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बिग बॉस 13 के सिद्धार्थ शुक्ला की जीत पर मैं खुश नहीं हूँ! और आप?

बिग बॉस 13 के सिद्धार्थ शुक्ला की जीत को देख कर लगता है कि लोगों ने एक बार फिर चेहरे को चुनते हुए कुछ अहम मुद्दों को नज़रअंदाज़ किया है। 

बिग बॉस 13 के सिद्धार्थ शुक्ला की पॉपुलैरिटी 

बिग बॉस 13 के विजेता सिद्धार्थ शुक्ला की जीत ने कुछ बहुत ज़्यादा शॉक्ड तो नहीं किया क्यूंकि इस पूरे सीज़न में ये बात बार-बार किसी ना किसी तरह से सामने आ ही रही थी कि उनकी पापुलैरिटी बहुत ज़्यादा है।

जिस बात ने मुझे (शॉक्ड तो नहीं बोलूंगी) निराश किया वो ये थी कि उनका एरोगेंट, बदतमीज़ और बेहद गुस्सैल स्वभाव देखने के बाद भी लोगों ने उन्हीं को चुना। लोगों ने एक बार फिर चेहरे को चुनते हुए मुद्दों को एगनोर किया। वे एक ऐसे प्रतियोगी थे जिसके मूल स्वभाव में कोई भी अच्छी बात नहीं दिखी, ना ही उभर कर आयी इस पूरे सीज़न के दौरान।

ना उनके जैसा दामाद चाहूंगी और ना पति

जिन लोगों ने उन्हें वोट किया और बाकी किसी और को नहीं चुना क्या वो ये बताना चाहते हैं कि उनके जैसा बदतमीज, गुस्सैल, बद दिमाग़, कामचोर उनका रोल मॉडल है? क्या वो लोग ऐसा इंसान अपनी बेटी के लिए चुनेंगे (स्वभाव के आधार पर, दौलत और शोहरत अगर सभी के पास उनके जैसी ही हो तो)?

मैं एक मां हूं और मैं ना उनके जैसा दामाद चाहूंगी और ना पति। पूरे सीज़न में औरतों के लिए या फिर आदमियों के लिए या फिर किसी भी एक चीज के लिए कोई भी ऐसा काम या व्यवहार उनका नहीं रहा जिसने उनके अंदर का वो इंसान दिखाया हो जिसमें प्यार, सहनशीलता, संवेदना, ठहराव या कोई ऐसी भावना दिखी हो जिसे असली मायनों में सुंदर कहा जा सके।

उनके स्वभाव में वो मीठापन, विनम्रता कहीं नहीं थी

पूरे ग्रुप में वो सबसे ज़्यादा पॉपुलर और सफल थे, मगर उनके स्वभाव में वो मीठापन, विनम्रता कहीं नहीं थी जो जिंदगी से इतना कुछ मिलने वालों के स्वभाव में खुदबखुद आ जाती है। ना किसी के लिए टूटा, ना किसी के लिए जुड़ा, ना कोई इमोशन ना कोई कंसर्न, कुछ भी ऐसा नहीं दिखा जो प्यारा हो। पूरे सीज़न मैं ये देखकर हैरान थी कि कोई लगातार इतने दिनों तक सिर्फ एक ही इमोशन एंगर,एरोगेंस, बदतमीजी के साथ कैसे रह सकता है?

मुझे एक और बात समझ नहीं आई कि जिन गलतियों( गुस्सा) के लिए परास, आसिम और बाकी लोगों को बुरी तरह डांटा जाता था, उन्हीं गलतियों के लिए सिद्धार्थ को या तो डांटा नहीं गया या बड़ी तामीज से कभी कभार थोड़ा सा टोका गया। शायद इसी बात ने जनता का मनोबल बनाए रखा और वो ट्रॉफी लेके चले गए जबकि इस सीज़न में उनसे अच्छे कई पार्टिसिपेंटस थे।

बिग बॉस 13 के सिद्धार्थ शुक्ला को लोगों ने क्यों चुना?

क्या शानदार जर्नी रही आसिम की फर्श से अर्श तक, पर वो हार गए, शहनाज़ कमाल की एंटरटेनर पर हार गई, रश्मि एक पूरा पैकेज फिर भी हार गई, आरती क्या ज़बरदस्त ग्रोथ दिखाई पर हार गई। लोगों ने चुना किसे? उसे जो पर्दे पर हीरो और असल जिंदगी में बेहद आम इंसान की कमियों के साथ दिखा… जिसे हार बात पर गुस्सा आता है, जिसे अपनी बात ज़ोर से बोलकर मनवाने कि आदत है, जो हारने पर विवेक खो देता है, जो घर के किसी काम में मुश्किल से हाथ बटायेगा, जो अपने से छोटों को अपने फिजिकल पॉवर से दबाएगा, जो दूसरो को नीचा दिखाने में पीछे नहीं हटेगा और जो इतना कमजोर है कि वो कभी कमजोर नहीं दिखेगा।

हां, कभी किसी पल में कमजोर दिखना कमजोरी नहीं होती हैं। अपनी कमजोर इमोशन को बाहर निकालना बड़ी हिम्मत का काम होता है। पर बिग बॉस 13 के सिद्धार्थ शुक्ला ऐसा नहीं कर पाए। सिद्धार्थ हमेशा एक ही पिच पर रहे और ये नेचुरल नहीं हो सकता।

जिन लोगों ने उन्हें वोट किया उन सभी लोगों से पूछना चाहती हूं

1) क्या स्वभाव से ऐसा दामाद उन्हें अपनी बेटी के लिए चलेगा?
2) उनके चरित्र का वो कौन सा पहलू था जिसने उन्हें छुआ?
3) सूरत और सीरत का फर्क क्या उन्हें नहीं दिखा?
4) बस सिर्फ इसलिए वोट कर दिया कि उन्हें कुछ ऐसे सीरियल्स मिल गए है जिसमें वो एक ऐसा किरदार निभा लेते हैं जो हीरो टाइप होते हैं।
5) या इसलिए वोट दे दिया क्योंकि बिग बॉस ने उन्हें वैसे नहीं लताड़ा जैसे बाकी लोगों को?
6) क्या हम कभी अपना स्टैंड के पाएंगे?

मुझे बड़ा दुख होता है और तरस भी आता है कि हम आम लोग इतने ज़्यादा बेवकूफ होते हैं कि कभी भी सितारों की पापुलैरिटी, चमक, झूठी इमेज और उनके बड़े कद के तिलिस्म से बाहर ही नहीं आ पाते हैं और उनके हर काम को सपोर्ट करते रहते हैं चाहे वो ग़लत भी क्यों ना हो?

बिग बॉस 13 के सिद्धार्थ शुक्ला के एरोगेंट, गुस्सैल, बदतमीज स्वभाव को अप्रूवल

सिद्धार्थ का जीतना एक तरह से उनके एरोगेंट, गुस्सैल, बदतमीज स्वभाव को अप्रूव करता है। औसत दिमाग़ के लोग उनकी जीत से उनके स्वभाव को जोड़कर देखेंगे और अपनी उन्हीं कमियों को या तो जस्टिफाई करेंगे या तो वैसे ही बनने की कोशिश करेंगे…और दोनों ही बातें अच्छी नहीं है।

जो 5 प्रतिद्वंदी बचे थे, उनमें कुछ छोटी मोटी खामियों को छोड़ दें तो आरती, रश्मि में कोई कमी नहीं थी, शहनाज़ बेहद पॉपुलर होने के बावजूद नहीं जीत पायी। आसिम का सफर बेहद शानदार रहा पर वो हार गए।

कहीं ना कहीं हमारा समाज आज भी सिध्दार्थ जैसे दबंग, बदतमीज, गुस्सैल, घर का काम ना करने वाले मर्दों को अप्रूव करता है, तभी तो जीत गए वो। या फिर हम कभी चेहरों को छोड़कर मुद्दों पर रिएक्ट नहीं कर सकते? या फिर हम कभी लीडर नहीं बन सकते हमेशा फॉलोअर्स ही रहेंगे? या फिर हमेशा सितारों के झूठे तिलिस्म में कैद रहेंगे।

जो भी हो पर उनकी जीत से ये बात साफ है कि पर्दे का हीरो असली जिंदगी के हीरो से बड़ा ही होता है और ये बात यकीनन निराशजनक है।

मूल चित्र : YouTube 

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