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‘हां, बस एक थप्पड़…..पर नहीं मार सकता’, कहती हैं तापसी पन्नू फ़िल्म थप्पड़ में

तापसी पन्नू और अनुभव सिन्हा की फ़िल्म थप्पड़ का ट्रेलर देखने के बाद लगा कि जिसे हम कभी-कभी छोटी सी बात कहकर टाल देते हैं, वो असल में शुरुआत होती है घरेलू हिंसा की।

अभी कुछ ही देर पहले तापसी पन्नू की फ़िल्म थप्पड़ का ट्रेलर लॉन्च किया गया है। ये ट्रेलर काफी पावरफुल लग रहा है।

कल ही इसका पोस्टर भी रिलीज़ किया गया था जिसमें तापसी के रिएक्शन्स ऐसे हैं जैसे कोई उन्हें थप्पड़ मार रहा है। पहले लगा ऐसा क्या हो सकता है इस नाम की फिल्म में लेकिन ट्रेलर देखने के बाद लगा कि जिसे हम कभी-कभी छोटी सी बात कहकर टाल देते हैं वो असल में शुरुआत होती है घरेलू हिंसा की।

फिल्म एक खुशहाल पति-पत्नी की कहानी है जो एक-दूसरे से बेहद प्यार करते हैं और जन्मों-जन्मों साथ देने की कसमें खाते हैं। लेकिन कुछ ऐसा हो जाता है जो उन्हें तलाक की दहलीज़ पर खड़ा कर देता है – एक थप्पड़। एक पार्टी में पति अपनी पत्नी पर सबके सामने किसी बात से अपसेट होकर थप्पड़ मार देता है।

दकियानूसी समाज कहेगा – ये छोटी बात है, थप्पड़ ही तो मारा है, रफ़ा-दफ़ा कर देना चाहिए, पति ही तो है क्या हुआ जो एक थप्पड़ मार दिया, गुस्से में था तुम्हें भी समझना चाहिए। है ना? ऐसी ही कुछ बातें करते हैं सब। लेकिन उस औरत से पूछिए जिसके पति ने ये थप्पड़ उसके गाल पर नहीं आत्मसम्मान पर मारा है। क्या यही पति उसे माफ़ कर देता अगर वो उसे भरी महफ़िल में ऐसे थप्पड़ मारती।

दकियानूसी समाज कहेगा – पति पर हाथ उठाया कैसी औरत है, सबके सामने अपने पति की बेइज्ज़ती कर दी, इस औरत को तो बिलकुल भी शर्म नहीं है। ऐसा ही होता है। एक मिनट के लिए खुद से पूछिए। कहीं ना कहीं आपने भी ऐसा कभी सोचा होगा।

हम औरतें ही कभी-कभी ऐसी चीज़ों को बढ़ावा देती हैं। मर्दों से ज्यादा औरतें ही कहती सुनाई पड़ती है हाय, हाय बेटी हो गई काश इसका लड़का हो जाता।

फ़िल्म थप्पड़ ट्रेलर में तापसी की मां और सास भी उसे कहती हैं – ‘जाने भी दो, औरत को थोड़ा-बहुत बर्दाश्त करना आना चाहिए।’ वाह, क्या सिखाया जा रहा है।

रिश्ते बड़े नाज़ुक होते हैं। लेकिन संभालना सिर्फ औरत को क्यों पड़ता है। पत्नी को ये बात नागंवार है कि उसका पति उसपर हाथ उठाए। उसका साथ देने की बजाए उसका परिवार, उसके दोस्त, उसके रिश्तेदार बस यही कहते हैं कि तुम्हें एक मौका और देना चाहिए। बार-बार ये सुनकर सही के लिए लड़ रही पत्नी भी सोचती है कि क्या मैं ग़लत तो नहीं कर रही।

लेकिन वो जानती है कहीं ना कहीं वो अकेली भले ही हो पर जो कर रही है सही कर रही है। अपने पति को मौका देने की बात पर वो कहती है, ‘तुमने कंपनी में इतने इमोशंस इन्वेस्ट किए तुम तो ख़ुद को कंट्रोल नहीं कर पाए। मैंने तो अपनी पूरी ज़िंदगी तुमपर इंवेस्ट कर दी, मैं कैसे मूव ऑन हो जाऊं। I don’t love you”

आपमें से भी शायद कुछ ऐसे होंगे जिन्होंने अपने पति की ऊंची आवाज़ या शायद कभी उनका हाथ उठाना ये समझकर झेल लिया हो कि परिवार चलाने के लिए औरत को त्याग करना पड़ता है। आपने नहीं तो आपकी मां, दादी-नानी किसी से पूछकर देखिए उनका रवैया इस पर क्या होता है।

पर मेरा यही रवैया है जो इस फिल्म में पत्नी का है, ‘उसने मुझे पहली बार थप्पड़ मारा पर वो नहीं मार सकता। उस थप्पड़ से मुझे वो सारी अनफेयर चीज़ें साफ़-साफ़ दिखने लगी जिन्हें अनदेखा करके मैं आगे बढ़ती जा रही थी।’ ग़लत बात किसी के लिए सही या ग़लत नहीं होती, ग़लत हमेशा ग़लत ही होता है।

फ़िल्म कबीर सिंह vs फ़िल्म थप्पड़

अभी कुछ महीने पहले कबीर सिंह फिल्म आई थी जिसका कॉन्सेप्ट थप्पड़ के बिल्कुल उलट था। उस फिल्म में जब हीरो अपनी प्रेमिका को थप्पड़ मारता है तो प्रेमिका उसे गंभीरता से ना लेते हुए भी आख़िर में वापस अपने प्रेमी के पास चली जाती है। फिल्म के डायरेक्टर संदीप वागा ने भी एक विवादित बयान दिया था कि ‘जब आप किसी महिला से बहुत गहराई से जुड़े होते हैं तो अगर आपके पास उसे थप्पड़ मारने की भी आज़ादी नहीं है तो मुझे नहीं लगता है आपके रिश्ते में गहराई है। थप्पड़ मारना कभी-कभी expression of love होता है।’

उनके इस बयान का कई लोगों ने साथ भी दिया कि ये सिर्फ एक फिल्म थी और कुछ लोगों ने ये कहकर विरोध भी किया कि फिल्मों में ऐसी चीज़ें दिखाने से लोगों को बढ़ावा मिलता है। आपकी सोच इसके साथ या ख़िलाफ़ हो सकती है। लेकिन हर इंसान के लिए उसका आत्मसम्मान सबसे पहले आना चाहिए। रिश्ता आपकी अहमियत नहीं समझता तो उसे भी उतनी अहमियत नहीं देनी चाहिए। हां, बस एक ‘थप्पड़’…..पर नहीं मार सकता ।

नोट : मुल्क और आर्टिकल 15 जैसी शानदार फिल्में बनाने वाले अनुभव सिन्हा ने फ़िल्म थप्पड़ को डायरेक्ट किया है। फिल्म 28 फरवरी 2020 को आएगी, ज़रूर देखिएगा।

मूल चित्र : YouTube 

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