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भाभी ये गुलाबी साड़ी आपके लिए है…

अरे बहु तेरे पास तो कितनी एक से बढ़कर एक मंहगी साड़ियां हैं। अभी सीमा की शॉपिंग ज्यादा जरूरी है, बाद में बजट रहा तो देखेंगे।

अरे बहु तेरे पास तो कितनी एक से बढ़कर एक मंहगी साड़ियां हैं। अभी सीमा की शॉपिंग ज्यादा जरूरी है, बाद में बजट रहा तो देखेंगे।

“माँजी ये गुलाबी साड़ी मैं ले लू क्या?” वर्षा ने चहकते हुए रेवा जी से पूछा। आज सास, बहू और वर्षा की नंद सीमा तीनों ही शादी की शॉपिंग करने बाजार आये हैं।

“अरे बहु तेरे पास तो कितनी एक से बढ़कर एक मंहगी साड़ियां हैं। अभी सीमा की शॉपिंग ज्यादा जरूरी है, बाद में बजट रहा तो देखेंगे”, रेवा जी ने कहा तो वर्षा का चेहरा उतर गया।

“माँ, भाभी के एक साड़ी ले लेने से कोई बजट बिगड़ने वाला नहीं है। अगर उन्हें यह गुलाबी साड़ी पसंद है तो लेने दीजिये”, सीमा ने वर्षा की साइड लेते हुए कहा

“अरे नहीं सीमा माँजी ठीक ही तो कह रही हैं। मेरे पास कितनी साड़ियां नई की नई पड़ी हुई है एक बार भी पहनने का मौका नहीं मिला। मैं बारात वाले दिन उनमें से ही कोई पहन लूंगी और वैसे भी इतनी अच्छी भी न है। यह मैं तो ऐसे ही कह रही थी”, वर्षा ने मुस्कुराते हुए कहा। पर मन में वो गुलाबी साड़ी बस गई है यह उसके चेहरे पर साफ दिख रहा था।

वर्षा की प्यारी ननद सीमा की पांच दिन बाद शादी है। वर्षा घर की बड़ी बहू थी औऱ शादी की सारी तैयारियां एक पैर पर खड़े होकर करने में जुटी थी। खुद की शादी के बाद ससुराल में यह पहला अनुभव था। रस्मों रिवाज की उसे अभी ज्यादा जानकारी न थी फिर भी अपनी सास रेवा जी से पूछ पूछ कर सभी काम बड़ी जिम्मेदारी से करने में जुटी थी। तभी वर्षा ने देखा कि सीमा बाहर जा रही है।

“अरे सीमा ये पर्स उठाकर कहाँ चल दीं?”

“भाभी मुझे थोड़ा मार्केट में काम था बस यूं गई और यूं आई”, सीमा ने स्कूटी की चाबी उठाते हुए कहा।

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“ओफ्फ हो सीमा अब क्या रह गया? परसों तो तुम कह रही थीं कि मेरी सारी शॉपिंग पूरी हो गई है। दो महीने से रोज ही तो शॉपिंग चल रही है तेरी, कभी पार्लर तो कभी कपड़े, तो कभी मैचिंग की चूड़ी, तो कभी ये, कभी वो और न जाने क्या क्या। अब तो शादी के पांच ही दिन बचे हैं। अब तेरा बाहर जाना सही नहीं”, वर्षा ने ऊपरी डपट लगाते हुए कहा।

“बस भाभी एक आखिरी बार और माँ को मत बताना जब तक माँ मंदिर से आएंगी तब तक मैं लौट आऊँगी”, कहते हुए सीमा चली गई।

वर्षा को इस घर में आये अभी छः महीने ही हुए हैं और इतने कम समय में ही वर्षा ने सबका दिल जीत लिया था। सीमा और वर्षा हमउम्र भी थीं, साथ-साथ बहुत अच्छी सहेलियां भी बन गई थी। रेवा जी का स्वभाव थोड़ा सख्त था उन्हें हर काम परफेक्ट देखने की आदत थी। पर सीमा ने कदम कदम पर अपनी भाभी का साथ दिया। चाहे घर के रीति-रिवाज समझने हो या सबकी पसंद-नापसंद के बारे में भाभी को बताना हो या कुछ गलती होने पर रेवा जी के गुस्से से बचाना हो हर बात में सीमा ने भाभी की मदद की। और अब उसी सीमा की भी शादी होने जा रही थी सोच कर ही वर्षा का मन भर आता था।

शादी का दिन भी आ गया। घर मेहमानों से भरा था। वर्षा को तो जैसे सांस लेने की भी फुर्सत न थी। कभी मेहमानों को देखती तो कभी घर की सजावट में जुट जाती, मशीन की तरह दौड़ी-दौड़ी कामों में लगी थी। दिन के तीन बजने को थे पर अभी तक उसने खाना भी न खाया था। शाम हो चली थी सीमा ने वर्षा को आवाज दी, “भाभी आप भी मेरे साथ पार्लर चलो न।”

“सीमा घर में इतने रिश्तेदार हैं और इतना सारा काम देखना है। तू जा मैं घर पर ही तैयार हो जाऊँगी। और वैसे भी अगर मैं चली गई तो माँजी गुस्सा होंगी”, वर्षा ने बहाना बनाते हुए कहा।

“वो सब मैं देख लूंगी पर आपको मेरे साथ चलना होगा वरना मैं भी नहीं जाने वाली”, सीमा ने जिद करते हुए कहा। मेहमान भी धीरे-धीरे तैयार हो कर मैरिज गार्डन जाने लगे थे।

आखिर सीमा वर्षा को अपने साथ ले गई। पार्लर वाली के पूछने पर वर्षा ने खुद के साथ लाई साड़ी पार्लर वाली को दे दी। तभी सीमा ने उनकी साड़ी एक तरफ सरका दी और वही गुलाबी साड़ी देते हुए कहा, “आप आज यही पहनने वाली हो।” वर्षा ने वही गुलाबी साड़ी देखी तो आश्चर्य से सीमा की और देखने लगी।

“सीमा अब इतनी जल्दी यह साड़ी तैयार कैसे होगी। न तो इतनी जल्दी ब्लाउज सिल सकता है और न ही यहाँ इसके मैचिंग की ज्वैलरी है।”

“मेरी प्यारी भाभी परेशान क्यों होती है? इसका ब्लाउज, चूड़ियां, ज्वैलरी सब तैयार है। बस आपके पहनने भर की देर है।”

वर्षा की पलके आँसुओ से भीग गई थीं, “पर माँजी…”

“माँजी क्या…भाभी कभी-कभी दूसरों को साइड रखकर अपने बारे में, अपनी खुशी और अपनी इच्छाओं के बारे में भी सोचना चाहिए। चलो अब जल्दी करो बारात आने का समय हो गया और हम अभी तक रेडी भी नहीं हुए।”

सीमा के जैसी नंद पाकर वर्षा की आंखे भर आईं। उसने सीमा को गले लगा लिया। साथ ही आँसू इस बात के भी थे कि यही सीमा कल विदा हो जाएगी।

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Babita Kushwaha

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