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सुसाइड का ख्याल और उससे जुड़े सवालों के जवाब दे रही हैं क्लीनिकल साइकॉलॉजिस्ट आरती सेल्वन

क्लीनिकल साइकॉलॉजिस्ट आरती सेल्वन ने विमेंस वेब के साथ वर्ल्ड सुसाइड प्रिवेंशन मंथ के उपलक्ष में सुसाइड का ख्याल, उनके लक्षण और बचाव के तरीके साझा किये।

क्लीनिकल साइकॉलॉजिस्ट आरती सेल्वन ने विमेंस वेब के साथ वर्ल्ड सुसाइड प्रिवेंशन मंथ के उपलक्ष में सुसाइड का ख्याल, उनके लक्षण और बचाव के तरीके साझा किये।

विश्व आत्महत्या रोकथाम दिवस 2020 आत्महत्या की रोकथाम के बारे में जागरूकता पैदा करने और कैसे अपने प्रियजनों को ‘सुसाइड का ख्याल’ से लड़ने में मदद करें उसके बारे में बताता है। इंडिया में सुसाइड के बारे में चर्चाएं तो पिछले 4 महीनों से नेशनल टेलीविज़न से लेकर सोशल मीडिया पर हो ही रही है। हर कोई इसे अपने तरीक़े से पेश कर रहा है।

आंकड़े देखे तो, वर्ल्ड हेल्थ आर्गेनाईजेशन के 2019 की रिपोर्ट्स के मुताबिक दुनिया में हर 40 सेकंड में एक व्यक्ति सुसाइड कर रहा है और महामारी के समय इन आंकड़ों में तेज़ी से वृद्धि हुई है। कोई घरेलू हिंसा से परेशान होकर तो कोई नौकरी चले जाने से तो कोई भविष्य की अनिश्चिता को लेकर अपनी जान दे रहें हैं।

विमेंस वेब ने सुसाइड का ख्याल, उसके पीछे के कारण से लेकर, उनको रोकने तक, सब समझने के लिए क्लीनिकल साइकॉलॉजिस्ट, आरती सेल्वन से बात करी। आरती सेल्वन से पहले भी हमने मेन्टल स्ट्रेस को लेकर बात करी थी। उम्मीद है आपने वो इंटरव्यू ज़रूर पढ़ा होगा और इनसे रूबरू हो चुके होंगे।

इस लेख में आरती सेल्वन, सुसाइड का ख्याल और उसके रोकथाम के बारे में अधिक जानकारी साझा कर रहीं हैं :

तनाव और ‘सुसाइड का ख्याल’ में क्या अंतर है?

आरती सेल्वन ने हमारे पिछले इंटरव्यू में कहा था कि ये डिसाइड करना बहुत मुश्किल हो गया है कि ये वायरस का पेंडेमिक है या स्ट्रेस का। तो ऐसे में समझ नहीं आता है कि क्या हमारी फ़ीलिंग्स सुसाइड के ख्याल का रूप ले रही हैं।

इसी बारे में आरती सेल्वन इनके बीच अंतर बताते हुए कहती हैं, “स्ट्रेस किसी भी चीज़ के लिए एक बहुत कॉमन रिस्पांस होता है जिसके रेंज होते हैं। हम छोटी-छोटी चीज़ों में भी तनाव में होते हैं जैसे की एक नए जॉब में, बच्चे के जन्म होने पर, या वर्क लोड जब ज़्यादा हो जाता है तो स्ट्रेस हो जाता है। लेकिन सुसाइडल थॉट्स हमें एक्सट्रीम या सीवियर स्ट्रेस यानि बहुत ज़्यादा तनाव होने के कारण आते हैं। और जब हमें महसूस होता है कि हम सिचुएशन से निबटने के लिए सारे तरीक़े अपना चुके हैं और और कोई तरीका नहीं है, तो तब कई बार मर जाना ही एक रास्ता नज़र आता है। तो ये एक्सट्रीम स्ट्रेस तब सुसाइड के ख्याल में बदल जाता है।” 

क्या सिर्फ डिप्रेशन ही सुसाइड के लिए ज़िम्मेदार है? और किन कारणों से सुसाइड का ख्याल आने लगता है?

“नहीं। डिप्रेशन में भी रेंज होती है और जब भी गंभीर या सीवियर डिप्रेशन होता है, तब सुसाइड का ख्याल आना आम है। अब सुसाइडल फ़ीलिंग्स आना और उसके विचार यानिआइडिएशन और प्लानिंग के बारे में सोचने में भी बहुत बड़ा फर्क है। कभी-कभी दूसरे मेन्टल हेल्थ कंडीशन में भी सुसाइड का ख्याल आता है जैसे कि बहुत ज्यादा एंग्जायटी हो सकती है। लेकिन सुसाइडल थॉट्स के पीछे हमेशा मानसिक बीमारी हो, ये भी ज़रूरी नहीं है।”

इन दिनों यूथ और महिलाओं के आत्महत्या के केसेस ज़्यादा देखने को मिल रहे हैं, तो इसके क्या कारण हो सकते हैं?

“कई बार हम बहुत मुश्किल स्तिथि में फंस जाते हैं, या इकोनॉमिक कंडीशन, भेदभाव, रिलेशनशिप्स आदि इसके कारण हो सकते हैं। खासकर के अभी देखें तो एक औरत के लिए सबसे ज्यादा तनाव का समय है। घरेलु हिंसा, बढ़ा हुआ काम आदि सबके वजह से कई बार वो जीना ही नहीं चाहती। और बच्चों की बात करें तो नाकामयाबी के डर से सबसे ज़्यादा स्ट्रेस होता है। कई इंजीनियरिंग, मेडिकल स्टूडेंट्स में स्ट्रेस का लेवल बहुत ज्यादा होने से सुसाइडल थॉट्स आते हैं। तो सुसाइड का ख्याल सिर्फ डिप्रेशन की वजह से ही नहीं बल्कि और भी बहुत कारणों से आता है।”  

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सामने वाले को सुसाइड का ख्याल आ रहा है, ये कैसे पहचानें? इसके लक्षण क्या हैं?

ये अपनों के व्यवहार से फैमिली और फ्रेंड्स सबसे पहले पहचान सकते हैं। कुछ छोटी-छोटी चीज़ों में बदलाव आने लगते हैं। जैसे कुछ एक्सट्रोवर्ट लोग अचानक से ख़ामोश रहने लग जाते हैं। या अक्सर सबको गुडबाय कहने लगते हैं, सबको फ़ोन करते हैं या लाइफ इंश्योरेंस चेक करने लगते हैं। तो ऐसे कुछ बदलाव से आप पहचान सकते हैं। इनके अलावा उनकी ज़िंदगी में बहुत मुश्किल वक़्त चल रहा है, लेकिन वो उसके लिए कुछ कर नहीं रहे हैं, या हो सकता है अपोजिट रिएक्शंस दे रहे हो, जैसे जब रोना है तो हँस रहे हैं, या हंसने की जगह रो रहे हों। तो ये सब इशारा है डिस्ट्रेस का जो सुसाइडल थॉट्स का रूप ले लेता है। और अगर डिस्ट्रेस दिख रहा है तो फ्रेंड्स और फैमिली को मदद के लिए आगे आना चाहिए।  

अगर सुसाइड जैसे विचार हमारे मन में आ रहे हैं, तो हम अपनी मदद कैसे कर सकते हैं?  

हमें लगातार खुद को चेक करना चाहिए कि मैं कैसा महसूस कर रही हूँ? आज कितना स्ट्रेस है? और हर इंसान को पता होता है कि वो किन-किन रिसोर्सेज से ज्यादा अच्छा महसूस कर सकते हैं। ऐसी चीज़ों की हमें लिस्ट बनानी चाहिए, जो हमें स्ट्रेस से लड़ने में मदद करती है। हो सकता है, आपको डांस, आर्ट से अच्छा महसूस होता हो, या हो सकता है फैमिली, फ्रेंड्स, थेरेपिस्ट से बात करके स्ट्रेस कम होता हो। तो अगर माइल्ड स्ट्रेस है, तो इन सब की आप मदद लें। लेकिन अगर सीवियर स्ट्रेस है तो आप अपने लिए हेल्प जरूर लें। हम सब नार्मल इंसान है, सबके साथ प्रॉब्लम होती है और स्ट्रेस होता है।” 

“जब स्ट्रेस ज़्यादा लगे तो हमे काउंसलर या थेरेपिस्ट की सलाह लेनी चाहिए। माइल्ड या हल्का स्ट्रेस तो हमें रोज रहता है। लेकिन जब आपको लगे कि अब थोड़ा ज़्यादा ही हो गया, फ़ैमिली और फ्रेंड्स इससे ज़्यादा हेल्प नहीं कर पा रहे हैं, तो उस समय बहुत जरूरी हो जाता है कि आप क्लीनिकल साइकॉलॉजिस्ट की मदद लें”, आरती आगे कहती हैं।

पीड़ित व्यक्ति के फ़ैमिली या फ्रेंड् होने के नाते आप उनकी किस प्रकार मदद कर सकते हैं?

“हर तरह की भावनाओं को हमें परिवार में नार्मल करना होगा। यह मुमकिन नहीं है कि हम हमेशा खुश रहें और उसी के साथ हमेशा दुनिया के सामने खुद को खुश दिखाना ज़रूरी नहीं है। फ़ैमिली और फ्रेंड्स में खुलकर हर तरह के इमोशंस पर बात होनी चाहिए। जैसे अगर अभी हम फ़ैमिली मेंबर्स से कहें कि मैं उदास हूँ, तो वो लोग यही कहेंगे इसके बारे में मत सोचो या उदास मत रहो। लेकिन ये पॉसिबल नहीं है कि हम अचानक से उस बात को निकाल दें और खुश रहने लगें।

इसके बजाय उनसे पूछना चाहिए कि क्या हो रहा है, कैसा महसूस हो रहा है, क्यों हो रहा है या मैं क्या मदद कर सकती हूँ, ऐसे ओपन एंडेड सवाल करें। इससे सामने वाले को लगेगा कि हां मेरा सपोर्ट करने के लिए मेरे फ़ैमिली और फ्रेंड्स हैं। तो हमें घर में हर तरह के इमोशंस पर बात करनी चाहिए।

कई लोग सुसाइड करते-करते रुक जाते हैं, तो ऐसा क्या है जो उन्हें रोक लेता है? ये एक पोस्टिव कदम है…

क्लीनिकल साइकोलोजिस्ट आरती सेल्वन बताती हैं कि आत्महत्या के विचार इसलिए आते हैं क्योंकि उस समय हमारी सोच बहुत संकीर्ण हो जाती है और हम सोचने लग जाते हैं कि सिचुएशन अब हमारे कंट्रोल में नहीं है। तो अपने विचारों को एक्शन में बदलने का इसलिए सोचते हैं क्योंकि हमें वो प्रॉब्लम अपनी ज़िंदगी से निकालनी है नाकि ‘हम और जीना नहीं चाहते’। ऐसे में कई बार आखिरी मिनट पर ऐसा होता है कि क्या मैं फिर से कोशिश करूँ? मुझे अभी अपनी ज़िंदगी खत्म तो नहीं करनी है। तो ऐसे ही सब सकारात्मक विचार उन्हें वो कदम उठाने से रोक लेते हैं। 

हम सुसाइड जैसे हादसे को कैसे रोक सकते हैं?

आरती सेल्वन कुछ स्टेप्स बताते हुए कहती हैं कि अगर किसी व्यक्ति को सीवियर स्ट्रेस है तो प्रिवेंशन में सबसे पहला स्टेप होता है कि फ्रेंड्स और फैमिली उनसे पूछें कि क्या सुसाइडल थॉट्स या आत्महत्या का विचार आ रहा है? हां, इसी तरह से सीधे प्रश्न करने पर ही हमें सीधे जवाब मिलते हैं। उसके बाद सहानुभूति दें कि ऐसे ख्याल, ऐसे विचार आ सकते हैं। हमारी सोसाइटी में अक्सर ऐसा माना जाता है कि जो लोग सुसाइड कर लेते हैं उनमें हिम्मत नहीं होती या वो कायर हैं। लेकिन ऐसा नहीं होता है, डिस्ट्रेस में ऐसे विचार आ सकते हैं। ऐसे में आप उनकी केयर करें और उन्हें थेरेपिस्ट, साइकॉथेरेपिस्ट की मदद लेने के लिए कनविन्स करें।     

(ये बहुत बड़ा मिथ है कि अगर हम उनसे पूछेंगे कि आपको सुसाइडल थॉट्स आ रहे हैं, तो इससे उन्हें आईडिया मिलेगा। ऐसा नहीं होता है। इतने स्ट्रेस से अगर वो गुज़र रहे हैं तो ये थॉट्स आना तो लाज़मी है। ऐसे प्रश्न से हम सिचुएशन को थोड़ा नार्मल करते हैं कि हाँ ये थॉट्स आ सकते हैं और सामने वाला व्यक्ति हमसे और अच्छे से अपनी प्रॉब्लम शेयर करता है।) 

हम इसके बारे में ज्यादा से ज्यादा अवेयरनेस कैसे बढ़ा सकते हैं?

इंडिया में वर्ल्ड सुसाइड प्रिवेंशन डे को एक ही दिन ऑब्ज़र्वे किया जाता है। तो ये बहुत ज़रूरी है कि लोगों तक अवेयरनेस पहुंचे।

आरती सेल्वन कहती हैं कि जिस तरह से विमेंस वेब हिंदी में आत्महत्या के बारे में लोगों को जागरूक कर रहा है, वैसे ही ज़्यादा से ज़्यादा लोगों को इसके बारे में अवेयर करना चाहिए। जिस तरह से ब्रैस्ट कैंसर, PCOS या डॉयबिटीज़ के सिम्प्टम्स के बारे में लोग जागरूक हैं, ठीक वैसे ही सुसाइड और बाकि मेन्टल इलनेस के बारे में भी जागरूक होना बहुत ज़रूरी है।     

क्या सरकार को हमारे रेगुलर हेल्थ चेक अप में मेन्टल हेल्थ को भी शामिल करना चाहिए ?

अभी बीते दिनों में ही देश की पहली मेन्टल हेल्थ हेल्पलाइन किरण का संचालन शुरू हुआ है। लेकिन सिर्फ ये काफी नहीं है।

इस पर आरती अपने विचार रखते हुए कहती हैं कि मेन्टल हेल्थ को लेकर आज भी जो स्टिग्मा है, (इसको कलंक माना जाता है), उस पर काम करना उनकी ज़िम्मेदारी है। इसके अलावा इसकी एक्सेस या पहुंच बढ़ानी बहुत ज़रूरी है। अभी क्लीनिकल साइकॉलॉजिस्ट सिर्फ 3 डिजिट नंबर्स में हैं, तो ऐसे में इसकी एजुकेशन और ट्रेनिंग पर काम करना चाहिए। 

“अभी सिर्फ मेट्रो सिटीज या कुछ शहरों में मेन्टल हेल्थ प्रोफ़ेशनल हैं, तो रूरल से लेकर अर्बन एरिया तक में सभी लोगों के लिए इसे इकोनोमिकल बनाना चाहिए ताकि सब लोग इसका फायदा उठा सकें और ज़्यादा से ज़्यादा लोगों तक इसकी आसान पहुंच होनी चाहिए। इन सबके अलावा मेन्टल हेल्थ एक्ट में इसका इनश्योरेंस तो है लेकिन ऑन ग्राउंड नहीं है, हम एक्सेस नहीं कर सकते हैं। तो सरकार को मेन्टल हेल्थ का एक्सेस इनश्योरेंस और फाइनेंसियल ग्राउंड पर भी बढ़ाना चाहिए।”

सुसाइड की ख़बरों से तो हम रोज रूबरू हो रहे हैं लेकिन अब इन पर लगाम लगाना बहुत ज़रूरी हो गया है। उसके लिए हमें समझना होगा कि मेन्टल हेल्थ हमारी हेल्थ का बहुत ज़रूरी हिस्सा है। कोविड के समय में हम अपने शारीरिक स्वास्थ्य का और ज़्यादा ध्यान रख रहें हैं लेकिन मानसिक स्वास्थ्य भी उतनी ही ज़रूरी है। क्योंकि दोनों जुड़े हैं। अगर मेन्टल हेल्थ अच्छी नहीं है तो फिजिकल हेल्थ भी नहीं है। आत्महत्या को अब टैबू समझना बंद करें इससे पहले की बहुत देर हो जाये। 

आप क्लिनिकल साइकॉलोजिस्ट, आरती सेल्वन से यहां संपर्क कर सकते हैं :

Email: [email protected]

Phone: 9490708947, 8106864001, 7032562301

Address: 6/3/1219/7/B Uma Nagar, Begumpet, St. No. 6, St. Francis Degree College, Hyderabad 500016

मूल चित्र : Aarathi Selvan

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About the Author

Shagun Mangal

A strong feminist who believes in the art of weaving words. When she finds the time, she argues with patriarchal people. Her day completes with her me-time journaling and is incomplete without writing 1000 read more...

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