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बस कीजिए, मैं आपका कूड़ेदान नहीं हूँ…

अनीता जी का फोन आया। मैंने उठाया नहीं। एक बार, दो बार, तीन बार लगातार घंटी बजती रही। सिर दर्द से फटा जा रहा था ऊपर से फोन।

अनीता जी का फोन आया। मैंने उठाया नहीं। एक बार, दो बार, तीन बार लगातार घंटी बजती रही। सिर दर्द से फटा जा रहा था ऊपर से फोन।

हमारा अभी-अभी तबादला हुआ था। नया शहर, नई सोसाइटी। दो- तीन दिन तो घर जमाने में ही लग गए। फिर एक दिन शाम को बच्चों को लेकर नीचे सोसाइटी के पार्क में गई, वहाँ पर कुछ महिलाओं से परिचय हुआ।

उनमें से एक अनीता जी से मेरा अधिकतर मिलना-जुलना होने लगा। अनीता जी के दोनों बच्चे मेरे बच्चों से बड़े थे पर आपस में खेल लेते थे।

वैसे तो सब अच्छा था पर अनीता जी की एक बात मुझे बहुत बुरी लगती थी, हमेशा किसी ना किसी की बुराई करती रहती थीं। कभी अपनी सास की, कभी ननद की, कभी जेठानी की, पति की, कभी किसी पड़ोसी की। ऐसा लगता था कि उन्हें हर किसी से बहुत सी शिकायतें हैं।

सबका अपना-अपना, अलग स्वभाव होता है। यह सोच कर मैं उनकी बातों को सुनती रहती थी वैसे भी मैं बचपन से ही बहुत अच्छी श्रोता रही हूँ, इसलिए कई लोगों ने मुझे अपना राजदार बना रखा है। सब अपना हाल-ए-दिल सुना जाते हैं और मैं भी सुनकर लोगों को तसल्ली दे दिया करती हूँ। सच बताऊँ तो मुझे खुशी होती है कि लोग मुझे अपना अपना विश्वास पात्र मानते हैं।

खैर अपने ‘मुँह, मियाँ मिट्ठू’ बन लिया अब चलते हैं अनीता जी की ओर।

अनीता जी से मेरी दोस्ती अच्छी चल रही थी। कभी हम मिल लेते थे तो कभी फोन पर बात हो जाती थी। धीरे-धीरे मैंने महसूस किया अनीता जी किसी बात से परेशान होती है या यह कहूँ कि किसी से नाराज होती हैं, तभी मुझे फोन करती हैं। कोई खुशी की बात हो तो वो बताना ज़रूरी नहीं समझतीं।

ऐसा एक बार नहीं, दो-तीन बार हुआ। जैसे, जब मैंने उन्हें टोका कि आपने नया सोफा लिया और बताया नहीं तो लापरवाही से बोलीं, “कौन सी बड़ी बात है? भूल गई होंगी।”

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जब मैंने अपने पति से यह बात कही तो वे मुझे समझाते हुए बोले, “अनीता जी ने तुम्हें अपना तनाव दूर करने का जरिया बना लिया है वे तो अपनी सारी भड़ास निकाल कर निश्चिंत हो जाती है। पर तुम खुद उन बातों को और उनसे जुड़े लोगों के बारे में सोच-सोचकर तनाव में आ जाती हो।”

कहीं ना कहीं मुझे अपने पति की बातें सही लगने लगीं क्योंकि अब चौबीसों घंटे वही अर्थहीन, नकारात्मक बातें मेरे दिमाग में चलती रहती थीं।

फिर ये कोरोना  महामारी का समय आ गया। सब अपने-अपने घरों में बंद हो गए। दो-चार दिन में अनीता जी का फोन आ जाता था, अपनी दुख भरी कहानी सुनाने के लिए।

आज सुबह से ही बहुत सिर दर्द हो रहा था। बाई भी नहीं है तो सारे काम करने होते हैं। दोनों बच्चों की ऑनलाइन क्लास थी। पति का वर्क फ्रॉम होम था। सो सब लोग अपने-अपने लैपटॉप पर थे। मैं जल्दी-जल्दी नाश्ता बना रही थी और भी बहुत सारे काम निपटाने थे। कमजोरी भी लग रही थी।

अनीता जी का फोन आया। मैंने उठाया नहीं। एक बार, दो बार, तीन बार लगातार घंटी बजती रही। सिर दर्द से फटा जा रहा था ऊपर से फोन। फिर मैंने कुछ निश्चय करके फोन उठाया, उन्होंने कहना शुरू कर दिया, “कहाँ थी? कब से फोन लगा रही हूँ? मैं कितना परेशान हो रही थी? पता है आज सुबह जेठानी का फोन आया था।”

मैंने बीच में बात काटते हुए कहा, “अनीता जी मेरी तबीयत ठीक नहीं है बाद में बात करती हूँ।”

वह कहाँ सुनने वाली थीं? बोलीं, “अच्छा ठीक है मेरी बात सुन लो फ़िर आराम कर लेना।”

यह सुनकर मेरा खून खौल उठा मैंने कहा, “बस कीजिए अनीता जी। मैं आपका कूड़ेदान नहीं हूँ। जिसमें आप अपने सारे नकारात्मक विचार डालती जाएँ। बस कीजिए, कभी तो शिकायतें करने से पहले मेरा भी हाल-चाल पूछ लिया कीजिए।”

यह सुनकर अनीता जी चकित रह गईं, बोलीं, “मैं तो तुम्हें अपनी छोटी बहन मानकर, अपने दिल की बात बताती हूँ।”

मैंने कहा, “तो दिल की अच्छी बातें भी तो बताया कीजिए। आप सिर्फ़ और सिर्फ़ नकारात्मक बातें मेरे साथ बाँटती हैं। जिनके कारण मैं भी तनाव में आने लगी हूँ। मैं आपको सम्मान देती हूँ, अपना दोस्त मानती हूँ पर दोस्त टिशू पेपर नहीं है कि जब मन चाहे आँसू पोंछो और फेंक दो। दोस्त का इस्तेमाल नहीं किया जाता। खैर, बच्चे भूखे हैं मुझे नाश्ता बनाना है अभी फोन रखती हूँ।”

उस दिन के बाद से उन्होंने मुझसे बात करना बंद कर दिया, पर मेरे मन को बहुत सुकून मिला। यह कदम मुझे पहले उठा लेना चाहिए था। मैंने बहुत देर कर दी फिर भी देर आए दुरुस्त आए।

एक बात मैंने सीख ली, कि यदि आप किसी की बातों से परेशान हो जाते हैं तो उन्हें शुरू में ही जता देना चाहिए, नहीं तो लोग आपका इस्तेमाल करना शुरू कर देते हैं और आप कुछ न कह पाने के कारण,  खुद तनाव ग्रस्त हो जाते हैं।

मूल चित्र: Filtercopy via Youtube 

 

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