ख्वाबों के सिमटते रंग

Posted: January 11, 2019

तेरे चांद की चांदनी में ऐ आसमान, मेरी जिल्द की परतें अब सुलगती हैं – चांदनी हो या चाहत, वक़्त के साथ सबके मायने ज़िन्दगी अनुसार बदल जाते हैं।

ख्वाबों की जिस गली से वास्ता था मेरा,
वहां इन दिनों एक रेत उड़ा करती है।

तेरे चांद की चांदनी में ऐ आसमान,
मेरी जिल्द की परतें अब सुलगती हैं।

कह के निकल गए वो कितने सुकून से,
कमजोरियों के अक्स अब उभरते हैं।

उनकी कोशिशों का है कितना अहसान,
इस दरख़्त पे कांटे तो उगा करते है।

हाथों को सजा लाए आरज़ू के खून से,
फिर मांग संवारने की बात करते हैं।

कतरा जिसने कर दिया हो कतरा कुर्बान,
उसे हाशिए पे लाके अब छिटकते हैं।

उनकी चाहत की साजिश से नवाकिफ,
साथ चल रही थी, चला करती हूं।

मुझे वास्ता तुम्हारा ये दास्तान,
जिस रंग से लिख रही थी अब सिमटते हैं।

मूल चित्र: Pexels

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