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सेकंड चांस!

Posted: सितम्बर 13, 2020

जो सपने सोम के अधूरे रह गए थे वो उसने दूसरे बच्चों के पूरे करने में लगा दिया। सोम ने एक बार फिर से जिंदगी को जीना सीख लिया था।

आज कॉलेज में सोम का पहला दिन था। ढेरों अरमान दिल में सजाये सोम को उसके मम्मी पापा ने कॉलेज गेट पे छोड़ा। इतना भव्य इमारत और कैंपस देख सोम और उसके माँ पापा बहुत ख़ुश थे, रीमा जी के आँखों में बेटे से बछुरने के आँसू थे तो विजय जी की आँखों में गर्व था। उनका देखा सपना आज उनका बेटा जो पूरा करने जा रहा था।

एक मद्यमवर्गी परिवार जिसके मुखिया विजय जी थे, एक प्राइवेट नौकरी थी। उनकी पत्नी रीमा जी भी सौम्य मुस्कान लिए हर परिस्थिति में अपने पति का साथ देती। दोनों का एक ही सपना था अपने एकलौते बेटे सोम को अच्छी शिक्षा देना। आमदनी कम थी लेकिन संतोष अपार था।

सोम को भी परिस्थितियों का पूरा ज्ञान था और अपने पापा मम्मी के सपनों का भी। महंगी किताबें और ट्यूशन फीस के इंतज़ाम के लिए विजय जी दिन रात मेहनत करते। किशोर उम्र में ही बहुत समझदार था सोम लेकिन कभी कभी उसका जी भी मचल उठता जब अपने उम्र के लड़कों को अच्छे कपड़े, मोबाइल लिए देखता। अपने अरमानों की आहुति अपने सपनों के लिए दे देता सोम।

फिर वो दिन भी आया जब एक नामी इंजीनियरिंग कॉलेज में सोम का दाख़िला हो गया।

“सुनो जी, सोम को कुछ अच्छे कपड़े जूते दिला लो इतने बड़े कॉलेज में जा रहा है”, रीमा जी ने कहा।

“हाँ हाँ, मैं भी यही सोच रहा था।” विजय जी ने सोम को बुलाया, “बेटा शाम को बाजार चल कर जो लेना हो ले लेना।”

सब तैयारी खुशी खुशी कर आज सोम को कॉलेज छोड़ कर थोड़े उदास और गर्व के साथ वापस घर आ गए।

नई जगह नया माहौल सोम भी खुद को वहाँ ढालने की कोशिश में था। जो रूम सोम को मिला उसमे रवि उसका रूममेट था। वो भी सोम की तरह ही साधारण घर से था तो दोनों में बनने लगी।

कॉलेज में अमीर घर के लड़के लड़कियाँ भी आते थे। उनका रहन सहन कपड़े सब देख रवि ललचा जाता। “सोम देख ना क्या जूते हैं कम से कम पांच हजार के तो होंगे” अपने सामने खड़े एक लड़के के तरफ इशारा कर रवि ने कहा।

 हाँ है तो पर तू छोड़ ना इनको ये प्रोजेक्ट देख सोम ने बात बदली।

“तू भी ना सोम जब देखो पढ़ाई पढ़ाई। इतनी मेहनत कर यहाँ आये हैं थोड़े दिन तो मजे़ कर ले”, हँसते हुई रवि ने कहा तो सोम भी मुस्कुरा उठा।

एक दिन सोम ने रवि को कुछ लड़को से बातें करते देखा। सोम को देख रवि थोड़ा घबरा गया और उन्हें वापस भेज दिया। “कौन थे ये लड़के रवि?”

“अरे कुछ भी तो नहीं हम तो बस बातें कर रहे थे”, रवि ने बात बदल दिया। 

सोम देख रहा था रवि अक्सर रातों को अपने बिस्तर पर नहीं होता, और व्यवहार भी बदला बदला लगता। जब सोम कुछ पूछता तो बात घूमा देता। एक रात सोम ने रवि का पीछा किया तो चौंक गया… रवि होस्टल की छत पर कुछ लड़कों के साथ सिगरेट पी रहा था साथ में बियर की बोतले भी थी। ये वही लड़के थे, रवि ने पहचान लिया, “ये क्या कर रहा है रवि?”

सोम को अचानक से देख रवि थोड़ा घबरा गया, “अरे कुछ भी तो नहीं अच्छा हुआ तू आ गया। ले एक बार तू भी ले जिंदगी के मजे” रवि ने सिगरेट सोम के मुँह में लगाते हुए कहा।

 “नहीं, मुझे नहीं पीनी”, सोम ने रवि का हाथ झटक दिया।

“आज कल तो लड़कियाँ भी पीती है, तू तो बिलकुल फट्टू निकला” ये कह बाकि के लड़के सोम का मज़ाक उडाने लगे। दो तीन लड़कों ने सोम को पकड़ लिया और ज़बरदस्ती बियर की बोतल मुँह में डाल दी। उस दिन की ज़बरदस्ती धीरे धीरे आदत में बदलने लगी अब रोज़ रोज़ बियर और सिगरेट। जो पैसे विजय जी भेजते सब सोम इनमें उड़ा देता। कॉलेज के सारे बदनाम नसेड़ी लड़कों से सोम की दोस्ती हो गई। जिन्होंने ड्रग्स भी लेना सीखा दिया। भोला -भाला सोम अब नसेड़ी सोम हो गया था। इसका असर पढ़ाई पर भी होने लगा। पहले सेमेस्टर में फ़ैल हो गया सोम।

जब विजय जी को नोटिस आया तो दोनों दंग रह गए। उन्हें विश्वास ही नहीं हो रहा था। जब भी वो सोम से पूछते पढ़ाई का तो वो हमेशा बहुत अच्छा बताता था।

तुंरत ट्रैन पकड़ कॉलेज पहुँचे। प्रिंसिपल से मिलने पर जो सब पता चला विजय जी और रीमा जी के पैरों तले से ज़मीन निकल गई।

जब दोनों होस्टल के कमरे में पहुँचे तो, बिस्तर पे बेजान हड्डियों का ढांचा सोम मिला… बिलकुल बेसुध, हाथों में अनगिनत इंजेक्शन के निशान। माँ बाप का कलेजा मुँह को आ गया। क्या सोचा क्या हो गया?

प्रिंसिपल ने ड्रग लेने के कारण रवि और सोम दोनों को ससंपेंड कर दिया। कितने उत्साह से बेटे को यहाँ ले कर आये थे कितने गर्व से सबको बताते की मेरा सोम कहाँ पढ़ाई कर बड़ा इंजीनियर बनेगा और आज क्या देख रहे थे।

दोनों बेटे को वापस घर ले आये।  सोम ड्रग्स, सिगरेट के लिए पागल हो जाता। चीखता चिल्लाता जो सामान हाथ लगता फेंक देता, सिर के बाल नोंचने लगता, बहुत ख़राब हालत हो गई।

डॉक्टर को दिखाया विजय जी ने लम्बा चौड़ा खर्चा डॉक्टर ने गिना दिया।

सोम को हॉस्पिटल में भर्ती करा दिया गया। कभी – कभी जाते विजय जी और रीमा जी सोम को देखने और ज़ार ज़ार रोते अपने एकलौते प्रतिभावान बेटे की ये दशा देख, समझ ही नहीं पाते की कहाँ गलती हुई उनसे? घर, गहने सब बिक गए इलाज में।

एक साल बाद लौटा सोम ठीक हो बिल्कुल शांत शरीर के घाव तो भर गए थे लेकिन मन के घाव उनका क्या वो तो हरे ही थे।

ना जाने कहाँ खो गया था वो सोम जो उनका बेटा था। खुब समझाते सोम को दोनों, “बेटा तू सही सलामत है और कुछ नहीं चाहिए हमें। फिर से शुरू कर एक नई जिंदगी जो इच्छा हो वो कर हम तेरे साथ हैं।”

एक रात अपने माँ के गोद में सिर रखा खूब रोया सोम जैसे सारा दिल का गुबार निकल देना चाहता हो, “माँ पापा, माफ़ कर दो मुझे आप दोनों। आपके अरमान आपके सपनों को पूरा नहीं कर पाया। मैं अच्छा बेटा नहीं बन पाया माँ।” 

“नहीं बेटा, तू हमारे पास है यही सबसे बड़ी कृपा है ईश्वर की। आज से तू ये सब नहीं सोचेगा और आगे बढ़ेगा। जिंदगी बहुत बड़ी है अपनी असफलता से सीख लो आगे बढ़ो” ये कह विजय जी ने सोम को गले लगा लिया।

जल्दी ही सोम कोचिंग की शुरुवात हुई। जो सपने सोम के अधूरे रह गए थे वो उसने दूसरे बच्चों के पूरे करने में लगा दिया। सोम ने एक बार फिर से जिंदगी को जीना सीख लिया था।

एक संतोष था अब की जो सपने खुद के अधूरे रह गए वो दुसरो के तो पूरे कर रहा है।

जिंदगी बहुत लंबी है, उसे कैसे सुन्दर बनाना है ये कला सोम ने सीख ली थी।

मूल चित्र : Pexels

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