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बहुरिया रामस्वरूप देवी : ‘बिहार की लक्ष्मीबाई’ ने जीता वहाँ का पहला विधानसभा चुनाव

Posted: सितम्बर 27, 2020

बिहार की लक्ष्मीबाई के नाम से प्रसिद्ध बहुरिया रामस्वरूप देवी महिलाओं के लिए प्रेरणा रहीं और उन्होंने बिहार के पहले विधानसभा चुनाव भी जीते।

बिहार जैसे राज्य में हाल के विधानसभा और लोकसभा चुनावों में कमोबेश हर सीटों पर महिलाओं ने आशा के विपरीत जमकर मतदान किया हो, उस बिहार की जमीन पर महिला संघर्ष का इतिहास में महिला नायिकाओं की तलाश करें तो अक्सर निराशा हाथ लगती है।

कभी-कभी लगता है कि बिहार की महिलाओं ने अपने स्वयं के सवालों पर कोई संघर्ष या तो कभी किया नहीं या फिर उनके संघर्षों को इतिहास में दर्ज ही नहीं किया गया। दूसरी वाली बात ज्यादा सही लगती है बिहार की महिलाओं ने संघर्ष तो ज़रूर किया होगा पर वो इतिहास में दर्ज नहीं हुई इसलिए लोगों के स्मृति में भी बिहार की महिला नायिकाएं नहीं है।

बहुरिया रामस्वरूप देवी – बिहार की लक्ष्मीबाई

बहुरिया रामस्वरूप देवी जिनको कभी बिहार की लक्ष्मीबाई भी कहा गया वह नायिका हैं जिनका संघर्ष भोजपुरी भाषा के सातवी दर्जे के स्कूली किताब अंजोर में “बहुरिया के ललकार” से दर्ज है। अफसोस स्वयं बिहार के लोग भी बहुरिया रामस्वरूप देवी के बारे में नहीं जानते हैं, भोजपुरी भाषा को पढ़ने-समझने वाले बच्चे जरूर जानते होंगे। परंतु, लोक स्मृति में वो लगभग लुप्त हो चुकी हैं।

बहुरिया रामस्वरूप देवी का शुरू का जीवन

बिहार के भागलपुर जिले के कहुल गांव के ज़मीदार बाबू भूपनारायण सिंह के घर रामस्वरूप देवी का जन्म हुआ। जमीदारी ठाट-बाट में बचपन बीता, अंग्रेजी, उर्दू और हिंदी भाषाओं में प्रारंभिक पढ़ाई शुरू हुई और सामाजिक रीति-रिवाज के आगे ज़मीदारी ने घुटने टेकते हुए मात्र नौ साल की आयु में बाबू हरमाधव प्रसाद से उनका विवाह कर दिया।

पति का साथ

परंपरागत पर्दे को मानने वाले ससुराल में उदार विचार के देशभक्त पति हरमाधव प्रसाद ने बहुरियाजी के व्यक्तित्व के विकास की हर कोशिश की, जो रामस्वरूप देवी के लिए किसी वरदान से कम न था। वह पति के साथ हर सामाजिक गतिविधियों में भाग लेती और सीखती भी। पति की गिरफ्तारी हुई तब खुल कर उन्हें स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय होना पड़ा।

लोगों का प्यार

1930 के नमक सत्याग्रह में कानून भंग करने के आरोप में हरमाधव प्रसाद गिरफ्तार करके हजारीबाग जेल में बंद कर दिए गए। पर्दे में रहकर पति के साथ काम करने वाली बहुरियाजी सिंहनी सी गरजती हुई पर्दे से बाहर आ गई। गांव-गांव जाकर तूफानी दौरा कर जनता में विद्रोह की ज्वाला को जलाना शुरू कर दिया। जाहिर था बिहार के उस दौर के औपनिवेशिक माहौल में अंग्रेजी सरकार ने यह नहीं सोचा था। सविनय अवज्ञा आंदोलन में उन्हें गिरफ्तार कर भागलपुर सेंट्रल जेल ले जाया जाने लगा।

तभी एक घटना घटी जिसकी उम्मीद बहुरिया को भी नहीं थी। जिस गाड़ी में बहुरिया को गिरफ्तार करके ले जाया जा रहा है उसके आगे लोग लेट गए। अंग्रेजी अफसरों के लाख कोशिश करने के बाद भी लोग बहुरिया को रिहा करने की अपनी जिद पर अड़े हुए थे। अंत में चिढ़कर अंग्रेजी सरकार ने भीड़ को कुचलकर गाड़ी निकालने का आदेश दिया। अंत में बहुरिया को दखल देना पड़ा, तब लोग माने। गांधी इरविन समझौते के फलस्वरूप अन्य नेता के साथ बहुरियाजी को भी रिहा कर दिया गया।

क्रांतिकारी दिन और जेल का सफर

19 अगस्त 1942 को छपरा जिले के मढौरा थाना क्षेत्र में एक सभा को संबोधित कर रही थी। तभी अंग्रेजों ने अंधाधुंध गोलीबारी चालू की। भय से भागकर लोग आस-पास खेतों में जा छिपे। गांधी के विचारों में आस्था रखने वाली बहुरिया मैदान में डटी रही। लोगों में भ्रम फैल गया कि बहुरिया को गोली लगी और देखते ही देखते खेत में छुपे हुए हजारों स्वतंत्रता सेनानी अंग्रेजी सिपाहियों पर टूट पड़े। कुछ अग्रेज सिपाही मारे भी गए और बाकी भाग खड़े हुए। मृत अग्रेंज सिपाहियों को पत्थरों से बांधकर नारायणी नदी में डुबो दिया गया था। सबूत नष्ट होने के कारण मुकदमा नहीं चल सका। बाद में कांग्रेस के कहने पर बहुरिया ने समर्पण कर दिया और उन्हें भागलपुर जेल भेज दिया गया।

बहुरिया रामस्वरूप देवी ने पहले विधानसभा चुनाव में जीत हासिल की

तीन साल बाद देश आजाद हो गया, जिसके लिए बहुरियाजी ने कई बार अपनी जान की बाजी लगाई। बिहार के पहले विधानसभा चुनाव में उन्होंने जीत भी दर्ज की। आजादी के बाद वह अधिक दिन तक लोगों की सेवा नहीं कर सकी। नवम्बर 1953 में उनका देहांत हुआ। अपने दौर में महिलाओं और लड़कियों के लिए प्रेरणा रही बहुरियाजी और बिहार की लक्ष्मीबाई के नाम से प्रसिद्ध बहुरिया रामस्वरूप देवी आज बिहार के लोगों के स्मॄति में ही नहीं बिहार के इतिहास से भी ओझल हो चुकी हैं।

मूल चित्र : अँजोर, कक्षा ७ खातिर भोजपुरी पाठ्य पुस्तक  (उनकी और कोई तस्वीर उपलब्ध नहीं है)

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