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वैवाहिक बलात्कार तलाक का दावा करने का एक ठोस आधार है…

पुरुषों को समझना होगा की शादी अपनी यौन इक्छाओं को थोपने का या पत्नी के साथ ज़बरदस्ती करने का लाइसेंस नहीं देती, ये वैवाहिक बलात्कार है।

पुरुषों को समझना होगा की शादी अपनी यौन इक्छाओं को थोपने का या पत्नी के साथ ज़बरदस्ती करने का लाइसेंस नहीं देती, ये वैवाहिक बलात्कार है।

लाइव लॉ (livelaw.in) पर 06 अगस्त 2021 को प्रकाशित हुए एक लेख के अनुसार केरला हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा कि मैरिटल रेप तलाक के लिए एक ठोस आधार है।

हालांकि भारत में वैवाहिक बलात्कार दंडनीय नहीं है पर पति द्वारा फ़ैमिली कोर्ट के फैसले को चुनौती देने वाली दोनों अपीलों को हाई कोर्ट ने ख़ारिज कर दिया।

न्यायमूर्ति ए. मोहम्मद मुस्ताक और न्यायमूर्ति कौसर एड्प्पागथ की खंडपीठ ने महिला की स्थिति पर सहानुभूति दिखाते हुए कहा कि “पति द्वारा पत्नी की स्वायत्ता की अवहेलना करने वाला अनैतिक व्यवहार वैवाहिक बलात्कार है, हालांकि इस तरह के व्यवहार को दंडित नहीं किया जा सकता पर यह मानसिक और शारीरक क्रूरता की श्रेणी में आता है।”

मामले के तथ्यों पर गौर करने के बाद, कोर्ट ने कहा, “एक पति की धन और यौनसुख की अतृप्त इच्छा ने महिला को तनाव में डाल दिया है। तलाक पाने के तनाव में उसने अपने सभी धन संबंधी दावों को त्याग दिया। तलाक की उसकी विनती न्याय के मंदिर में एक दशक (12 वर्ष) से ​​अधिक समय से लंबित है।”

क्या है वैवाहिक बलात्कार (vaivahik balatkaar in Hindi or marital rape)

विवाह के बाद पति द्वारा पत्नी के साथ उसकी मर्ज़ी के बिना ज़बरदस्ती शारीरक संबंध बनाना या उसे संबंध बनाने के लिए मजबूर करना वैवाहिक बलात्कार या मैरिटल रेप है।

सच तो यह है कि हमारे देश में वैवाहिक बलात्कार को बलात्कार माना ही नहीं जाता। हमेशा से इस पुरुष प्रधान समाज में यही धारणा रही है कि स्त्री केवल एक भोग की वस्तु है और विवाह के पश्चात उसे भोगा जाना ही उसकी नियति है।

इसी कारण बेटों की परवरिश ही कुछ ऐसी होती है कि वो शादी को सेक्स का वैध लाइसेंस मानते हैं। यही नहीं बहुत से पुरुष पत्नी को रात में बिस्तर पर केवल वेश्या की तरह देखते हैं और उससे वैसा ही व्यवहार चाहते हैं।

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शादी के बाद कंसेंट (consent) शब्द पति के शब्दकोश से हो जाता है गायब

पुरुषों को हमेशा से यही लगता आया है कि शादी हो जाने के बाद स्त्री की मर्ज़ी का कोई मतलब नहीं होता। हालांकि सच यह भी है कि कंसेंट का अर्थ पुरुष को किसी भी उम्र या परिस्थिति में मुश्किल से ही समझ आता है।

युवा होते लड़के अक्सर लड़कियों को उनकी मर्ज़ी के बिना ज़बरदस्ती फोन या मैसेज करते रहते हैं या उनका पीछा करते हैं। लड़की के मना करने के बाद भी उन्हें “ना” शब्द समझ नहीं आता। इसी तरह शादी होने के बाद उन्हें पत्नी की मर्ज़ी या “ना” समझ नहीं आती।

उनके हिसाब से पत्नी शादी के बंधन में बंधी वो मजबूर औरत है जिसका कोई अस्तित्व नहीं है और वह हर हाल में अपने पति की मनमानी सहने के लिए मजबूर है।

अनगिनत महिलाएँ जूझ रही हैं मैरिटल रेप के अत्याचार से

वैवाहिक बलात्कार अब तक हमारे देश में दंडनीय नहीं है और समाज की धारणा असल में शादी के बाद पति द्वारा पत्नी पर किए गए अनैतिक व्यवहार को बलात्कार मानती ही नहीं। इसी कारण शर्म और डर के चलते अनगिनत महिलाएँ अपने वैवाहिक जीवन में इस अनैतिक व्यवहार को झेलकर भी चुप हैं।

कब आएगा विचारधारा में परिवर्तन          

जब भी कोई पत्नी अपने पति से उसके साथ ज़बरदस्ती शारीरक संबंध न बनाने की विनती करती है तो उसका पति ठहाके मारकर हँसता है और उसे बेवकूफ़ भी कहता है क्योंकि उस पुरुष की परवरिश ऐसे ही हुई है जहाँ उसने अपनी माँ को भी पिता के आगे झुकते देखा है।

स्त्री/पत्नी को भोग्या समझा जाने जैसी विचारधारा में आखिरकार कब परिवर्तन आएगा? शारीरक सम्बन्धों और यौन इक्छाओं के प्रति पत्नी का मान रखना भी आवश्यक है। पुरुषों को समझना होगा की शादी अपनी यौन इक्छाओं को थोपने का या पत्नी के साथ ज़बरदस्ती करने का लाइसेंस नहीं देती।

विवाह एक पवित्र बंधन है जो पति और पत्नी की आपसी सहमति और संतुष्टि पर ही टिका होता है। वैवाहिक सम्बन्धों को एक दूसरे पर ज़बरदस्ती थोपकर एक सुखद जीवन नहीं दिया जा सकता। पत्नी का शरीर कोई किला नहीं है जिसे उसका पति फतेह करना चाहता है। स्त्री अपने शरीर के प्रति हर निर्णय लेने के लिए पूरी तरह से स्वतंत्र है और पुरुष को उसका सम्मान करना सीख लेना चाहिए।  

मूल चित्र: Getty Images Pro via Canva Pro

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