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कैसे बनीं आशा वर्कर मतिल्दा कुल्लू फोर्ब्स की सबसे ताक़तवर महिलाओं में से एक

फोर्ब्स इंडिया के मुताबिक इतनी मेहनत और पसीने के लिए आशा वर्कर मतिल्दा कुल्लू को महीने में केवल 4500 रुपए की रकम बतौर तनख्वाह मिलती है।

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फोर्ब्स इंडिया के मुताबिक इतनी मेहनत और पसीने के लिए आशा वर्कर मतिल्दा कुल्लू को महीने में केवल 4500 रुपए की रकम बतौर तनख्वाह मिलती है।

कुछ दिन पहले ही फोर्ब्स इंडिया ने भारत की 50 सबसे शक्तिशाली महिलाओं के नामों की सूची जारी की। इसमें कई बड़े-बड़े नाम शामिल हैं। वो सभी नाम हम आपको बताएंगे लेकिन एक नाम जो इनमें सबसे अलग है वो है उस महिला का जो ना तो कोई बड़ी बिज़नेसवूमन हैं ना ही स्पोर्ट्सवूमन, ना उन्होंने अपना कोई स्टार्टअप शुरू किया है और ना ही वो कोई एक्ट्रेस हैं।

इनसे मिलिए ये हैं एक आशा वर्कर, मतिल्दा कुल्लू, जिन्होंने अपने गांव को स्वस्थ बनाने के प्रण लिया और उसे पूरा किया। साइकिल पर सवार मतिल्दा रोज़ जब घर से बाहर निकलती है तो उनका एक ही मकसद होता है, अपने गांव के लोगों को स्वस्थ बनाना और ये काम वो पूरे समर्पण भाव से करती हैं।

ASHA यानि Accredited Social Health Activist यानि मान्यता प्राप्त सामाजिक स्वास्थ्य कार्यकर्ता। आशा के तहत गांव, मोहल्लों की स्थानीय महिलाओं को उनके समुदायों में स्वास्थ्य शिक्षकों और कार्यकर्ता के रूप में प्रशिक्षित किया जाता है। केंद्र सरकार ने 2005 में ये पहल शुरू की थी जिसके तहत कई महिलाओं को प्रशिक्षित किया गया। इसका सबसे ज़्यादा लाभ उन महिलाओं को हुआ जो ग्रामीण इलाकों में रहती हैं क्योंकि वहां चिकित्सा सुविधाएं शहरों के मुकाबले में कम होती हैं। इन महिलाओं को रोज़गार मिला, नई पहचान मिली और जीवन का नया मकसद मिला। मतिल्दा कुल्लू ने भी आशा वर्कर की ट्रेनिंग पूरी होते ही अपना काम संभाल लिया था।

45 वर्ष की आशा वर्कर मतिल्दा कुल्लू बेहद साधारण पृष्ठभूमि से ताल्लुक रखती हैं। वो ओडिशा के सुंदरगढ़ ज़िले के एक छोटे से गांव की आदिवासी महिला हैं जो पिछले 15 साल से आशा वर्कर के तौर पर काम कर रही हैं। पिछले 2 साल उनके काम के लिए सबसे अधिक चुनौतीपूर्ण थे क्योंकि देश कोरोना वायरस से जूझ रहा था। इस वक्त उन्होंने लोगों तक हर स्वास्थ्य सुविधा पहुंचाने के लिए पुरज़ोर मेहनत की।

मतिल्दा का दिन हर साधारण घरेलू महिला की तरह सुबह जल्दी शुरू हो जाता है। वो 5 बजे उठती हैं। वो परिवार के सदस्यों के लिए खाना बनाकर, अपने जानवरों को चारा देने के बाद तैयार हो जाती हैं। मतिल्दा अपनी साइकिल उठाती हैं और फिर शाम तक गांव में घर-घर जाकर लोगों का स्वास्थ्य परिक्षण करती हैं। विशेष तौर पर वो गांव की उन महिलाओं का बहुत ख्याल रखती हैं जो नई-नई मां बनी हैं।

आशा दीदी, नवजात शिशुओं के टीकाकरण, प्रसव के दौरान और बाद में महिला को उचित चिकित्सा मिले, इसका भी पूरा ध्यान रखती हैं। जब गांव में कोई महिला मां बनती है तो मतिल्दा थोड़े-थोड़े दिनों के अंतराल में उससे मिलती रहती हैं। मतिल्दा की ड्यूटी 24/7 होती है क्योंकि ऐसा बहुत बार होता है कि लोगों को अचानक उपचार की ज़रूरत पड़ जाती है। ऐसे में मतिल्दा हमेशा उनकी मदद के लिए तैयार रहती हैं। मतिल्दा अपने गांव के सभी लोगों को स्वस्थ बनाने के लिए दिन-रात एक कर देती हैं।

मतिल्दा कहती हैं, “एक महिला जो घर चला सकती है वह समाज में अपना योगदान भी दे सकती है। एक नारी घर के साथ पूरे समाज की देखभाल करने की शक्ति रखती है। मुझे अपने काम पर गर्व है क्योंकि इससे मैं लोगों की जान बचा पाती हूं।”

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आशा वर्कर मतिल्दा कुल्लू का काम बिल्कुल भी आसान नहीं है। एक छोटे से आदिवासी गांव में शुरू-शुरू में लोगों को समझाने में बहुत दिक्कत हुई। अधिकतर लोग बीमार पड़ने पर जादू-टोने और झाड़-फूंक में विश्वास करते थे। ऐसे में मतिल्दा का काम और चुनौतीपूर्ण हो गया। उन्होंने हार नहीं मानी और अपने इलाके के लोगों को स्वास्थ्य संबंधी जानकारियां देकर उनका विश्वास जीता।

आज उनके गांव को कोई भी व्यक्ति बीमार पड़ने पर अपनी आशा दीदी को ही आवाज़ लगाता है। इसी विश्वास के कारण लोगों ने कोरोना के वक्त भी उनकी बातों को माना और समय पर टीकाकरण करवाया।

जिस वक्त देश के शहरों में भी लोग वैक्सीनेशन से कतरा रहे थे उस समय मतिल्दा अपने गांव के बड़े-बुज़ुर्गों को टीकाकरण सेंटर पर पहुंचा कर वैक्सीनेशन करवा रही थीं। उन्होंने नियमित तौर पर घर-घर जाकर लोगों का कोविड टेस्ट भी किया। अपनी इस मेहनत के लिए उन्हे कोरोना योद्धा के सम्मान से भी नवाज़ा गया था।

फोर्ब्स इंडिया की जानकारी के मुताबिक अपनी इतनी मेहनत और पसीने के लिए आशा वर्कर मतिल्दा कुल्लू को महीने में केवल 4500 रुपए की छोटी की रकम बतौर तनख्वाह मिलती है। हालांकि मतिल्दा को अपने काम से प्यार है लेकिन वो भी चाहती हैं कि इसके लिए उन्हें थोड़े ज़्यादा पैसे और आवश्यकता अनुसार उपकरण दिए जाएं।

जब पूरा देश कोरोना में घरों में लॉकडाउन में क़ैद था तब मतिल्दा जैसी कई आशा कार्यकर्ताएं अपने-अपने इलाके में अपनी जान हथेली पर रखकर लोगों तक स्वास्थ्य सेवाएं पहुंचा रही थीं। उस वक्त उनमें से कई के पास ना तो PPE किट थी, ना मास्क थे और ना ही सेनेटाइज़र। फिर भी उन्होंने अपनी जान से ज़्यादा लोगों की जान की परवाह की। ऐसे समर्पण का सम्मान शायद हम किसी भी तरह नहीं कर पाएंगे। इन महिलाओं को सलाम।

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