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जब बात औरतों को डराने की हो तो, बलात्कार सबसे आसान विकल्प क्यों बन जाता है?

Posted: November 29, 2019

चाहे गलती हो या ना हो, किसी भी महिला को अपमानित करने के लिए उसके शरीर को इस्तेमाल करना सबसे आसान क्यों होता है, क्यों इतनी आसान है देनी बलात्कार की धमकी?

मेरी एक दोस्त हैं जो अक्सर अपने रॉनी की बेहतरीन फ़ोटो फ़ेसबुक पेज पर पोस्ट करती हैं, कभी उनके बिस्तर पर सोते हुए, कभी उनके घर देर से आने पर रूठे हुए तो कभी उसको नई ड्रेस पहनाते हुए। वो काफ़ी शरारती भी है, पर वे हंस कर कहती हैं कि बच्चे तो बच्चे होते हैं। सबसे ज्यादा हैरानी तो मुझे तब हुई जब एक फोटो में उनकी नन्हीं सी बेटी को रॉनी को राखी बांधते देखा। आप कहेंगे कि इसमें हैरानी की क्या बात है। असल में रॉनी उनका बेटा नहीं उनका पालतू कुत्ता है, पर ये बात आप उनसे नहीं कह सकते, वे बुरा मान जाएँगी, आख़िर वो एक डॉग मॉम जो हैं।  

तो जब लोग अपने पशु-पक्षियों को अपने बच्चों की तरह प्यार करते हैं, सजाते-संवारते हैं और वैसे ही उनके नख़रे भी उठाते हैं तो फिर अपने प्रिय कुत्ते को अपने पारिवारिक समारोह, रोज़मर्रा के और कलात्मक कार्यों में शामिल करने में बुराई क्या है? 

मुंबई की प्रतिष्ठित बाल साहित्य लेखिका नताशा शर्मा ने भी ऐसा ही सोचा होगा जब वे अपनी नई किताब ‘द आर्ट ऑफ़ टाइंग अ पग’ पर काम कर रहीं थीं। इस किताब का सृजन नताशा ने कई बार पुरस्कृत चित्रकार (illustrator) प्रिया कुरियन के साथ मिलकर बच्चों के लिए ही किया है ।लगभग तीन सप्ताह पहले इसका विमोचन हुआ था। पर उन्होंने कभी नहीं सोचा होगा कि उनके इस किताब के शीर्षक की वजह से अन्य सिखों की भावनाएं आहत हो जाएँगी और उन्हें अपनी किताब को वापस लेना पड़ेगा। 

यहाँ ये बताना ज़रूरी है कि नताशा का जन्म अमृतसर में हुआ था और वे खुद सिख़ धर्म का पालन करती हैं। नताशा जब बच्ची थीं तब वह अपने पिता की पगड़ी बाँधने में मदद किया करती थीं और अपनी इस किताब में उन्होंने अपनी उन्हीं यादों को शामिल किया है। अंग्रेज़ी में लिखी गयी इस किताब के माध्यम से वे समूचे भारत के बच्चों को न सिर्फ़ पगड़ी बांधना सिखाना चाहती हैं बल्कि उन्हें  देश की सांस्कृतिक और धार्मिक धरोहर और विविधता से भी परिचित करवाना चाहती हैं। 

इस किताब की रिलीज़ पर एक आमंत्रित मेहमान ने पग शब्द की स्पेलिंग के ऊपर ऐतराज़ किया क्योंकि उन्हें लगा कि यहाँ pug शब्द का प्रयोग सिखों की पगड़ी का अपमान है। लेखिका ने उन्हें अपने विचार समझाने की कोशिश की पर विवाद ख़त्म होने की बजाय बढ़ता ही गया।

अगले कुछ दिनों में कई गुरुद्वारा प्रबंधक समितियों ने भी इस शब्द पर अपना विरोध जताया और कुछ अन्य लोगों ने change.org पर किताब के खिलाफ़ एक पेटिशन भी शुरू दी। पर जब विरोध ने हत्या और बलात्कार की धमकियों का रूप ले लिया तो मजबूरन लेखिका और उनके प्रकाशकों ने किताब को वापस लेने का निर्णय लेना पड़ा । अब किताब अमेज़न से भी हटा ली गयी है।

दरअसल सिख धर्म में ‘5 क ‘ का बहुत महत्व है – केश, कंघा, कड़ा, कृपाण और कच्छ। क्योंकि सिख धर्म में बाल काटने की मनाही है तो लम्बे बालों को समेटकर रखने में पगड़ी उनकी मदद करती है। पगड़ी को ‘दस्तार’ भी कहा जाता है और यह शब्द पर्शियन भाषा के दस्त-ए-यार शब्द से लिया गया है जिसका अर्थ है भगवान  का हाथ। इस लिहाज से सबसे महत्वपूर्ण बात है कि सिखों के लिए पगड़ी सिर्फ़ एक कपड़ा नहीं बल्कि उनकी अनूठी पहचान, हिम्मत, इज़्ज़त, आत्म-सम्मान, आत्मिक शुद्धता का परिचायक भी है। 

पर जन्म से सिख धर्म के अनुयायी होने के नाते नताशा शर्मा को पगड़ी का महत्त्व बहुत अच्छे से मालूम है।  उन्होंने ‘द आर्ट ऑफ़ टाइंग अ पग ‘ की परिकल्पना की और पग शब्द के स्पेलिंग में pag की बजाय pug कुछ सोच-समझ कर ही लिखा है। मुझे यकीन है कि उन्हें पगड़ी के सम्मान और महत्त्व का ज्ञान है और वे कभी भी इसको किसी भी तरह से अपमानित नहीं कर सकती।

उनकी किताब में एक छोटा बच्चा अपने पिता को पगड़ी बाँधने में मदद कर रहा है पर एक कुत्ता बार-बार उनके रास्ते में आ जाता है, आख़िर में उस नन्हे कुत्ते के सर पर भी कपड़े की एक पट्टी बाँध दी जाती है। क्या ऐसा हम अपने परिवार के शरारती बच्चों के साथ भी नहीं करते? 

सभी को मालूम है कि Pug कुत्तों की एक बेहतरीन नस्ल का नाम है और क्योंकि नताशा शर्मा की किताब में एक शरारती पालतू कुत्ता भी है तो उनके विचार में pug का इस्तेमाल पगड़ी और कुत्ते दोनों के लिए ही सटीक था। pug शब्द को उन्होंने अंग्रेज़ी के लिटरेरी डिवाइस पन (pun) के तौर पर प्रयोग किया था और उनकी मंशा कहीं से भी पगड़ी का अपमान करने की नहीं थी।

द हिन्दू अख़बार की एक रिपोर्ट के अनुसार करडी टेल्स की प्रकाशक शोभा विश्वनाथ ने कहा है कि लेखिका और उनका परिवार अपनी सुरक्षा को लेकर बहुत डरा हुआ है और इसी वजह से उन्होंने किताब को वापस लेने का निर्णय लेना पड़ा। फिर भी उनका मानना है कि किसी भी विवाद को सुलझाने का सब से अच्छा तरीका है उस बारे में बात करना। हमें खुले दिल से एक-दूसरे के विचार सुनने-समझने की कोशिश करनी चाहिए, न कि हर बात को धर्म के अपमान की तरह लेना चाहिए। करदी टेल्स के एक ट्वीट के अनुसार हालांकि इस किताब को बहुत लोगों से प्रशंसा मिली है, सिख पाठकों से भी, फिर भी उन्होंने किसी की भी धार्मिक भावनाओं और विश्वास को ठेस पहुंचाने के लिए माफ़ी मांगी है और किताब को वापस लेने का निर्णय किया है। 

आज हम ऐसी दुनिया में रहतें है जहां किसी भी बात पर शोर पहले मचता है और असली मुद्दा क्या है कभी पता ही नहीं चलता। और ऐसा पहली बार नहीं हुआ है, दूसरे के नज़रिये, खास करके आर्टिस्ट्स और लेखकों के नज़रिये, को तो हम समझना ही नहीं चाहते और उन पर हमला करने को तैयार रहते हैं। और जब बात औरतों की हो तो बलात्कार, चाहे धमकी ही सही, सबसे आसान विकल्प क्यों बन जाता है? 

क्या आपको नहीं लगता कि जब भी कोई ग़लतफ़हमी या विवाद हो तो हमेशा उसे समझ से बात करके सुलझा लेना ही बेहतर होता है? इस केस में, एक शब्द के लिए किसी लेखिका और उसके परिवार को बलात्कार और हत्या की धमकियाँ देना कहाँ तक तर्कसंगत है? अगर धर्म को भी समझें, तो कोई भी धर्म ऐसा करने की सलाह नहीं देता है।   

वैसे महिलाओं को ऐसी रेप की धमकियाँ देना पहली बार नहीं हुआ है। ये गालियां, ये धमकियाँ हम महिलाएं अपने आस-पास आये दिन सुनती हैं, बस महिला का चेहरा और नाम बदल जाता है। चाहे गलती हो या ना हो, किसी भी महिला को नीचा दिखाने और अपमानित करने के लिए उसके शरीर को इस्तेमाल करना सबसे आसान होता है। स्मार्टफोन और सोशल मीडिया ने यह और भी आसान कर दिया है।

आप किसी को निजी तौर पर जानते हों या नहीं, उसकी गलती को समझे बिना, उसके स्पष्टीकरण को सुने बिना उसके चरित्र उसके परिवार पर लांछन लगा देना, रेप की धमकी देना, पहले भी होता था पर अब तो महिलाओं को अपमानित करने का यह तरीका बढ़ता ही जा रहा है। 

आप के इस बारे में क्या विचार हैं?

मूल चित्र : Google

 

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