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कुछ अलग देखना चाहते हैं तो अनुराग बासु की फिल्म लूडो ज़रूर देखें!

Posted: नवम्बर 16, 2020

फिल्म लूडो एक ऐसी कहानी है जिसमें हीरो कौन है ये आप सोच कर बताएं, लेकिन इस फिल्म में हर किरदार, चाहे वो एक मर्द हो या औरत, को बराबर का चांस मिला है।  

हिंदी फिल्मों में लूडो के सांप-सीढ़ी को लेकर भी कुछ कहानियां कही गई हैं जब कहानी पहले नंबर से शुरू होती है और निन्नावे वाला साप कांटकर नीचे पहुंचा देता है। परन्तु ऐसा पहली बार हुआ है कि लूडो के चार रंगों के घर और चार चरित्र को लेकर कहानी कहने की कोशिश कि गई है। यह प्रयास अनुराग बासु ने स्वयं को यमराज के रूप में सूत्रधार कि तौर पर रखकर किया है। यह एकदम नया प्रयोग उन्होंने अपनी फिल्म लूडो में किया है। अनुराग बासु निर्मित मल्टीस्टार्स फिल्म लूडो नेटफिलिक्स पर रिलीज़ हुई है। इसके पहले भी चार कहानियों को एक-साथ कहने की कोशिश कुछ लोगों ने की है, पर लूडो खेल के चरित्र का सहारा इस फिल्म से पहले नहीं लिया गया है। 

फिल्म लूडो कि यादों को याद दिला देता है 

लूडो के गेम में हमेशा यही लगता है कि इस बार पांच-छह या दो-चार आ जाएगा तो गोटी ठीक-ठाक से घर पहुंच जाएगी पर फिर अचानक से कोई दूसरी गोटी आपकी गोटी को काट देती है और वापस नये सिरे से गोटी को घर तक पहुंचाने का सफर शुरू हो जाता है। यही लूडो फिल्म के चार पात्रों की कहानी में भी होता है। उनकी कहानी शुरू होती है और घर तक पहुंचने से पहले ही उन्हें  फिर से शुरुआत करनी पड़ जाती है। यही सिलसिला एक तरफ फिल्म को रोचक बनाता है तो कहीं-कहीं पर बोरिंग भी, पर आपको फिल्म को बीच में छोड़ने नहीं देता है, जैसे लूडो का गेम शुरू हो जाए तो खत्म होने तक निश्चित होने नहीं देता वैसे ही यह मूवी भी आपको अपने साथ बांध लेती है।

क्या हैं लूडो की कहानी?

बिट्टू(अभिषेक बच्चन) अपनी पत्नी(आशा नेगी) और अपनी बच्ची के साथ खुश है। पर फिर बिट्टू को जेल हो जाती है और उसकी पत्नी उसके दोस्त के साथ शादी कर लेती है। जेल से छूटने के बाद बिट्टू अपनी बेटी से मिलने के लिए तड़प जाता है, उसकी कहानी में एक नया मोड़ आता है जब एक बच्ची उससे टकराती है।

आलोक गुप्ता उर्फ आलू(राजकुमार राव) पिकीं(फातिमा सना शेख) का दीवाना है लेकिन उसकी शादी किसी और से हो जाती है। पिंकी के पति(परितोष त्रिपाठी) का दूसरी लड़की से अफेयर है। इन सब के बीच एक हादसा होता है और पिंकी आलोक के जिंदगी में मदद मांगने के लिए वापस आ जाती हैं।

राहुल(रोहित) और श्रीजा(पर्ल माने) दोनों एक अजीबोगरीब हादसे के बाद टकराते है और इनकी कहानी कई हादसों के साथ आगे बढ़ती है। 

आकाश(आदित्य) वॉइस आर्टिस्ट है, वह आहाना(सान्या) से शादी वाली साइट पर मिलता है।  दोनों एक-दूसरे के करीब आते है और दोनों का एक वीडियो वायरल होता है फिर दोनों उस वीडियो के  चक्कर में कई साल बाद फिर एक-दूसरे के नजदीक आ जाते है।

इन चारों की कहानी एक-दूसरे से नहीं  टकराती है और न ही जुड़ती  है। राहुल सत्येंद उर्फ सत्तू भईया(पंकज त्रिपाठी) जो एक बड़ा डॉन है वह इन चारों कहानी में किसी न किसी तरीके से घुसता है लूडो के पासे के छह के तरह, और पूरा गेम बदल कर रख देता है। 

फिल्म की कहानी में एक अनोखा सा नयापन। फिल्म में किरदारों को डिफाइन करने का प्रयास अधूरा नहीं लगता है, जिसके कारण फिल्म में लव एलीमेंट न भी हो तो चलता है। वो बस गानों के साथ चलता है जो थोड़े सुनने में अच्छे लगते है। अनुराग बासु ने हल्के तौर पर सरकार और सिस्टम पर कटाक्ष किए हैं जो कि अच्छे हैं। 

फिल्म लूडो के गेम की तरह अपनी कहानी में उतार-चढ़ाव का मजा देती है

सूत्रधार के रूप में कहानी शुरू करने का तरीका मनोरंजक है। परन्तु कहानी अपने-आप में इतनी मज़ेदार तरीके से उलझ जाती है कि दर्शकों के साथ संबंध बना लेती है। हर कलाकार का किरदार बहुत हो रोचक है। फिल्म की ‘हीरोइन्स’ बिलकुल अलग तरीके से अपनी पहचान बनती हैं। और फिल्म के हीरो ज़िन्दगी से हारते-झूझते, सुपर हीरो न बनते हुए, ज़िन्दगी के ‘हीरो’ लगते हैं।  

फिल्म मे गाने अच्छे बने है जो दृश्यों और धुनों के साथ निखर कर सामने आते है, खासकर 1951  की अलबेला का गाना, ‘ओ बेटा जी…ओ बाबू जी…’ का बहुत खूबसूरती से इस्तेमाल किया गया है जो चेहरे पर एक स्माइल ला देता है। प्रितम के गाने के बोल कुछ समय तक लोगों के जुबान पर जरूर चढ़े रहेगे।

कुल मिलाकर फिल्म की कहानी लूडो के गेम के तरह अपनी कहानी में उतार-चढ़ाव का मजा देती है। फिल्म जब खत्म होती है तो लूडों के खेल के खत्म होने का मजा देती है और चेहरे पर स्माईल आ जाती है।

चित्र साभार : Screenshots, film Ludo 

 

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