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तुम दरवाजा कभी मत खोलना

मीनाक्षी ने सखी को परेशान देख अधीर होते हुए पूछा कि, “सच सच बता सुगंधा, क्या हुआ है? तू इतनी परेशान क्यों है?”

मीनाक्षी ने सखी को परेशान देख अधीर होते हुए पूछा कि, “सच सच बता सुगंधा, क्या हुआ है? तू इतनी परेशान क्यों है?”

सुबह से सुगंधा थोड़ा परेशान थी। उसके मन में काफी उथल पुथल मची हुई थी। फिर भी वह शांत रहने की कोशिश कर रही थी। सुबह सबको जल्दबाजी होती है, इसलिए पति और बच्चों ने उसके मौन की तरफ ज्यादा ध्यान नहीं दिया।

घर का सब काम खत्म करके वह नहाधोकर पूजा करने गई तो भगवान की मूर्ति के सामने उसके आँख डबडबा गए। उसी समय कॉलबेल बजी। उसने सोचा, “कौन हो सकता है इस वक्त?” अपने आप को संयमित कर वह दरवाजा खोलने को लपकी।

वहाँ पर उसकी हम उम्र सखी मीनाक्षी खड़ी थी। उसने सखी को अंदर बैठाया। उसे देखते ही मीनाक्षी बोली, “तू अभी रो रही थी। क्या हुआ? पति से झगड़ा हुआ या बच्चों ने दिल दुखाया है?”

सुगंधा आँसुओं को छिपाते हुए बोली, “नहीं नहीं, ऐसा कुछ भी नहीं हुआ है।”

मीनाक्षी उसकी पक्की सखी थी। हर दुख सुख में साथ देती और उसकी सलाह भी सुगंधा के बहुत काम आती थी। सखी को परेशान देख वह अधीर होते हुए पूछी, “सच सच बता, क्या हुआ है? तू इतनी परेशान क्यों है?”

सुगंधा बोली, “आज सुबह से ही बीती बातें याद आ रही हैं। लोगों ने मेरा बहुत दिल दुखाया है। उन बातों को याद कर आँखों में अभी भी आँसू भर जाते हैं। मुझे लगता है कि अगर ऐसे लोग मेरी जिंदगी में नहीं होते तो मैं भी खुलकर जी पाती। मेरी जिंदगी के कई साल उन लोगों ने मुझसे छीन लिए। उन लोगों के कारण कई सालों तक मैं घुट घुट कर जी हूँ और आज भी उन दुखों को याद कर मैं बहुत परेशान हो जाती हूँ।”

मीनाक्षी ने सुगंधा को समझाते हुए कहा, “अब बीती बातों को याद करने से क्या फायदा? जो बीत गई वो बात गई। अब वे तुम्हारा कुछ नहीं बिगाड़ रहे हैं न। तब उन बातों को याद कर तुम अपना वर्तमान क्यों खराब कर रही हो? सबको ऐसे नकारात्मक विचार वाले लोगों का सामना करना पड़ता है। नकारात्मक परिवेश या नकारात्मक लोगों से निपटने में ही भलाई है। समझदारी भी इसी में है कि अब उन्हें भूलें, जिन्होंने दुख दिया।”

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वह बोलती जा रही थी, “रास्ते पर चलते हुए कितने सारे गड्ढे मिलते हैं, उन गड्ढों से बचकर ही हम आगे बढ़ते रहते हैं। इसी तरह बीती दुखद बातों से निकल कर खुश रह सकते है।”

सुगंधा बोली, “मैं ये सब समझती हूँ। सबको समझाती भी रहती हूँ। पर स्वयं कभी कभी नकारात्मक सोचने लगती हूँ। बहुत परेशान हो जाती हूँ। पति और बच्चे उस समय मुझे बहुत समझाते हैं। आजकल फिर भी ऐसा हो रहा है।”

मीनाक्षी ने कहा, “सखी, मुझे लगता है कि तुम्हें डौक्टर से मिलना चाहिए। मेनोपॉज का समय ज्यों ज्यों नजदीक आता है, औरतों में मूड स्विंग बहुत ज्यादा होता है। बहुत सारे हारमोनल परिवर्तन इस समय शरीर में होते हैं। इससे स्वास्थ्य प्रभावित होता है। पौष्टिक खाना खाओ, थोड़ा व्यायाम करो और मनपसंद कामों में मन लगाओ। पति और बच्चे तो तुम्हारा हर कदम पर साथ देते ही हैं। यह तुम्हारी सबसे बड़ी ताकत है। अब देर मत करो। एक बार डौक्टर से मिल लो।”

सुगंधा को सखी की बात सटीक लगी। मेनोपॉज औरत की जिंदगी का टर्निंग प्वाइंट होता है। औरत स्वयं में आ रहे परिवर्तन को समझ नहीं पाती है और परेशान हो जाती है। ये परेशानी शारीरिक और मानसिक दोनों होती है। इस कठिन दौर में अपनों का साथ बहुत जरूरी है जो उसके मन की हर उथल पुथल को समझ सके और उसके साथ अच्छा व्यवहार करे। फिर भी डौक्टर की सलाह बहुत मायने रखती है।

उसने सखी को धन्यवाद दिया और पति से इस बारे में बात कर डौक्टर से मिलने का मन बना लिया।

शाम में पति से वह सारी बात बतायी तो वह तुरंत राजी हो गए। वे बोले, “तुम इस घर की आधार स्तंभ हो। तुम्हारी खुशी में ही हम सब की खुशी है। तुम्हें अपने स्वास्थ्य पर पूरा ध्यान देना है और हम सब तो तुम्हारे साथ हैं ही।”

उसकी आँखों में खुशियों के आँसू आ गए। उसे प्यार से थपथपाते हुए पति बोले, “सुनो जानेमन, जब भी पुरानी दुखद बातें तुम्हारा दरवाजा खटखटाए न, तुम दरवाजा कभी मत खोलना। सिर्फ खुशियों को गले लगाओ और दोगुने उत्साह से जिंदगी का आनंद लो। हम इस दुनिया में खुशियों से अपना दामन भरने के लिए आए हैं, न कि रो रो कर जीने के लिए।”

सुगंधा बहुत खुश हुई। अब उसे मानसिक शांति भी मिल रही थी। वह सब को धन्यवाद कह रही थी। यह उसकी खुशकिस्मती थी कि एक प्यारी सखी और एक प्यारा परिवार उसे सही राह दिखाता है। अब उसे स्वयं पर ध्यान देकर जिंदगी को और सुंदर बनाना है।

मूल चित्र: BLUSH via YouTube 

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