दो भाई, तीन बहनों के बाद उदय का जन्म हुआ था। एक साधारण किसान का परिवार। सब गाँव में रहते और जो जैसा मिलता संतुष्टि और प्रेम से स्वीकार करते।

कमल परिवार के बड़े लड़के थे तो जिम्मेदारी भी जल्दी आ गई। मात्र सत्रह साल की उम्र में किसी रिश्तेदार ने बनारस में नौकरी लगवा दी। बड़े से होटल में एक छोटी सी नौकरी खूब लगन और मेहनत से अपने मालिक के विश्वास पात्र बन गए। नौकरी लगते ही शादी भी कर दी गई कमल की उसके बाऊजी ने।

कमल का स्वभाव से दूरदर्शी था जानता था भविष्य सुन्दर बनाना है तो कुछ कर के परिवार को बढ़ाना होगा जिसके लिये भाइयों को भी यहाँ लाना पड़ेगा जिससे वो भी पढ़ लिख कर आगे बढ़े। शहर से बाहर एक छोटा टुकड़ा जमीन का मिल रहा था। सेठ जी की आर्थिक मदद से वो जमीन ले लिया विजय ने और किसी तरह दो कमरे खड़े कर दिए।

तब तक कमल भी एक बेटे का बाप बन चुका था और दूसरे भाई की भी शादी हो गई थी। सब को ले कर वह शहर आ गया।

अब कमल, उसकी पत्नी राधा, बेटा अशोक और दोनों छोटे भाई अमित और उदय भी आ गए। राधा भी अपने पति की परछाई थी, एक संबल जिसने कभी अपने और देवरानी के बच्चों में कोई फ़र्क नहीं किया। खुद के पति के कमाई पे कभी अधिकार नहीं जताया।

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रात दिन कमल मेहनत करता छोटे भाई अमित को भी नौकरी लगवा दी।

कमल की मेहनत रंग लायी। दिन बदलने लगे और परिवार बड़ा होता गया। सारे बच्चे राधा को बड़ी माँ कहते और उन सब को राधा अपने आँचल में समेटे रखती। जीवन के दोनों मोर्चों पे दोनों पति पत्नी एक वीर सिपाही की तरह खड़े थे। घर के बाहर कमल तो घर पे राधा ने  मजबूती से परिवार को संभाले रखा था।

दो साड़ियों में साल निकाल लेती राधा, लेकिन देवरानी को दिलाये बिना खुद साड़ी नहीं लेती। फ़र्क करना तो जैसे सीखा ही नहीं था ना कमल ने और ना राधा ने।

बहनो की शादी भी हो गई और भाइयों की भी। इतने सालों में अपने बच्चों और अपनी पत्नी के हक़ का भी अपने भाइयों के परिवार को दिया बिना चेहरे पे शिकन  लाये।

समय बीता पढ़ लिख कर उदय की अच्छी नौकरी लग गई और पत्नी रजनी भी ऊंचे घर की आ गई। राधा जी को बड़ा परिवार चलना होता था। कमाई भी सिमित थी तो थोड़ी कंजूसी से चलती लेकिन ये बात रजनी को पसंद नहीं आती। उसे लगता जब उदय की अच्छी कमाई है, तो क्यूँ वो अपनी जेठानी के अनुसार चले?

अपने दहेज के सामान का बहुत रोब रखती थी वह। उसके दहेज़ के पलंग या सोफे पे कोई बच्चा बैठ जाये तो नाराज़ हो जाती। घर में कलेश दिन-ब-दिन बढ़ता ही जा रहा था। रोज़ कोई नया बखेड़ा शुरू कर रजनी उदय से लड़ती।

मकसद साफ था, रजनी को अलग रहना था। रोज़-रोज़ रजनी की बातें सुन उदय को भी लगने लगा जब वो अच्छा कमा रहा है तो क्यों ना सारे सुख सुविधा के साथ रहे जो कि संयुक्त परिवार में संभव ना था। धीरे-धीरे उदय का भी अलग होने का मन हो आया।

रोज़ के कलह से तंग आ और घर की शांती के लिये अपने सीने पे पत्थर रख उदय और रजनी को अलग कर दिया। कमल ने जिस घर को खून पसीने से सींचा था उसमे दरार आ गई थी। उदय और रजनी को तो मन की मुराद मिल गई। घर से निकल एक बार भी उदय अपने भाई का हाल ना पूछा ना कभी मिलने की कोशिश की। अपनी नौकरी और पैसों के घमंड में अंधा हो चुका था उदय।

समय अपनी गति से चलता गया और इसके साथ ही परिवार भी बढ़ता चला गया। उदय और रश्मि भी इस बीच तीन बच्चों के माँ-बाप बन चुके थे – दो बेटा और एक बेटी।

कमल के बच्चे भी पढ़ लिख कर अच्छी नौकरी पा गए। कमल के बेटे-बहूअपने देवता तुल्य माता पिता की सेवा जी जान से करते। वहीं दूसरी ओर उदय था जिसने अपने भाई के साथ छल किया।  उसके निश्चल प्रेम का कोई मोल ना चुकाया था। तो अब कर्म मानिये, उसके साथ भी तो छल होना ही था।

बेटों की शादी हुई। दोनों बहुएँ बड़े घर से थीं, सो उनके नखरे भी बड़े थे। सास-ससुर की उनकी नजरों में कोई मोल ना था। बेटे भी अपनी पत्नियों के कहे में थे। खून रंग दिखा रहा था, जिस प्रकार उदय अपनी पत्नी के कहे में रहा वैसे ही उसके बेटे भी थे।

रजनी की तबीयत भी अब गिरी-गिरी रहने लगी थी। इलाज कराने से पता चला कि किडनी की बीमारी है डायलिसिस करवानी पड़ेगी। उधर रजनी ने बिस्तर पकड़ा और इधर बहुओं ने मुंह मोड़ लिया। बूढ़ी सास की सेवा करना उनके बस की बात नहीं थी।

बुढ़ापे में हुए दमे के रोग ने उदय को जकड़ रखा था इस अवस्था में भी उदय ही रजनी की सेवा करता। दोनों पति-पत्नी बहुत ही कष्ट में जीवन बिता रहे थे। ऐसे में अपने सारे पुराने कर्म उन्हें याद आने लगे कि उन्होंने कितना दिल दुखाया था अपने पिता तुल्य बड़े भाई का जिसने अपने बच्चों का हक़ मार उदय को पढ़ाया-लिखाया, उसने अपनी बीवी की सुविधा के लिये उनका तिरस्कार किया। एक बार जो घर छोड़ा कभी मुड़ के उनका हाल जानने की कोशिश भी ना की।

उदय ओर रजनी रोज़ पछतावे में रोते कि काश जो अपने अतीत में जा उन गलतियों को होने से रोक पाते तो शायद आज ये दिन देखने को ना मिलता उन्हें।

शायद ईश्वर ही उनके कर्मों की सजा उन्हें दे रहा था। किसी दूसरे रिश्तेदार से कमल को उदय और रजनी के  हालत के बारे में पता चला। अपने छोटे भाई की स्थिति का ज्ञान होने पर कमल और राधा अपने आप को रोक ना पाए और तुरंत रजनी और उदय को देखने निकल पड़े।

उदय के बनवाये एक बड़े से बंगले के सर्वेंट क्वार्टर में रजनी और उदय पड़े थे चारों ओर गंदगी का आलम था। एक कोने में एक चूल्हा था उसी पर बनाने खाने के लिए कुछ बर्तन पड़े थे। अपने भाई को ऐसी अवस्था में देख आँखों से झड़ झड़ आंसू निकल पड़े और कमल ने तत्काल निर्णय ले लिया  की एक पल भी उन दोनों को यहाँ नहीं रहने देंगे।

उदय और रजनी का सिर शर्म से झुक गया था, “हमें  माफ कर दीजिए भाभी-भैया। मेरे कारण आपका बहुत दिल दुखा। हम इस लायक नहीं कि आपकी छाया में वापस आ सकें।” रोते हुए उन्होंने कहा।

“तुम दोनों मेरे बच्चों के समान हो तो क्या एक पिता अपने बच्चों को इस स्थिति में देख सकता है? मैं तुम्हें किसी कीमत पर यहाँ नहीं छोड़ सकता।” कमल और राधा ने बिना वक्त गवाँए उदय और रजनी को अपने घर ले आ गए।

उचित खानपान और देखभाल से उदय की तो स्थिति संभल गई, लेकिन रजनी की स्थिति दिन-ब-दिन बिगड़ती चली जा रही थी। देखते ही देखते छह महीने के अंदर ही रजनी यह दुनिया छोड़कर चली गई।

रजनी और उदय को जिस धन दौलत का मोह था जिस धन दौलत का गुमान था आज वह धरा का धरा रह गया था और जीवन में जिन रिश्तों का कोई मोल नहीं किया उन्होंने ही अंत समय में उनकी सेवा की। अपने कर्मों का फल भोग कर रजनी इस दुनिया से विदा हो गई इस अफ़सोस के साथ कि काश एक मौका मिलता तो अपने अतीत में जा अपनी भविष्य को सुधार लेती।

प्रिय पाठक, कहानी का सार यही है की धन दौलत के मोह में रिश्तों की अवहेलना ना हो, रिश्ते वो अनमोल खजाना है जो कभी ख़त्म नहीं होता।

कहानी कैसी लगी जरूर बतायें, किसी भी त्रुटि के लिये माफ़ी चाहूंगी आपके कमेंट का इंतजार रहेगा।

मूल चित्र : Still from short film Meeraas/Six Sigma Films, YouTube

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