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और मैंने ससुराल वालों की गलत बातों का विरोध किया…

Posted: जनवरी 23, 2021

मेरे ससुराल वाले मुझे दहेज के लिए प्रताड़ित करते थे। पापा ने कितना कुछ उन्हें दहेज में दिया था। फिर भी उनकी डिमांड बढ़ती जा रही थी…

शाम की चाय पीने बैठी थी। पुरानी सहेली का फोन आया। करीब पंद्रह बरसों बाद उससे बात हो रही थी। उसकी चहकती आवाज कानों में मिठास घोल रही थी। मैंने उससे पूछा, “कहाँ हो? कैसी हो? बहुत अच्छा लग रहा है तुम्हारी आवाज़ सुनकर।”

वह बोली, “तुम्हारे ही शहर में आयी हूँ। पति ऑफिस के काम में व्यस्त रहेंगे और मैं तुम्हारे साथ खूब बातें करूँगी। चलेगा न।” आज बरसों बाद उसके मुँह से कॉलेज के दिनों की ‘चलेगा न’ वाली बेफ्रिक्री वाला डायलॉग सुनकर बहुत खुशी हुई। मैंने तुरंत हामी भर दी।

दूसरे दिन उसके खिले व्यक्तित्व को देख मैं अचंभित भी थी और खुश भी। मैं झट उससे पूछ ही ली, “वाउ, क्या लग रही हो। बहुत सुंदर। बिलकुल कॉलेज वाली अनु।”

उसने कहा, “मेरी रीमा, तुम भी तो कम नहीं। तुम्हारी इस खूबसूरती का राज मुझे पता है, जीजू का प्यार। क्यों ठीक कही न?”

मैं उससे बात करने के लिए उतावली हो रही थी। इसलिए बोली, “मुझे छोड़, पहले ये बता कि गुलामी की जंजीर से निकल कर तुमने अपने व्यक्तित्व को कैसे निखारा?”

वह गंभीर होती हुई बोली, “तुम तो जानती हो कि मेरे ससुराल वाले मुझे दहेज के लिए कितना प्रताड़ित करते थे। पापा ने कितना कुछ उन्हें दहेज में दिया था। फिर भी उनकी डिमांड रोज़ बढ़ती जा रही थी और मेरे पापा उसे पूरा कर-कर के थक गए थे। जब सामान आना बंद हो गया तब वे लोग मुझे मानसिक और शारीरिक रुप से प्रताड़ित करने लगे।”

अपने आँसूओं को पोंछ वह कहने लगी, “पति को ये सब कुछ नहीं मालूम था। क्योंकि वो दूसरे शहर में नौकरी करते थे। अपने परिवार के प्यार में वो मेरी दुर्दशा देख भी नहीं पाते।”

मैं बोली, “ये बहुत खराब स्थिति होती है। लड़का शादी तो कर लेता है। पर ज़िम्मेदारी निभाना नहीं जानता। जिससे शादी की, उसके जख्म भी उसे नहीं दिखते।”

वह बोली, “मेरे पति बहुत सीधे थे। इसलिए परिवार वालों के ओछेपन का उन्हें अंदाज़ा भी नहीं हो रहा था। फोन पर पहले ही आने की सूचना दे देते थे तो घर में सब सचेत हो जाते। उनके सामने सब अच्छे बनते और उनके जाते ही मेरे साथ गाली गलौज शुरू कर देते। मैं दिनभर खटती रहती। फिर भी कामों में टोका-टाकी कर करके फिर से काम करवाते। पूरा खाना बनाकर थक जाती। थोड़ा आराम करने जाती तब वे लोग पूरा खाना खा कर खत्म कर देते। मेरे लिए खाना नहीं रहता। कभी कुछ बचा रहता तो मैं खाती। कभी बासी खाना खाती तो कभी भूखे रह जाती।”

उसकी बातें सुनकर मेरी आँखों में भी आँसू आ गए। वह बोली, “मानसिक और शारीरिक दोनों तरफ से मैं परेशान रहने लगी थी। इससे धीरे-धीरे मेरा शरीर कमजोर होने लगा और मैं बीमार भी रहने लगी।

एक बार पति अचानक घर आए और मुझे बुखार में काम करते हुए देखकर बोले, “घर में सब लोग हैं। फिर भी तुम बीमारी में भी काम कर रही हो। जबकि ऐसे समय में तुम्हें आराम की जरूरत है।”

वो हाथ पकड़ कर मुझे रसोईघर से ले गए और बिस्तर पर आराम करने को कहा। फिर अपने घर वालों पर बुरी तरह भड़के। मुझे डॉक्टर के पास भी ले गए। धीरे-धीरे मेरी स्थिति में सुधार होने लगा। इसके बाद मैं भी अपने दुख दर्द उनके साथ बाँटने लगी क्योंकि अब मुझे लगने लगा था कि वो मेरी स्थिति को समझने लगे हैं। वो मेरे दु:ख सुख में साथ देने लगे। मुझे उन पर भरोसा होने लगा था कि वो मेरा हित चाहते हैं।” ये कहते हुए वह मुस्कुराने लगी।

मैं बोली, “हाँ, पति पत्नी को भी एक दूसरे को समझने में थोड़ा वक्त लगता है।”

“अब मैं घर वालों की सारी हरकतें पति को बताती और वह बहुत ध्यान से मेरी बातें सुनते थे। गलत व्यवहार करने पर घरवालों को डाँटते भी थे। उनके डाँट के डर से ससुराल वाले मुझसे दुर्व्यवहार करने से डरने लगे थे। मैं आज भी वहीं रहती हूँ और पूरे परिवार का ख्याल रखती हूँ। पर स्वयं को कमजोर नहीं पड़ने देती। क्योंकि मुझे समझ में आ गया है कि अगर तुम खुद गलत बातों का विरोध नहीं करोगी तो लोग तुम्हें सताते ही रहेंगे।

पति सिर्फ हफ्ते में दो दिनों के लिए हमारे पास आते हैं और हमेशा मेरी हौसला अफजाई करते रहते हैं। अब घर के सब लोग घरेलु कामों में मेरी मदद करते हैं। मैं वहीं रहकर बी एड भी की और एक स्कूल में टीचर हूँ।” ये कहते हुए उसके चेहरे पर आत्मविश्वास साफ झलक रहा था।

मैं उसके संघर्ष की कहानी सुनकर भावुक हो गई थी। पर उसकी सफलता से बहुत खुश हुई। मैं बोली, “पति का साथ तो पत्नी के लिए बहुत जरूरी है। पर जिस तरह तुमने हिम्मत करके परेशानियों का सामना किया और स्वयं को फिर से संभाला, वह काबिले तारीफ है। बहुत सी औरतें यहीं हार जाती हैं। माता-पिता कितने अरमान से पाल पोसकर अपनी बेटी की शादी करते हैं और ससुराल वाले उसकी हालत दहेज के लालच में नौकरानी से भी बदतर कर देते हैं। कैसे निर्दयी होते हैं वे लोग? लानत है ऐसे लोगों पर जो पैसे के लालच में एक लड़की की जिंदगी का महत्व नहीं समझते।”

वह मेरी बातों से सहमति जताते हुए बोली, “हाँ, दुनिया में हर तरह के लोग हैं। पर हमें भी उनसे निपटना आना चाहिए। स्वयं को कमजोर न पड़ने दो। कमजोर को सब परेशान करते हैं। परिस्थितियों से लड़ना भी आना चाहिए। ये जिंदगी भी एक ही बार मिली है और हर व्यक्ति इस संसार में किसी न किसी उद्धेश्य से ही आया है। इसलिए इस जिंदगी का अच्छे कामों में उपयोग क्यों न किया जाय? रोकर क्यों गंवाया जाय?”

अनु और रीमा की बातों से वातावरण में महिला सशक्तिकरण की खुशबू फैल रही थी।

मूल चित्र : Photo by Krishna Studio from Pexels

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