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क्यों बुआजी?

आज मीनू तमतमा गई और उसने पूछा, “क्यों बुआजी?” बुआजी भौंचक हो गई। उनकी बोलती बंद थी और मीनू बोलने के मूड में थी।

आज मीनू तमतमा गई और उसने पूछा, “क्यों बुआजी?” बुआजी भौंचक हो गई। उनकी बोलती बंद थी और मीनू बोलने के मूड में थी।

मीनू परेशान थी। मन में बहुत सारी बातें एक साथ चल रही थीं और घर के सारे काम भी निपटा रही थी। कोरोनाकाल में परेशानियां कम होने का नाम ही नहीं ले रही थी। बैंक में कार्यरत पति रोहन में जैसे ही कोरोना के लक्षण दिखे वह घबड़ा गई। पर घबड़ाने से कुछ नहीं होगा, यह सोच वह कमर कस कर तैयार हो गई कठिन परिस्थिति से लड़ने के लिए।

रोहन की कोरोना रिपोर्ट पॉजिटिव आयी। पर उसे होम आइसोलेशन में ही रहने और डॉक्टर के दिए दवाओं व दिशानिर्देशों का पालन करने की सख्त हिदायत दी गई थी। मीनू को थोड़ी राहत मिली। वह सारे निर्देशों का पालन करते हुए पति की सेवा कर रही थी।

दोनों बच्चे टीन एजर थे और उन्हें भी कोरोना की पूरी जानकारी थी। इसलिए वे भी मम्मी का पूरा साथ देते। सास ससुर भी पहले की अपेक्षा बहुत शांत हो गए थे। शायद अंदर से वे रोहन के स्वास्थ्य को लेकर चिंतित थे। उपर से देखने में सबकुछ सामान्य लगता था। पर सब अंदर ही अंदर डरे हुए थे।

रिश्तेदार व दोस्त फोन पर कहते सकारात्मक रहो। सब ठीक हो जाएगा। वह भी कठिन परिस्थितियों को संभालते हुए सकारात्मक रहने की पूरी कोशिश करती। पर वह सकारात्मक रह नहीं पाती। क्योंकि रोहन की बुआ जी वक्त बेवक्त उसे ताने मारती रहती। वह उन्हें जवाब नहीं दे पाती। पर उसकी आँखों में आँसू भर जाते। वह मानसिक रूप से कमजोर पड़ने लगी थी।

कुछ महिनों पहले बुआ जी मेडिकल ट्रीटमेंट के लिए उनके पास आयी थीं। रोहन और मीनू के दिनरात की सेवा से वह ठीक हो गई थीं। अब उन्हें अपने गाँव वापस जाना था। पर कोरोना के बढ़ते कहर और लॉकडाउन की वजह से नहीं जा पायीं। बीमारी में भी वह मीनू के कामों में मीनमेख निकालने से बाज नहीं आतीं। अब तो वह पहले की अपेक्षा बहुत स्वस्थ थीं। अब तो हाथ धोकर मीनू के पीछे पड़ी रहतीं।

फोन पर भी रिश्तेदारों से मीनू की शिकायत करती। मीनू सब जानती थी। फिर भी चुप रहती। क्योंकि वह जवाब देकर उनकी बेज्जती करना नहीं चाहती थी।

आजकल बुआजी किचन में उसकी मदद करने के बहाने आतीं और मदद तो नहीं करतीं। पर मीनू को तनाव जरूर दे देतीं। एक बार फिर बुआ जी ने कहना शुरू किया, “रोहन की शादी कानपुर वाली लड़की से होती तो अच्छा होता।”

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आज मीनू तमतमा गई और उसने पूछा, “क्यों बुआजी?”

मीनू ने कभी पलटवार नहीं किया था। इसलिए बुआजी भौंचक हो गई। उनकी बोलती बंद थी और मीनू बोलने के मूड में थी।

मीनू ने कहा, “जब से मैं ब्याह कर इस घर में आयी हूँ। पहले दिन से ही आप यही बात बोल रहीं हैं। इस लड़की से रोहन की शादी होती तो अच्छा होता, उस लड़की की रोहन से शादी होती तो अच्छा होता। क्या मैं अच्छी नहीं हूँ? आपको तो मालूम ही है कि मैं सासूमां की पसंद हूँ और अब रोहन की भी दिल की रानी हूँ। इस घर में मुझे सबने प्यार और सम्मान दिया। सिर्फ आपको ही मैं अच्छी नहीं लगती। क्यों बुआजी ?”

मीनू के इस रुप की बुआजी ने कभी कल्पना भी नहीं की थीं। वह उस को सिर्फ देखती जा रही थीं। मीनू तो आज बुआ जी से पिछले सारे दर्दों का हिसाब चंद शब्दों में ही कर ली थी। जब घर में सास ससुर भी उसकी पढ़ाई की, उसके गृहकार्य की तारीफ़ करते तब बुआजी उसमें सिर्फ मीनमेख निकाल कर उसे नीचा दिखाने में लगी रहतीं। मीनू हर तरह से उनका दिल जीतने की कोशिश की। पर सब बेकार।

बुआजी को जब कुछ नहीं सूझता तो कहने लगतीं, “रोहन की शादी कानपुर में होती तो ज्यादा अच्छा होता।”

एक बार कानपुर वाली मिसेज शर्मा एक पार्टी में मिलीं। उन्हीं की बेटी से रोहन की शादी होने वाली थी। पर किसी कारणवश उस लड़की से रोहन की शादी नहीं हो पायी। रोहन की माँ ने उनकी बेटी की जगह मीनू को रोहन के लिए चुन लिया था।

मीनू भी अपनी सभी जिम्मेदारियाँ इतनी अच्छी तरह से निभाती कि सब लोग उसकी तारीफ ही करते रहते और रोहन की माँ अपनी पसंद की बहू पर इतरा जातीं। शायद बुआजी को उनकी खुशी से ईष्या होती थी। इसलिए वह मीनू को नीचा दिखाने की कसर नहीं छोड़ती।

उस दिन भी मिसेज शर्मा से मिलकर वह बार बार मीनू से कह रही थीं, “देखो, मिसेज शर्मा की ही बेटी से रोहन की शादी हो रही थी।”

मीनू ने उनकी बातों को अनसुना कर पति रोहन के साथ पार्टी का आनंद उठाया। बाद में उसने रोहन से बुआजी की हरकत बतायी तो रोहन ने उससे पूछा, “क्या कभी मैं ने तुम्हें ऐसा कुछ कहा, जिससे तुम्हारा दिल दुखे? क्या कभी मैं ने तुम्हें जानबूझकर आहत किया? नहीं न। क्योंकि मैं तुम्हें बहुत प्यार करता हूँ। तुम मेरे दिल पर राज करती हो, जानेमन। मेरे माँ पापा भी हमेशा तुम्हारे कामों से, तुम्हारे व्यवहार से खुश रहते हैं। तुम दूसरों की बातों पर ध्यान ही मत दो। जैसी हो, वैसी ही खुशमिजाज रहो।”

मीनू ने वही किया। पर जब सकारात्मक रहने की वह पूरी शिद्दत से कोशिश कर रही थी ताकि बीमार रोहन को और गृहस्थी को अच्छी तरह संभाल सके। ऐसे समय में बुआजी उसे बार बार आहत करने की कोशिश कर रही थी।

मीनू का मनोबल टूट रहा था। वह बुआजी की बातें सुनकर अंदर ही अंदर घुटने लगी थी। तनाव में रहने लगी थी। इसलिए उसने बुआजी को जवाब देना ही उचित समझा।

उसे रोहन को भी संभालना था और स्वयं को भी। सकारात्मक रहने के लिए नकारात्मक बातों को जड़ से खत्म करने की जरुरत है।

मीनू चाय देने सास ससुर के कमरे की ओर बढ़ी तो उसे ससुर जी की आवाज सुनाई दी। वे बुआजी से कह रहे थे, “तुम मेरी बहन हो इसलिए तुम्हें इस घर में सम्मान मिलता है। आज किचन में मीनू बहू ने तुम्हें जो भी कहा, मैं ने सब सुना। मीनू को तुमने बहुत अपमानित किया है। तुम्हारी बातों से दुखी होकर भी वह तुम्हारी सेवा करती रही तुम्हें सम्मान देती रही। फिर भी तुम उसकी कीमत नहीं समझी। उसने ऐसा कौन सा कटु वाक्य तुम्हें कहा, जिससे तुम्हें दुख लगा। तुम उसकी बुराई करने मेरे पास आ गई? उसने जो कहा, बिलकुल सही कहा है। तुम अब भी सुधर जाओ। हमारी सुशील बहू की कद्र करना सीखो।”

ससुर जी में एक बार फिर से मीनू को पिता के स्नेह का अनुभव हुआ।

मूल चित्र: Still from Short Film Methi ke Laddoo

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